उर्दू अदब की दुनिया में कई ऐसे शायर हुए हैं जिनकी शायरी में मोहब्बत, दर्द और इंसानी जज़्बात की गहरी झलक मिलती है। इन्हीं नामों में एक अहम नाम ज़हीर देहलवी का भी है। उनका असली नाम सय्यद ज़हीरुद्दीन हुसैन था। उनकी पैदाइश साल 1825 में दिल्ली में हुई। ज़हीर देहलवी उस दौर के शायर थे जब उर्दू शायरी अपने शबाब पर थी और दिल्ली अदबी और तहज़ीबी रौनक़ का बड़ा मरकज़ मानी जाती थी।
उनकी शायरी में सादगी भी है और एहसास की गहराई भी। यही वजह है कि आज भी उनके कई अशआर अदबी महफ़िलों में बड़े शौक़ से पढ़े जाते हैं।
शुरुआती ज़िंदगी और तालीम
ज़हीर देहलवी का बचपन दिल्ली की उसी फ़िज़ा में गुज़रा जहां शायरी, इल्म और तहज़ीब का माहौल था। कम उम्र से ही उन्हें शायरी से लगाव हो गया था। यही वजह थी कि उन्होंने जल्दी ही उर्दू अदब की महफ़िलों में आना-जाना शुरू कर दिया।
दिल्ली उस समय उर्दू शायरी का सबसे बड़ा केंद्र थी। शहर में जगह-जगह मुशायरे होते थे और बड़े-बड़े शायर अपनी ग़ज़लें पढ़ते थे। इसी माहौल ने ज़हीर देहलवी के अंदर के शायर को भी निखार दिया।
उस्ताद ज़ौक़ से रिश्ता
ज़हीर देहलवी को मशहूर उर्दू शायर Sheikh Ibrahim Zauq की शागिर्दी हासिल हुई। ज़ौक़ उस दौर के बहुत बड़े शायर थे और मुग़ल बादशाह Bahadur Shah Zafar के उस्ताद भी थे।
ज़ौक़ की सोहबत में ज़हीर देहलवी ने शायरी की बारीकियां सीखीं। उनके लफ़्ज़ों की सादगी और असरदारी में उस्ताद की तालीम साफ़ दिखाई देती है।
उन्हें उर्दू शायरी की उस पीढ़ी का अहम शायर माना जाता है जो Mirza Ghalib और ज़ौक़ के बाद सामने आई। वह मशहूर शायर Dagh Dehlvi के दौर के हम-असर भी थे।
लाल क़िले की नौकरी
कहा जाता है कि ज़हीर देहलवी को बहुत कम उम्र में ही Red Fort में नौकरी मिल गई थी। उस दौर में लाल क़िले में नौकरी मिलना बड़ी इज़्ज़त और सम्मान की बात मानी जाती थी।
यह वही दौर था जब दिल्ली में मुग़ल सल्तनत का असर अभी बाक़ी था और अदबी महफ़िलें खूब सजती थीं। ज़हीर देहलवी भी इस माहौल का हिस्सा बने और उनकी शायरी धीरे-धीरे मशहूर होने लगी।
1857 के बाद बदली ज़िंदगी
लेकिन इतिहास का पहिया हमेशा एक जैसा नहीं रहता। Indian Rebellion of 1857 ने दिल्ली की पूरी तस्वीर बदल दी। इस बग़ावत के बाद शहर की अदबी और सांस्कृतिक ज़िंदगी भी बुरी तरह प्रभावित हुई।
इस बदलाव का असर ज़हीर देहलवी की ज़िंदगी पर भी पड़ा। उन्हें दिल्ली छोड़नी पड़ी और वह दूसरे शहरों की तरफ़ निकल गए।
दूसरे शहरों में गुज़री ज़िंदगी
दिल्ली छोड़ने के बाद ज़हीर देहलवी ने कई शहरों में अपनी ज़िंदगी गुज़ारी। कुछ समय वह Bareilly और Rampur में रहे। इसके बाद उन्होंने Alwar, Jaipur और Tonk में भी कई साल गुज़ारे।
इन शहरों की अदबी महफ़िलों ने उनकी शायरी को और निखार दिया। अपनी ज़िंदगी के आख़िरी साल उन्होंने Hyderabad में गुज़ारे। वहीं साल 1911 में उनका इंतकाल हुआ।
शायरी की ख़ासियत
ज़हीर देहलवी की शायरी की सबसे बड़ी ख़ासियत उसकी सादगी और असरदारी है। उनके अशआर में मोहब्बत, तन्हाई, इंसानी रिश्तों और ज़िंदगी की सच्चाइयों की झलक मिलती है। उनकी ग़ज़लों में कभी मोहब्बत की बेचैनी दिखाई देती है तो कभी इंसान की मजबूरी और समाज की सच्चाई।
“बाद मरने के भी मिट्टी मिरी बर्बाद रही,
मिरी तक़दीर के नुक़सान कहां जाते हैं।”
मोहब्बत की गहराई को बयान करते हुए उनका यह शेर भी बेहद मशहूर है
“इश्क़ है इश्क़ तो इक रोज़ तमाशा होगा,
आप जिस मुंह को छुपाते हैं दिखाना होगा।”
और मोहब्बत की बेचैनी का रंग इस शेर में साफ़ दिखाई देता है
“चाहत का जब मज़ा है कि वो भी हों बे-क़रार,
दोनों तरफ़ हो आग बराबर लगी हुई।”
अदबी विरासत
ज़हीर देहलवी की शायरी सिर्फ़ लफ़्ज़ों का खेल नहीं बल्कि उस दौर की तहज़ीब, समाज और इंसानी जज़्बात की तस्वीर भी है। उन्होंने अपनी ग़ज़लों में उस ज़माने की रूह को समेट लिया।
उर्दू अदब की तारीख़ में उनका नाम एक ऐसे शायर के तौर पर लिया जाता है जिसने सादगी भरी ज़ुबान में गहरी बातें कही। उनकी शायरी आज भी मुशायरों और अदबी महफ़िलों में ज़िंदा है। यही वजह है कि ज़हीर देहलवी का नाम उर्दू शायरी की उस सुनहरी रिवायत का हिस्सा माना जाता है जिसने सदियों तक लोगों के दिलों को छुआ है।
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