जम्मू-कश्मीर की कड़ाके की ठंड हमेशा से Silkworm (सेरीकल्चर) के काम के लिए सबसे बड़ी रुकावट रही हैं। साल के ज़्यादातर महीनों में ये काम ठहर जाता था, जिससे किसानों की आमदनी पर सीधा असर पड़ता था। लेकिन अब कश्मीर के एक साइंटिस्ट ने ऐसी नई तकनीक तैयार की है, जिसने इस हालात को बदल दिया है। अब Silkworm के कीड़े सिर्फ मौसम के भरोसे नहीं रहेंगे, बल्कि सालभर पाले जा सकेंगे और यही बदलाव किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर सामने आया है।
नई सोच, नई शुरुआत
कश्मीर के कृषि वैज्ञानिक डॉ. फिरदौस अहमद मलिक ने एक ऐसी तकनीक तैयार की है, जिससे अब कड़ी सर्दियों में भी Silkworm के कीड़े पाले जा सकते हैं। उन्होंने नैनो टेक्नोलॉजी पर आधारित एक ख़ास आर्टिफिशियल खाना और सोलर से चलने वाला स्मार्ट ग्रोथ चैंबर बनाया है।
डॉ. मलिक ने बताया, “ये सब कई सालों की मेहनत का नतीजा है।” वो Sher-e-Kashmir University of Agricultural Sciences and Technology में साइंटिस्ट और असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं। उनका कहना है, “इतनी सर्दी में भी अगर हम इन कीड़ों को पाल पा रहे हैं, तो ये हमारे लिए बड़ी कामयाबी है।”

क्यों मुश्किल था ये काम?
कश्मीर में Silkworm के कीड़े पालना हमेशा से आसान नहीं रहा। यहां सर्दियां बहुत लंबी और सख़्त होती हैं, जिसकी वजह से ये काम साल में सिर्फ 4–5 महीने ही हो पाता था। इसके अलावा, इन कीड़ों का पूरा दारोमदार शहतूत (मलबरी) के पत्तों पर होता है, जो हर मौसम में आसानी से नहीं मिलते।
Silkworm के कीड़ों को सही तरह से पालने के लिए एक मुकम्मल माहौल चाहिए होता है जैसे 24 से 28 डिग्री तापमान, 70 से 85 फ़ीसदी नमी, दिन में 16 घंटे रोशनी और 8 घंटे अंधेरा। साथ ही साफ़-सफ़ाई का भी ख़ास ख़याल रखना पड़ता है, वरना बीमारी फैलने का ख़तरा बना रहता है। यही वजह थी कि ये काम मौसम तक ही महदूद रह जाता था।
नई टेक्नोलॉजी ने बदली तस्वीर
डॉ. मलिक ने इस मसले का हल निकालने के लिए नई राह अपनाई। उन्होंने एक ख़ास नैनो-बेस्ड आर्टिफिशियल डाइट तैयार की, जिससे अब शहतूत के पत्तों पर पूरी तरह निर्भर रहने की ज़रूरत नहीं रही। ये डाइट प्रोटीन, एंजाइम और दूसरे ज़रूरी पोषक तत्वों से तैयार की जाती है। इसे बनाने के लिए पाउडर को पानी में मिलाकर पकाया जाता है, फिर इसे बर्तनों में डालकर जमने दिया जाता है।
जब ये सख़्त हो जाता है, तो इसे छोटे टुकड़ों में तोड़कर ट्रे में फैला दिया जाता है, ताकि कीड़े आसानी से इसे खा सकें। इस नैनो टेक्नोलॉजी की सबसे बड़ी ख़ासियत ये है कि इससे पोषण सीधे और बेहतर तरीके से कीड़ों तक पहुंचता है, जिससे उनकी बढ़त अच्छी होती है, चाहे ताज़े पत्ते मौजूद हों या नहीं।

स्मार्ट ग्रोथ चैंबर: आसान और असरदार तरीका
डॉ. मलिक की दूसरी बड़ी कोशिश एक स्मार्ट ग्रोथ चैंबर है, जो सोलर पावर से चलता है और सेंसर के ज़रिए अपने आप काम करता है। ये सिस्टम ख़ास तौर पर अंडों और शुरुआती स्टेज के कीड़ों के लिए बनाया गया है।
इस चैंबर में तापमान, नमी और रोशनी अपने आप कंट्रोल होती रहती है। इसमें 6 घंटे का बैकअप भी दिया गया है, जिससे बिजली जाने पर भी काम नहीं रुकता। इसके अलावा, इसमें रियल-टाइम मॉनिटरिंग होती है, जिससे इंसानी दखल कम होता है और गलती की गुंजाइश भी घट जाती है। डॉ. मलिक कहते हैं, “ये अपने तरह का पहला सिस्टम है, जो कश्मीर जैसे इलाकों में सालभर काम कर सकता है।”
किसानों के लिए नई उम्मीद
इन दोनों तकनीकों की मदद से अब सालभर Silkworm के कीड़े पाले जा सकते हैं। इससे किसानों की आमदनी में इज़ाफ़ा हो सकता है और उन्हें मौसम पर कम निर्भर रहना पड़ेगा। जम्मू-कश्मीर का रेशम सेक्टर देश के अहम सेरीकल्चर इलाकों में से एक है। यहां हज़ारों परिवारों की रोज़ी-रोटी इसी काम से जुड़ी हुई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, ये सेक्टर हर साल करीब 2027 लाख रुपये की आमदनी करता है, 34,000 से ज़्यादा घरों को सहारा देता है और 2,880 गांवों में फैला हुआ है। इसके अलावा, ये हर साल करीब 3.6 लाख मैन-डे रोज़गार भी पैदा करता है।
रेशम बनने का पूरा सफ़र
Silkworm के कीड़े पांच मरहलों (स्टेज) में बढ़ते हैं। पहले मरहले में छोटे-छोटे कीड़ों को नरम शहतूत के पत्ते खिलाए जाते हैं। जैसे-जैसे वो बड़े होते हैं, उनकी खुराक बढ़ती जाती है और उनका जिस्म तेज़ी से बढ़ता है। चौथे मरहले तक आते-आते कीड़े काफी ज़्यादा खाते हैं और अपना ज़्यादातर वज़न इसी दौरान बढ़ाते हैं। पांचवें और आखिरी मरहले में वो खाना छोड़ देते हैं और कोकून बनाना शुरू कर देते हैं।

इसके बाद कोकून को गरम पानी में डाला जाता है, जिससे उसका नेचुरल गोंद नरम हो जाता है। फिर बहुत एहतियात से उसमें से पतला Silkworm का धागा निकाला जाता है। कई धागों को मिलाकर एक मज़बूत धागा बनाया जाता है, जिससे आगे चलकर Silkworm का कपड़ा तैयार होता है।
कैसे आया ये आइडिया?
डॉ. मलिक बताते हैं कि 2024 में उन्होंने महसूस किया कि सर्दियों और शहतूत के पत्तों की कमी की वजह से ये काम धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। वो कहते हैं, “हमें लगा कि सिर्फ़ मौसम पर निर्भर रहना किसानों के लिए मुश्किल बन रहा है।” इसके बाद उन्होंने लगातार तीन सर्दियों तक इस पर काम किया और कई तजुर्बे किए। आखिरकार उन्हें कामयाबी मिली। उन्होंने अपने रिसर्च को पब्लिश किया है और इसके लिए पेटेंट के लिए भी दरख़्वास्त दी है। उनका मानना है कि ये तकनीक कश्मीर के Silkworm इंडस्ट्री को फिर से उसकी पुरानी पहचान दिला सकती है।
फरवरी महीने में सेरीकल्चर डिपार्टमेंट के डायरेक्टर Aijaz Ahmad Bhat ने इस मॉडल का जायजा लिया। उन्होंने इस पहल की सराहना की और कहा कि इससे किसानों को काफी फ़ायदा होगा। उन्होंने कहा, “ये एक अच्छा मॉडल है। हम इसे ज़मीन पर लागू करके देखेंगे, ताकि किसानों के लिए इसे और बेहतर और आसान बनाया जा सके।”

मक़सद: किसानों और युवाओं के लिए नए मौके
डॉ. मलिक, SKUAST के वाइस चांसलर Nazir Ahmad Ganai के मिशन पर काम कर रहे हैं। इस मिशन का मकसद है किसानों को सस्ती, टिकाऊ और नई टेक्नोलॉजी मुहैया कराना, ताकि उनकी आमदनी में इज़ाफ़ा हो सके। डॉ. मलिक कहते हैं, “ये सिर्फ़ एक तजुर्बा नहीं है, बल्कि एक कोशिश है रेशम इंडस्ट्री को मज़बूत बनाने की, किसानों को सहारा देने की और नौजवानों के लिए नए मौके पैदा करने की।”
डॉ. मलिक की ये कोशिश सिर्फ़ एक नई टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि कश्मीर के किसानों के लिए एक नई राह है। अब सर्दियों की सख़्ती भी उनके हौसले को नहीं रोक पाएगी। ये पहल न सिर्फ़ रेशम इंडस्ट्री को नई ज़िंदगी दे सकती है, बल्कि हज़ारों परिवारों के लिए बेहतर मुस्तक़बिल (भविष्य) की राह भी खोल सकती है।
ये भी पढ़ें: ‘Kashmir Ki Kali’: सुजाता की पहल जो कश्मीर की महिलाओं को हुनर, पहचान और रोज़गार से जोड़ रही है
आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।


