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कलीम आजिज़: मोहब्बत और लफ़्ज़ों की खुशबू बिखेरने वाले शायर

उर्दू अदब की दुनिया में कुछ शायर ऐसे होते हैं जिनकी शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं होती, बल्कि एहसास बनकर दिलों में उतर जाती है। Kalim Aajiz भी ऐसे ही शायर थे। उनकी ग़ज़लों में मोहब्बत, दर्द, सादगी और इंसानी जज़्बात की एक ख़ास खुशबू महसूस होती है।

कलीम आजिज़ न सिर्फ़ एक मशहूर शायर थे, बल्कि एक बड़े शिक्षाविद भी थे। उन्होंने पूरी ज़िंदगी उर्दू ज़बान और अदब की ख़िदमत में गुज़ारी। यही वजह है कि उनके साहित्यिक योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें Padma Shri से भी सम्मानित किया।

जन्म और बचपन

कलीम आजिज़ साहब का जन्म 1920 के दशक में बिहार के नालंदा ज़िले के एक गांव में हुआ था, जो उस समय पटना ज़िले के अंतर्गत आता था। उनका बचपन सादगी और तहज़ीब से भरे माहौल में गुज़रा।

शुरू से ही उन्हें पढ़ाई और साहित्य से गहरी दिलचस्पी थी। धीरे-धीरे यह दिलचस्पी शायरी की तरफ़ मुड़ गई और कम उम्र में ही उन्होंने ग़ज़लें लिखना शुरू कर दिया। कहा जाता है कि उन्होंने महज़ 17 साल की उम्र में शायरी कहना शुरू कर दिया था।

तालीम और इल्मी ज़िंदगी

कलीम आजिज़ की शिक्षा पटना में हुई। उन्होंने Patna College से बीए की पढ़ाई की और गोल्ड मेडल हासिल किया। इसके बाद उन्होंने Patna University से उर्दू में एमए किया।

उन्हें उर्दू साहित्य से इतनी मोहब्बत थी कि उन्होंने इसी विषय में शोध भी किया। उनकी पीएचडी का विषय था “बिहार में उर्दू साहित्य का विकास”। बाद में यही शोध एक किताब के रूप में भी प्रकाशित हुआ।

तालीम पूरी करने के बाद वे पटना यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग में लेक्चरर बन गए। कई दशकों तक उन्होंने वहां पढ़ाया और नई पीढ़ी को उर्दू अदब से जोड़ा।

मुशायरों के शहज़ादे

कलीम आजिज़ साहब सिर्फ़ किताबों के शायर नहीं थे, बल्कि मुशायरों के भी बेहद मक़बूल शायर थे। उनकी आवाज़, अंदाज़ और लफ़्ज़ों की सादगी लोगों को तुरंत अपनी तरफ़ खींच लेती थी।

1949 से उन्होंने देश भर के मुशायरों में शिरकत करना शुरू किया। धीरे-धीरे उनका नाम उर्दू शायरी की दुनिया में चमकने लगा। 1960 और 1970 के दशक में एक दिलचस्प बात यह थी कि स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर दिल्ली के लाल क़िले में जो मशहूर मुशायरा होता था, उसमें बिहार की तरफ़ से अक्सर सिर्फ़ एक ही शायर को बुलाया जाता था और वह थे कलीम आजिज़ साहब।

पहली किताब और बड़ी पहचान

कलीम आजिज़ साहब का पहला ग़ज़ल संग्रह 1976 में प्रकाशित हुआ। इस किताब का लोकार्पण दिल्ली के Vigyan Bhawan में उस समय के राष्ट्रपति Fakhruddin Ali Ahmed ने किया। यह उनके लिए ही नहीं बल्कि उर्दू अदब के लिए भी एक बड़ी बात थी। इसके बाद उनके कई और ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुए, जिनमें

  • “वो जो शायरी का सबब हुआ”
  • “जहां खुशबू ही खुशबू थी”

जैसी किताबें ख़ास तौर पर मशहूर हुईं।

शायरी का अंदाज़

कलीम आजिज़ की शायरी की सबसे बड़ी ख़ासियत उसकी सादगी और असर है। वे मुश्किल अल्फ़ाज़ और पेचीदा तर्ज़ से दूर रहते थे। उनके शेर सीधे दिल से निकलते और सीधे दिल तक पहुंचते थे। उनकी ग़ज़लों में मोहब्बत, तन्हाई, दर्द और ज़िंदगी की सच्चाइयां बहुत खूबसूरती से झलकती हैं।

सरकारी ज़िम्मेदारी और सम्मान

पटना यूनिवर्सिटी से रिटायर होने के बाद कलीम आजिज़ साहब को बिहार सरकार ने उर्दू सलाहकार के तौर पर नियुक्त किया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने उर्दू भाषा और साहित्य के विकास के लिए कई अहम काम किए।

उनकी साहित्यिक और शैक्षिक सेवाओं को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। यह सम्मान उनकी पूरी ज़िंदगी की मेहनत और उर्दू अदब के लिए उनके योगदान की पहचान था।

आख़िरी दौर और विरासत

कलीम आजिज़ साहब ने अपनी पूरी ज़िंदगी उर्दू शायरी और साहित्य की सेवा में गुज़ार दी। उनकी शायरी में सादगी थी, मगर असर इतना गहरा कि सुनने वाला देर तक उसके बारे में सोचता रहता था।

15 फरवरी 2015 को बिहार के हज़ारीबाग में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। लेकिन उनके अशआर आज भी मुशायरों, किताबों और दिलों में ज़िंदा हैं।

कलीम आजिज़ की शख़्सियत यह बताती है कि सच्ची शायरी सिर्फ़ लफ़्ज़ों का खेल नहीं होती, बल्कि दिल के जज़्बात का आईना होती है। उनकी ग़ज़लें आज भी मोहब्बत, इंसानियत और एहसास की वही खुशबू बिखेरती हैं जो उनके दौर में बिखरती थी।

ये भी पढ़ें: कैफ़ भोपाली: ज़िंदगी शायद इसी का नाम है…’ और उनके अंदाज़-ए-बयां की ख़ूबियां

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