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शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी: उर्दू अदब का वो दरख़्शां आफ़ताब, जिसने सोचने का बदल दिया नज़रिया

जब हम उर्दू अदब के इतिहास पर नज़र डालते हैं, तो कुछ शख़्सियतें ऐसी नज़र आती हैं जिन्होंने न सिर्फ़ लिखा, बल्कि लिखने के ढंग और सोचने के नज़रिए को ही बदल दिया। शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी उन्हीं गिने-चुने नामों में से एक हैं। वह ऐसे अदीब थे जिन्होंने पढ़ने, समझने और परखने का नया तरीक़ा सिखाया। 

बचपन और इल्मी विरासत

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी की पैदाइश 30 सितंबर 1935 को उत्तर प्रदेश के ज़िले प्रतापगढ़ में हुई, जो उनका ननिहाल था। उनका असल वतन आज़मगढ़ था। इल्म और अदब से उनका रिश्ता विरसे में मिला था। उनके दादा हकीम मौलवी मुहम्मद असगर फ़ारूक़ी तालीम के शोबे से वाबस्ता थे और मशहूर शायर फ़िराक़ गोरखपुरी के उस्ताद भी रह चुके थे। नाना मुहम्मद नज़ीर ने भी एक स्कूल क़ायम किया था, जो बाद में कॉलेज बना। यानी घर का माहौल ही ऐसा था जहां किताब, क़लम और बहस रोज़मर्रा की चीज़ें थीं।

बचपन में ही उन्हें शायरी से दिलचस्पी हो गई। महज़ 7 साल की उम्र में उन्होंने एक मिसरा लिखा- “मालूम क्या किसी को मिरा हाल-ए-ज़ार है”

गुलिस्तान और शुरुआती तजुर्बे

शायरी पूरी न हो सकी तो उन्होंने क़लम का दूसरा रास्ता चुना। अपनी बड़ी बहन के साथ मिलकर उन्होंने एक हस्तलिखित रिसाला ‘गुलिस्तान’ निकाला। यह कोई मामूली कोशिश नहीं थी—सोला, बीस या चौबीस सफ़हात काटकर, उन पर कहानियां, कविताएं और नोट्स लिखे जाते।

उनके वालिद ने जब यह रिसाला देखा तो उन्होंने ग़लत बहर और ना-मौज़ूं अशआर की निशानदेही की और हर मिसरे की तराशकर समझाया। यही वह लम्हा था जब फ़ारूक़ी साहब ने तय कर लिया कि आगे चलकर वह अरूज़ को गंभीरता से सीखेंगे।

तालीम और इलाहाबाद का ज़माना

मैट्रिक उन्होंने आज़मगढ़ से किया और गोरखपुर से ग्रेजुएशन। इसके बाद इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. के लिए दाख़िला लिया। इलाहाबाद का वह ज़माना ख़ुद में एक कहानी है। वह अक्सर कई मील पैदल चलते हुए यूनिवर्सिटी जाते, हाथ में खुली किताब होती और चलते-चलते पढ़ते रहते। लोग उनकी तन्हाई और मुताले की दीवानगी देखकर ख़ुद ही रास्ता दे देते थे।

एम.ए. में उन्होंने पूरी यूनिवर्सिटी में पहली पोज़ीशन हासिल की। उनकी तस्वीर अंग्रेज़ी अख़बार ‘अमृत बाज़ार पत्रिका’ में छपी, जिस पर पूरा ख़ानदान फ़ख़्र करता था। यहीं उनकी मुलाक़ात अपनी क्लास फेलो जमीला ख़ातून हाशमी से हुई, जो आगे चलकर जमीला फ़ारूक़ी बनीं। उनकी ज़िंदगी की सबसे मज़बूत साथी। जमीला फ़ारूक़ी ने उन्हें जज़्बाती, माली और घरेलू हर तरह का सहारा दिया, ताकि फ़ारूक़ी साहब पूरी तरह अदब में मनन कर सकें।

नौकरी और अदबी पहचान

एम.ए. के बाद उन्होंने कुछ समय तदरीस (शिक्षण) से जुड़ाव रखा, मगर साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी जारी रखी। 1957–58 में वह भारतीय डाक एवं तार सेवा में चुन लिए गए। नौकरी के सिलसिले में उन्हें हिंदुस्तान के कई शहरों और विदेशों में रहने का मौक़ा मिला। यही वह दौर था जब उनके तनक़ीदी मज़ामीन और तर्जुमे छपने लगे और अदबी दुनिया उनकी तरफ़ मुतवज्जेह होने लगी।

1960 के दशक की शुरुआत में उर्दू में तरक़्क़ी-पसंद तहरीक का ज़ोर टूट रहा था। अदब को सिर्फ़ सामाजिक–राजनीतिक मक़सद का औज़ार मानने की सोच हावी थी। फ़ारूक़ी साहब इससे मुत्तफ़िक़ नहीं थे। उनका मानना था कि साहित्य को शिल्प, भाषा और सौंदर्य के पैमाने पर भी परखा जाना चाहिए। इसी सोच से जून 1966 में उन्होंने अदबी रिसाला ‘शबख़ून’ शुरू किया। नाम ही बताता है रात में अचानक किया गया हमला। यह हमला पुरानी, जमी-जमाई सोच पर था। हालांकि रिसाले पर बतौर मुदीर उनका नाम नहीं छपता था, मगर पूरी दुनिया जानती थी कि इसकी रूह-ओ-रवां वही हैं। ‘शबख़ून’ ने उर्दू लेखकों की दो नस्लों की तर्बियत की और पूरे 39 साल तक पाबंदी से छपता रहा।

मीर और ‘शेर-ए-शोर-अंगेज़’

फ़ारूक़ी साहब का सबसे बड़ा आलोचनात्मक काम है ‘शेर-ए-शोर-अंगेज़’-चार जिल्दों में मीर तक़ी मीर की ऐसी तफ़हीम, जिसकी मिसाल उर्दू अदब में नहीं मिलती। इस किताब ने यह साबित किया कि मीर सिर्फ़ दुख के शायर नहीं, बल्कि भाषा, शिल्प और विचार के बेहतरीन कलाकार थे। इसी किताब पर उन्हें 1996 में सरस्वती सम्मान मिला।

दास्तान और ‘होशरुबा’ की वापसी

फ़ारूक़ी साहब का एक और ऐतिहासिक योगदान दास्तानों पर उनका काम है ख़ास तौर पर ‘दास्तान-ए-अमीर हमज़ा’ और ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’। आधुनिक दौर में इन दास्तानों को “बचकों का साहित्य” कहकर नज़रअंदाज किया जा रहा था।  ये दास्तानें ज़बानी परंपरा, जादुई भाषा और कल्पना की ताक़त का बेहतरीन नमूना हैं।

उन्होंने अपने भतीजे महमूद फ़ारूक़ी को दास्तानगोई के लिए प्रेरित किया, जिससे यह परंपरा आज फिर ज़िंदा है। लंबे अरसे तक आलोचना में डूबे रहने के बाद फ़ारूक़ी साहब ने 1990 के दशक में फिर से कथा साहित्य की ओर रुख़ किया।

उनका शाहकार उपन्यास ‘कई चांद थे सर-ए-आसमां’ (2006) उर्दू के आधुनिक क्लासिक्स में शुमार होता है। यह उपन्यास मुग़ल दौर की तहज़ीब, समाज और औरत की दुनिया को बेहद खूबसूरती से पेश करता है। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद ‘The Mirror of Beauty’ के नाम से दुनिया भर में पढ़ा गया।

इल्म की वुसअत और आख़िरी सफ़र

फ़ारूक़ी साहब की इल्मियत हैरान कर देने वाली थी। शेक्सपियर से लेकर मीर तक, सूफ़ी मत से लेकर हिंदू पौराणिक कथाओं तक, हर चीज़ पर उनकी पकड़ थी। दिसंबर 2020 के आख़िर में इलाहाबाद में उन्होंने इंतक़ाल फ़रमाया। उन्होंने न सिर्फ़ हमें जीने का मक़सद सिखाया, बल्कि मरने का सलीक़ा भी।

सम्मान और विरासत

  • पद्मश्री (2009)
  • सितारा-ए-इम्तियाज़, पाकिस्तान (2010)
  • सरस्वती सम्मान
  • साहित्य अकादमी पुरस्कार
  • अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से डी.लिट.

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी सिर्फ़ एक नाम नहीं, एक दौर हैं। उन्होंने हमें सिखाया कि अदब को पढ़ना भी एक इबादत है वह एक ऐसे दरिया की तरह थे जिसकी गहराई को नापना नामुमकिन है, और जिसकी लहरों ने उर्दू अदब के हर किनारे को छुआ।

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