उर्दू शायरी की दुनिया में कुछ शायर ऐसे हुए हैं जिनकी पहचान सिर्फ़ उनके कलाम से नहीं, बल्कि उनकी ज़िंदगी और उनके जज़्बात से भी होती है। मख़्मूर देहलवी ऐसे ही शायर थे। उनकी शायरी में मोहब्बत की नर्मी भी है, जुदाई का दर्द भी, ज़िंदगी की हक़ीक़त भी और मुश्किल हालात में हौसला बनाए रखने का पैग़ाम भी। उनके अशआर आज भी पढ़ने और सुनने वालों के दिल को छू लेते हैं।
मख़्मूर देहलवी का असल नाम फ़ज़्ल-ए-इलाही था। उनकी पैदाइश साल 1900 में दिल्ली में हुई। दिल्ली की अदबी और शायरी की रिवायत में उनका एक ख़ास मुक़ाम रहा। वे मशहूर शायर बेख़ुद देहलवी के शागिर्द थे। उस्ताद की सोहबत और दिल्ली के साहित्यिक माहौल ने उनकी शायरी को एक अलग रंग दिया।
मख़्मूर देहलवी कई साल तक पटौदी के नवाब के मुलाज़िम भी रहे। लेकिन उनकी असली पहचान एक ऐसे शायर की बनी, जिसने अपने दिल की कैफ़ियत को बहुत सादगी और असरदार अंदाज़ में अशआर का रूप दिया।
उनकी शायरी में सबसे ज़्यादा जिस जज़्बे की शिद्दत महसूस होती है, वह है मोहब्बत। उनके लिए मोहब्बत कोई मामूली एहसास नहीं, बल्कि एक ऐसी कैफ़ियत थी जिसे हर इंसान समझ नहीं सकता।
“मोहब्बत के लिए कुछ ख़ास दिल मख़्सूस होते हैं
ये वो नग़्मा है जो हर साज़ पर गाया नहीं जाता।”
इन दो पंक्तियों में मख़्मूर ने मोहब्बत की नाज़ुक और ख़ास फ़ितरत को बयान किया है। हर शख़्स के दिल में मोहब्बत का एहसास एक जैसा नहीं होता। कुछ दिल ही ऐसे होते हैं जो इस जज़्बे की गहराई को महसूस कर पाते हैं।
इसी तरह उनका एक और मशहूर शेर इंसान और रिश्तों की सच्चाई बयान करता है।
“किसे अपना बनाएं कोई इस क़ाबिल नहीं मिलता
यहां पत्थर बहुत मिलते हैं लेकिन दिल नहीं मिलता।”
यह शेर सिर्फ़ मोहब्बत की कहानी नहीं कहता, बल्कि आज़माइश भरी ज़िंदगी की एक बड़ी हक़ीक़त सामने रखता है। दुनिया में लोग बहुत मिलते हैं, मगर ऐसा सच्चा इंसान मिलना मुश्किल है जिसे दिल से अपना कहा जा सके।
मख़्मूर की शायरी में मोहब्बत को एक ऐसी आग के रूप में भी देखा गया है जिसे इंसान अपनी मर्ज़ी से पैदा नहीं करता। वे कहते हैं।
“मोहब्बत हो तो जाती है, मोहब्बत की नहीं जाती
ये शो’ला ख़ुद भड़क उठता है, भड़काया नहीं जाता।”
यानी मोहब्बत कोई फ़ैसला नहीं, बल्कि एक एहसास है जो अचानक दिल में पैदा हो जाता है। इसे न ज़बरदस्ती पैदा किया जा सकता है और न ही सिर्फ़ चाहने से ख़त्म किया जा सकता है।
मख़्मूर देहलवी की निजी ज़िंदगी में भी मोहब्बत का जज़्बा बेहद गहरा था। कहा जाता है कि वे अपनी बीवी से बहुत मोहब्बत करते थे। जब उनकी बीवी का इंतिक़ाल हुआ तो मख़्मूर कई महीनों तक उनकी क़ब्र पर पड़े रहे। यह घटना उनकी शख़्सियत में मौजूद गहरी वफ़ादारी और मोहब्बत का अंदाज़ा देती है। शायद यही वजह है कि उनकी शायरी में इश्क़ सिर्फ़ एक ख़ूबसूरत ख़याल नहीं, बल्कि एक जीता-जागता एहसास बनकर सामने आता है।
मख़्मूर देहलवी का कलाम पढ़ने का अंदाज़ भी उनकी लोकप्रियता की एक बड़ी वजह था। वे अपने अशआर को तरन्नुम में पढ़ते थे। उनकी आवाज़, लहजे और पढ़ने के अंदाज़ से महफ़िल में एक अलग ही समां बंध जाता था। जब वे मोहब्बत, दर्द या जुदाई के अशआर पढ़ते, तो सुनने वाले सिर्फ़ शेर नहीं सुनते थे, बल्कि उस एहसास को महसूस भी करते थे।
“मुसाफ़िर अपनी मंज़िल पर पहुंच कर चैन पाते हैं
वो मौजें सर पटकती हैं जिन्हें साहिल नहीं मिलता।”
यहां मुसाफ़िर और मौज के ज़रिए शायर ने इंसानी ज़िंदगी की बेचैनी को बयान किया है। जिस तरह मुसाफ़िर को मंज़िल मिलने पर सुकून मिलता है, उसी तरह इंसान भी अपनी मंज़िल और अपने मक़सद की तलाश में भटकता रहता है।
मख़्मूर की शायरी में क़िस्मत और इंसानी कोशिश का सवाल भी बार-बार आता है।
“ख़ुदा जब तक न चाहे आदमी से कुछ नहीं होता
मुझे मालूम है मेरी ख़ुशी से कुछ नहीं होता।”
यहां शायर इंसान की सीमाओं और तक़दीर की ताक़त की तरफ़ इशारा करता है। इंसान कोशिश तो करता है, लेकिन हर चीज़ उसके अपने इख़्तियार में नहीं होती।
“ये तुझ से आश्ना दुनिया से बेगाने कहां जाते
तिरे कूचे से उठते भी तो दीवाने कहाँ जाते।”
मोहब्बत में डूबे आशिक़ की हालत को इससे बेहतर अंदाज़ में बयान करना मुश्किल है। जब दिल किसी एक से जुड़ जाता है तो बाकी दुनिया बेगानी-सी लगने लगती है।
मख़्मूर देहलवी के यहां दर्द है, लेकिन मायूसी नहीं। वे ज़िंदगी की मुश्किलों के बावजूद हौसला बनाए रखने की बात करते हैं।
“हज़ार रंज हो, दिल लाख दर्द-मंद रहे
ख़याल पस्त न हो, हौसला बुलंद रहे।”
यानी ज़िंदगी में चाहे कितने ही ग़म क्यों न आएं, दिल कितना ही दर्द क्यों न सहता रहे, इंसान को अपने हौसले को कमज़ोर नहीं होने देना चाहिए। यही शायद मख़्मूर की शायरी का सबसे ख़ूबसूरत पैग़ाम है।
मख़्मूर देहलवी ने अपनी शायरी में मोहब्बत, वफ़ा, जुदाई, तक़दीर और इंसानी जज़्बात को आसान अल्फ़ाज़ में पेश किया। उनकी शायरी में न तो बनावटीपन दिखाई देता है और न ही मुश्किल बयान। यही सादगी उनके कलाम को आम पाठक और शायरी के क़द्रदान—दोनों के क़रीब ले आती है।
मख़्मूर देहलवी की शायरी आज भी हमें याद दिलाती है कि सच्ची मोहब्बत दिल से महसूस की जाती है, रिश्ते आसानी से नहीं मिलते और ज़िंदगी में चाहे जितने रंज क्यों न हों, हौसला बुलंद रहना चाहिए। उनकी शायरी का यही दर्द, यही मोहब्बत और यही उम्मीद उन्हें उर्दू अदब में एक यादगार नाम बनाती है।
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