झारखंड के धनबाद ज़िले के गोविंदपुर प्रखंड में एक छोटा सा उर्दू प्राथमिक विद्यालय है ‘गायडेहरा’। बाहर से देखने पर ये स्कूल बिल्कुल साधारण लगता है, लेकिन इसके अंदर एक ऐसी कहानी बसती है, जो बस दिल को छू जाती है और सोचने पर मजबूर कर देती है। ये कहानी है उस टीचर की है, जो हाथों से नहीं, बल्कि अपने पैरों से बच्चों का भविष्य लिख रहा है। नाम है मोहम्मद अकबर अंसारी (Mohammad Akbar Ansari) जिनके दोनों हाथ नहीं हैं, लेकिन उनकी हिम्मत हर मजबूरी से कहीं बड़ी है।
जब कमी बन गई ताक़त
मोहम्मद अकबर अंसारी (Mohammad Akbar Ansari) की ज़िंदगी कभी आसान नहीं रही। बचपन से ही दोनों हाथ न होने की सच्चाई उनके साथ थी, लेकिन उन्होंने कभी इसे अपनी कमज़ोरी नहीं बनने दिया। जहां अक्सर लोग हालातों के आगे हार मान लेते हैं, वहीं मोहम्मद अकबर अंसारी (Mohammad Akbar Ansari) ने अपनी कमी को ही अपनी सबसे बड़ी ताक़त बना लिया। वो ब्लैक बोर्ड पर अपने पैरों से लिखते हैं, किताबें पलटते हैं और पूरे मन से बच्चों को पढ़ाते हैं। बोर्ड पर लिखा उनका हर शब्द ये एहसास कराता है कि अगर इंसान ठान ले, तो कोई भी मुश्किल रास्ता नहीं रोक सकती।
मोहम्मद अकबर अंसारी (Mohammad Akbar Ansari) कहते हैं कि शिक्षा ने ही उन्हें आत्मनिर्भर बनाया। साल 1999 में उन्होंने मैट्रिक एग्ज़ाम पास किया। साल 2001 में इंटरमीडिएट पूरा किया और फिर इग्नू से ग्रेजुएशन की पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान उन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा शारीरिक, सामाजिक और मानसिक, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।

सरकार से क्या है उनकी मांग
साल 2005 से मोहम्मद अकबर अंसारी (Mohammad Akbar Ansari) उर्दू प्राथमिक विद्यालय, गायडेहरा में पढ़ा रहे हैं। करीब बीस साल से वो बच्चों को ज्ञान की रोशनी बांट रहे हैं, लेकिन आज भी वो कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर टीचर हैं। उनकी सरकार से एक गुजारिश है कि उनकी नौकरी को परमानेंट किया जाए। मोहम्मद अकबर अंसारी (Mohammad Akbar Ansari) ने टीईटी एग्ज़ाम भी दिया था। पास होने के लिए 78 नंबर ज़रूरी थे, लेकिन वो चार–पांच नंबर से पीछे रह गए। उनका मानना है कि दिव्यांगों के लिए अलग पासिंग मार्क्स और अलग नियम होने चाहिए।
बच्चों की आंखों में उम्मीद
स्कूल के बच्चे अपने टीचर मोहम्मद अकबर अंसारी (Mohammad Akbar Ansari) को सिर्फ़ गुरु नहीं, बल्कि जीती-जागती प्रेरणा मानते हैं। उनकी स्टूडेंट अनुष्का प्रवीण कहती है, “सर के दोनों हाथ नहीं हैं, फिर भी वो हमसे ज़्यादा मेहनत करते हैं। उनसे हमें ये सीख मिलती है कि ज़िंदगी में बहाने नहीं, मेहनत करनी चाहिए।” स्कूल के टीचर सिराजुल अंसारी कहते हैं कि मोहम्मद अकबर अंसारी (Mohammad Akbar Ansari) पूरे स्कूल के गौरव हैं। वो सिर्फ़ एक टीचर नहीं, बल्कि हिम्मत, संघर्ष और इंसानियत की जीती जागती मिसाल हैं। उनकी ज़िंदगी हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है, जो अपनी मजबूरियों को अपनी हार मान लेता है।

तानों के बीच भी नहीं टूटी हिम्मत
मोहम्मद अकबर अंसारी (Mohammad Akbar Ansari) बताते हैं कि ज़िंदगी के सफ़र में उन्हें कई बार लोगों के ताने और मज़ाक सहने पड़े। जब वो सड़क पर चलते थे, तो लोग उन्हें अजीब नज़रों से देखते थे। लेकिन उन्होंने कभी इन बातों को अपने दिल पर हावी नहीं होने दिया। वो कहते हैं, “दोनों हाथ न होने से ज़िंदगी मुश्किल ज़रूर है, लेकिन नामुमकिन नहीं।”
मोहम्मद अकबर अंसारी (Mohammad Akbar Ansari) की कहानी ये साबित करती है कि शरीर कमज़ोर हो सकता है, लेकिन इरादे कभी कमज़ोर नहीं होते। वो पैरों से सिर्फ़ ब्लैक बोर्ड पर शब्द नहीं लिखते, बल्कि बच्चों की ज़िंदगी में उम्मीद, आत्मविश्वास और सपनों के अक्षर उकेरते हैं। उनकी ये कहानी उन हज़ारों युवाओं के लिए एक मिसाल है, जो मुश्किल हालातों में भी अपने सपनों को सच करने की कोशिश कर रहे हैं।
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