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Pash Tae Peaher: लकड़ी में बसाई विरासत – श्रीनगर के फ़ारूक़ ज़रगर का मॉडल

Pash Tae Peaher के ज़रिए श्रीनगर के मोहम्मद फ़ारूक़ ज़रगर उन भूली-बिसरी कहानियों को फिर से ज़िंदा करने की कोशिश कर रहे हैं। कश्मीर के पारंपरिक घर सिर्फ़ ईंट और लकड़ी से बने ढांचे नहीं थे, बल्कि एक पूरी संस्कृति, जीवनशैली और सोच को समेटे हुए थे। उनकी छतें मौसम से बात करती थीं, लकड़ी की नक़्क़ाशी कारीगरों की मेहनत की कहानी कहती थी और पूरा घर नेचर के साथ गहरे तालमेल में खड़ा होता था। पेशे से फ़ार्मासिस्ट फ़ारूक़ ने ये साबित कर दिया है कि किसी विरासत को बचाने के लिए डिग्री नहीं, बल्कि दिल और मज़बूत इरादे की ज़रूरत होती है।

एक छोटी चिंता से शुरू हुआ बड़ा सपना

करीब तीन साल पहले फ़ारूक़ के मन में एक सवाल उठा, क्या आज की नई पीढ़ी को पता है कि कश्मीर के पारंपरिक घर असल में कैसे दिखते थे? क्या बच्चों ने कभी उन छतों के बारे में सुना है, जो बर्फ़ गिरने पर भी घर को सुरक्षित रखती थी? या उन ख़तंबंद छतों के बारे में, जिनमें लकड़ी की नक़्क़ाशी सिर्फ़ सुंदर ही नहीं, बल्कि टिकाऊ भी होती थी? यहीं से जन्म हुआ ‘पाश ताए पाहेर’ (Pash Tae Peaher) नाम की पहल का। कश्मीरी ज़बान में पाश का मतलब है छत और पहर का मतलब है सादा मिट्टी का मकान वही मकान, जिनमें कभी कश्मीर के असलाफ़ (पूर्वज) रहा करते थे।

लकड़ी का एक मॉडल, जो पूरी विरासत समेटे है

फ़ारूक़ ने तीन साल तक धैर्य और मेहनत के साथ एक पारंपरिक कश्मीरी घर का लकड़ी से बना मॉडल तैयार किया। ये कोई आम मॉडल नहीं है। इसमें पुराने कश्मीरी घरों के दरवाज़े, खिड़कियां, लकड़ी की बारीक नक़्क़ाशी और छतों को बिल्कुल वैसे ही दिखाया गया है, जैसा कभी असल ज़िंदगी में हुआ करता था। इस मॉडल की सबसे ख़ास बात इसकी छत है। इसमें कश्मीर में इस्तेमाल होने वाली चार अलग-अलग पारंपरिक छतों के डिज़ाइन एक ही जगह पर दिखाए गए हैं। फ़ारूक़ बताते हैं कि कश्मीर घाटी में ये अपनी तरह का पहला मॉडल है, जिससे लोग एक ही नज़र में पारंपरिक घरों की पूरी समझ हासिल कर सकते हैं।

Source: DNN24

छतें जो मौसम को समझती थी

कश्मीर की पारंपरिक छतें सिर्फ़ देखने में सुंदर नहीं थीं, बल्कि बेहद समझदार डिज़ाइन का नतीजा थी। लकड़ी, मिट्टी और घास से बनी ये छतें बर्फ़ को आसानी से फिसलने देती थी। सर्दियों में ये घर को गर्म रखते थे और गर्मियों में ठंडक बनाए रखते थे। घर के अंदर ख़तंबंद छतें होती थीं, जिनमें अखरोट की लकड़ी से बनी ज्यामितीय नक़्क़ाशी दिखाई देती थी। ये कारीगरी सिर्फ़ कला नहीं थी, बल्कि नेचर के साथ बैलेंस में जीने की एक सीख थी।

बच्चों के खिलौनों से विरासत तक का सफ़र

फ़ारूक़ बताते हैं कि तीन साल पहले वो बच्चों के खिलौनों पर काम किया करते थे। तभी उनके मन में ख़्याल आया कि क्यों न ऐसा खिलौना बनाया जाए, जिससे बच्चे खेलते-खेलते अपनी संस्कृति को भी जान सकें। यही खिलौना धीरे-धीरे ‘पाश ताए पाहेर’ (Pash Tae Peaher) का रूप ले गया। उनका मक़सद साफ़ है हमारी समाजी और सांस्कृतिक विरासत को भुलाया न जाए, बल्कि उसे नए सिरे से लोगों के सामने लाया जाए। ताकि बच्चे अपनी जड़ों से जुड़ सकें और समझ सकें कि वो किस परंपरा से आते हैं।

विरासत के साथ रोज़गार की सोच

‘पाश ताए पाहेर’ (Pash Tae Peaher) सिर्फ़ भावनाओं से जुड़ा प्रोजेक्ट नहीं है, इसमें रोज़गार की संभावनाएं भी छिपी हैं। फ़ारूक़ का कहना है कि आगे चलकर इस मॉडल के छोटे-छोटे वर्ज़न बनाए जाएंगे। इन्हें इंटीरियर डिज़ाइन, गिफ़्ट आइटम्स और सजावटी चीज़ों के रूप में इस्तेमाल किया जा सकेगा। इससे स्थानीय स्तर पर कारोबारी गतिविधियां बढ़ेंगी और ख़ासकर युवाओं के लिए रोज़गार के नए मौक़े पैदा होंगे। यानी विरासत भी बचेगी और रोज़ी-रोटी भी चलेगी।

Source: DNN24

चमक-दमक में खोती विरासत

फ़ारूक़ मानते हैं कि आज की दुनिया की चमक-दमक ने लोगों को अपने असलाफ़ की विरासत से दूर कर दिया है। उनका कहना है कि ज़रूरत इस बात की है कि परंपरा को पुराने ढंग से नहीं, बल्कि नई टेक्नोलॉजी और नए नज़रिए के साथ पेश किया जाए। फ़ारूक़ ने आने वाले 10–12 सालों के लिए 6E मॉडल की कल्पना की है। इसमें सबसे पहले है एंटरटेनमेंट, ताकि बच्चे इंटरस्ट लें। फिर आता है एक्सपेरिमेंट, एक्सप्लोर, एक्सप्लॉइटेशन, एक्सीलेंस और आखिर में एंटरप्रेन्योरशिप।

इस पूरे मॉडल का मक़सद एक मज़बूत ह्यूमन रिसोर्स चेन तैयार करना है जहां रिसर्च, प्रोटोटाइपिंग, प्रोडक्शन और मार्केटिंग, सब कुछ एक सिस्टम के तहत हो। फ़ारूक़ कहते हैं, “अगर हमें अपना अतीत नहीं पता होगा, तो हम भविष्य से मुकाबला नहीं कर पाएंगे।” लकड़ी के हर छोटे-से हिस्से के साथ वो कश्मीर को उसकी उस विरासत की याद दिला रहे हैं, जो कभी इस घाटी की पहचान हुआ करती थी। ‘पाश ताए पाहेर’ (Pash Tae Peaher) सिर्फ़ एक मॉडल नहीं, बल्कि एक कोशिश है कश्मीर को उसके जड़ों से फिर से जोड़ने की।

ये भी पढ़ें: शबनम बशीर(Shabnam Bashir): वो रहनुमा जिसने कश्मीर की अनदेखी राहों को दुनिया से रूबरू कराया

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