उर्दू शायरी की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो शोर मचाकर नहीं, बल्कि ख़ामोशी से अपनी जगह बनाते हैं। जिनकी शायरी न तो बनावटी होती है, न ही लफ़्ज़ों के बोझ से दबी हुई बल्कि सीधे दिल तक पहुंचने वाली। ज़ुबैर अली ताबिश ऐसे ही शायरों में शुमार किए जाते हैं, जिनकी पहचान उनकी सलीस ज़बान, ईमानदार एहसास और ज़िंदगी के आम लेकिन गहरे तजुर्बों से बनी है।
तालीम और शायरी का सफ़र
ज़ुबैर अली ताबिश की पैदाइश 27 अगस्त 1987 को महाराष्ट्र के नगर-देवला जैसे मज़ाफ़ाती इलाक़े में हुई। ये इलाक़ा भले ही साहित्य के बड़े केंद्रों में शामिल न हो, लेकिन यहीं से एक ऐसी आवाज़ उभरी जिसने उर्दू शायरी के एतिराफ़ में अपनी अलग पहचान बनाई। बचपन से ही ज़ुबैर के अंदर शेर-ओ-शायरी का शौक़ मौजूद था। अल्फ़ाज़ों से उनका रिश्ता महज़ पढ़ने तक महदूद नहीं रहा, बल्कि बहुत कम उम्र में ही वे अपने एहसासात को लफ़्ज़ों का जामा पहनाने लगे।
उनका शुरुआती दौर किसी बड़े साहित्यिक माहौल या विरासत का मोहताज नहीं था। किताबें, मुशाहिदा और ज़िंदगी के रोज़मर्रा तर्जुबा। यही उनके असली उस्ताद रहे। अदबी मुताले के साथ-साथ समाज और इंसान के व्यवहार को बारीकी से देखने की आदत ने धीरे-धीरे उनके फ़न में पुख़्तगी पैदा की।
ज़ुबैर अली ताबिश इस वक़्त तदरीस (टीचर) के पेशे से जुड़े हुए हैं। लफ़्ज़ उनके लिए सिर्फ़ बोलने का ज़रिया नहीं रहते, बल्कि एहसासात और ख़यालात की नफ़ीस तर्जुमानी बन जाते हैं।शायद यही वजह है कि उनकी शायरी में कहीं भी बे-जां पेचीदग़ी या दिखावटी इल्मियत नज़र नहीं आती, बल्कि हर शेर सादगी में लिपटा हुआ, दिल से निकलकर सीधे दिल तक पहुंचता है। वो शेर को बोझिल नहीं बनाते, बल्कि उसे संवाद बना देते हैं-ऐसा संवाद, जिसमें पढ़ने वाला खुद को शामिल महसूस करता है।
शायरी की ज़बान और अंदाज़
ज़ुबैर की शायरी की सबसे बड़ी ख़ूबी उनकी ज़बान की सादगी है। वे मुश्किल अल्फ़ाज़ से परहेज़ करते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके शेर हल्के या सतही हैं। इसके उलट, उनके शेर कम शब्दों में बड़ी बात कह जाते हैं।
छोटी-छोटी बहरों में शेर कहना आसान नहीं होता, लेकिन ज़ुबैर इस फ़न में भी कामयाब नज़र आते हैं। उनकी ग़ज़लों और अशआर में एक ठहराव, एक संयम दिखाई देता है। वे न तो ज़रूरत से ज़्यादा भावुकता दिखाते हैं, न ही एहसास को पूरी तरह छुपाते हैं। उनके यहां ज़िंदगी को देखने का नज़रिया बहुत निजी है लेकिन वही निजी तज्रबा सामूहिक एहसास बन जाता है। यही अच्छे शायर की पहचान होती है।
ज़ुबैर अली ताबिश की शायरी में ज़िंदगी एक केंद्रीय विषय के रूप में सामने आती है। लेकिन यह ज़िंदगी किसी आदर्शवादी कल्पना की तरह नहीं, बल्कि संघर्षों, असफलताओं और नामुरादियों से भरी हुई ज़िंदगी है। वे मुआशरे की तल्ख़ियों से आंख चुराते नहीं, बल्कि उनसे दो-दो हाथ करते हैं।
उनकी मोहब्बत भी बहुत अलग किस्म की है। यहां इश्क़ सिर्फ़ आहें भरने या जुदाई का मातम मनाने तक महदूद नहीं रहता। अपने माशूक़ से धौल-धप्पा, शिकायत, तंज़ और हल्की शरारत, सब कुछ उनके शेरों में मौजूद है। यही वजह है कि उनकी मोहब्बत ज़िंदा और भरोसेमंद लगती है।
आज तो दिल के दर्द पर हंस कर
दर्द का दिल दुखा दिया मैं ने
यहां शायर अपने दर्द को कमज़ोरी नहीं, बल्कि तज्रुबे में बदल देता है।
वो जिस ने आंख अता की है देखने के लिए
उसी को छोड़ के सब कुछ दिखाई देता है
कोई तितली निशाने पर नहीं है
मैं बस रंगों का पीछा कर रहा हूं
ज़ुबैर के शेरों में ख़त, यादें और जुदाई एक नॉस्टैल्जिक एहसास के साथ आती हैं
उस के ख़त रात भर यूं पढ़ता हूं
जैसे कल इम्तिहान हो मेरा
ज़ुबैर अली ताबिश का एक कविता-संग्रह “तुम्हारे बाद का मौसम” प्रकाशित हो चुका है, जिसे अदबी हलक़ों में अच्छी पज़ीराई मिली। इस किताब में उनकी शायरी का वही रंग दिखाई देता है-संयम, ईमानदारी और भावनात्मक गहराई। ये संग्रह साबित करता है कि ज़ुबैर सिर्फ़ मुशायरे के शायर नहीं, बल्कि किताबी और स्थायी साहित्य के रचनाकार भी हैं।
मुशायरे और अंदाज़-ए-बयां
मुशायरे पढ़ने का उनका अंदाज़ बेहद सादा लेकिन असरदार है। वे आवाज़ या अदाओं का सहारा कम लेते हैं और शेर को ही बोलने देते हैं। यही वजह है कि वे महफ़िल में शायरी से सिर्फ़ रूबरू नहीं कराते, बल्कि दिलों को बाग़-बाग़ कर देते हैं।
आज के दौर में, जब उर्दू शायरी या तो हद से ज़्यादा पेचीदा होती जा रही है या फिर इंतिहाई सतहीपन का शिकार। ज़ुबैर अली ताबिश एक मुतवाज़ी राह इख़्तियार करते हैं। वे न तो रिवायत से पूरी तरह क़तअ-ताल्लुक करते हैं, न ही उसे अपने लफ़्ज़ों पर बोझ बनने देते हैं।
ज़ुबैर अली ताबिश की शायरी हमें यह यक़ीन दिलाती है कि सादगी कमज़ोरी नहीं, बल्कि ताक़त होती है। उनकी रचनाएं ज़िंदगी को समझने, सहने और मुस्कुरा कर आगे बढ़ने का हौसला देती हैं। वे उन शायरों में से हैं, जिनका सफ़र अभी जारी है और जिनसे उर्दू शायरी को आने वाले वक़्त में और भी बहुत कुछ मिलने की उम्मीद है।
ये भी पढ़ें: सुदर्शन फ़ाकिर: कम लिखा लेकिन जो भी लिखा क्या ख़ूब लिखा
आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं


