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अंजुम रहबर: तालीम से तख़य्युल तक शायराना सफ़र, जिनके आंगन में अमीरी का शजर लगता है…

उर्दू-हिंदी साहित्य की वो शायरा जिनके एक-एक शेर में जिंदगी का दर्द, मोहब्बत की मिठास और समाज की नब्ज़ साफ झलकती है। गुना की मिट्टी से निकलकर दुनिया भर के मुशायरों में तहलका मचाने वाली अंजुम रहबर का सफ़र कोई साधारण कहानी नहीं, बल्कि एक ऐसी ग़ज़ल है जो दिलों को छू जाती है। उनकी पैदाइश 17 सितंबर 1962 को मध्य प्रदेश के गुना ज़िले में हुई, जहां से शुरू होता है उनका वो सफ़र जो आज भी लाखों दिलों को थामे हुए है।

बचपन की शायरी भरी महफ़िलें

इमेजिन कीजिए एक छोटे से शहर गुना की गलियों में, जहां हवा में उर्दू शेरों की ख़ुशबू घुली रहती थी। अंजुम रहबर की  पैदाइश ऐसे घराने में हुआ जहां उनके वालिद मोहम्मद हुसैन रहबर न सिर्फ़ जाने-माने हकीम थे, बल्कि शायराना मिजाज़ के भी हस्ती। गुना में उनकी ‘बज़्म-ए-अदब’ नाम की साहित्यिक महफ़िल घर के आंगन में सजती थी। देश के बड़े-बड़े शायर यहां आते, रुकते, ग़ज़लें सुनाते। आठ भाई-बहनों में सबसे बड़ी अंजुम नन्हीं उम्र में ही इन महफ़िलों की ख़िदमत करतीं। चाय परोसना, लोगों का स्वागत करना, ये सब उनके रोज़ का हिस्सा था।

ऐसे माहौल में शायरी तो जैसे खून में घुल गई। बचपन से ही तुकबंदियां करने लगीं। कभी आंगन में खेलते हुए, कभी मां के साथ रसोई में, शब्दों की वो जादुई दुनिया उनके दिल में बस गई। पिता की ग़ज़लें सुन-सुनकर उनका कानों में राग बस गया। मुरैना के ननिहाल से गुना तक का ये सफ़र शायरी की नींव रख गया। नन्हीं अंजुम के मन में सवाल उठते।  मोहब्बत क्या है? जुदाई का दर्द कैसा होता है? ये सवाल बाद में उनके शेर बनकर मुशायरों में गूंजे।

गुना की मिट्टी ने सिर्फ़ जड़ें दीं, लेकिन उड़ान के लिए तालीम ज़रूरी थी। अंजुम रहबर ने जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर से उर्दू साहित्य में एमए किया। वो दौर था जब लड़कियां घर की चारदीवारी से बाहर निकलना मुश्किल समझा जाता था, लेकिन अंजुम ने किताबों के सफ़र को चुना। उर्दू के क्लासिक्स  मीर, ग़ालिब, इक़बाल। इनकी छांव में उनकी शायरी पकी।

एमए के दौरान ही उन्होंने महसूस किया कि शायरी सिर्फ़ किताबी नहीं, बल्कि ज़िंदगी की बोलचाल है। इसलिए उन्होंने ख़ालिस उर्दू को छोड़कर हिंदी-उर्दू का वो मेल तैयार किया जो आम आदमी की ज़बान है। ग्वालियर की यूनिवर्सिटी से निकलकर वो भोपाल पहुंचीं, जहां आज उनका बसेरा है। ये तालीम सिर्फ़ डिग्री नहीं, बल्कि शायरी का हथियार बनी।

पहला मुशायरा: अब्बा की ग़ज़ल से आगाज़

1977 का वो साल, जब अंजुम रहबर महज़ 15 साल की थीं। पहला मुशायरा  और वो भी अपने वालिद साहब की ग़ज़ल पढ़कर। कल्पना कीजिए स्टेज पर खड़ी नन्हीं लड़की, हाथ कांप रहे होंगे, लेकिन दिल में शेरों का समंदर। तालियां गूंजी, और बस सिलसिला शुरू। मुशायरों के दरवाजे़ खुल गए। कवि सम्मेलनों में शिरकत बढ़ी।

धीरे-धीरे नाम हुआ। एक मुशायरे में मशहूर शायर राहत इंदौरी साहब से मुलाक़ात। तीन-चार साल की दोस्ती, भेंटें, और 1988 में शादी। राहत साहब पहले से विवाहित थे, इंदौर में परिवार था, लेकिन मोहब्बत ने राह दिखाई। ये रिश्ता बाद में चुनौतियों से गुज़रा, लेकिन अंजुम की शायरी कभी रुकी नहीं। जुदाई के दर्द ने उनकी ग़ज़लों को और गहरा कर दिया। बेटा समीर राहत इस सफ़र का हिस्सा बना।

मुशायरों का तूफ़ान: टीवी से विदेश तक

शायरी का असली इम्तिहान मुशायरा है। अंजुम रहबर ने 1977 से ही ये इम्तिहान पास किया। राष्ट्रीय चैनलों  एबीपी न्यूज़, SAB TV, सोनी पाल, ETV नेटवर्क, DD उर्दू   पर पाठ किया।  2019 के कपिल शर्मा होली स्पेशल में स्टेज पर आते ही सन्नाटा, फिर तालियों की बौछार। उनकी आवाज़ में वो जादू है जो चांद-तारों को क़दमों में बिछा देता है।

विदेशी सफ़र में अमेरिका, कनाडा, पाकिस्तान, ओमान, दुबई, कतर, जेद्दाह, शारजाह। दुबई के गणतंत्र दिवस मुशायरे में तहलका। इंदौर के कवि सम्मेलन में कोरोना के बाद पहला पाठ-भावुक हो गईं, दर्शक रो पड़े। हिंदी मंचों ने भी सर-आंखें ले लिया। उर्दू की पाकीज़गी के साथ हिंदी की सहज रवानी, और शेर जो दिल में उतर जाते हैं।

शेरों का ख़ज़ाना: दिल को छूने वाले रंग

अंजुम रहबर की शायरी मोहब्बत, जुदाई, समाज का आईना।

जिन के आंगन में अमीरी का शजर लगता है
उन का हर ऐब ज़माने को हुनर लगता है

चांद तारे मिरे क़दमों में बिछे जाते हैं
ये बुज़ुर्गों की दुआओं का असर लगता है

मां मुझे देख के नाराज़ न हो जाए कहीं
सर पे आंचल नहीं होता है तो डर लगता है

ज़िंदगी को ज़िंदगी के वास्ते
रोज़ जीना रोज़ मरना चाहिए

दोस्ती से तजुर्बा ये हो गया
दुश्मनों से प्यार करना चाहिए

प्यार का इक़रार दिल में हो मगर
कोई पूछे तो मुकरना चाहिए

दफ़ना दिया गया मुझे चांदी की क़ब्र में
मैं जिस को चाहती थी वो लड़का ग़रीब था

मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था
वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था

सच बात मान लीजिए चेहरे पे धूल है
इल्ज़ाम आइनों पे लगाना फ़िज़ूल है

अंजुम रहबर

ये शेर मुशायरों में तालियों की बौछार लाते। ‘मलमल कच्चे रंगों की’ उनकी 2018 की किताब, जो शायरी का रंगीन कोहिनूर। ग़ज़लें, गीत – सब कुछ।

पुरस्कारों की बरसात

इंदिरा गांधी अवार्ड (1986), रामरिख मनहर अवॉर्ड, साहित्य भारती, हिंदी साहित्य सम्मेलन, अखिल भारतीय कविवर विद्यापीठ, दैनिक भास्कर, चित्रांश फिराक गोरखपुरी, गुना का गौरव। ये सम्मान हिंदी-उर्दू को जोड़ने का इनाम। ज़िंदगी में तूफान आए। राहत इंदौरी से रिश्ता टूटा, लेकिन शायरी ने सहारा दिया। भावुक पाठों में दर्द झलकता। फिर भी, मुशायरों में वापसी। नई पीढ़ी को प्रेरणा – शायरी से कुछ भी संभव। भोपाल से दुनिया जीतीं।

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