उर्दू ज़ुबान सिर्फ़ एक भाषा नहीं, बल्कि हिंदुस्तान की मिली-जुली तहज़ीब, विरासत और सांस्कृतिक पहचान का नाम है। इस ज़ुबान को ज़िंदा रखने, आगे बढ़ाने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने में जिन संस्थाओं ने अहम किरदार निभाया है, उनमें Anjuman Taraqqi Urdu (Hind) का नाम सबसे ऊपर आता है। ये संस्था बीते एक सौ साल से ज़्यादा वक्त से उर्दू के विकास, उसकी तालीम और उसके अदब की ख़िदमत में लगी हुई है।
Anjuman Taraqqi Urdu (Hind) भारत की सबसे क़दीम उर्दू अदबी संस्था मानी जाती है, जिसे आम तौर पर “उर्दू घर” के नाम से भी जाना जाता है। ये इदारा उर्दू ज़ुबान और अदब की हिफ़ाज़त, तरक़्क़ी के लिए काम करता है। आज अंजुमन की 650 से ज़्यादा शाखाएं देशभर में फैली हुई हैं, जो उर्दू के साथ-साथ गंगा-जमुनी तहज़ीब की ख़िदमत में अहम भूमिका निभा रही हैं।
अंजुमन की बुनियाद और वैचारिक पृष्ठभूमि
रिसर्च स्कॉलर सलीम फ़ारूक नदवी ने DNN24 को बताया कि Anjuman Taraqqi Urdu (Hind) की सोच की बुनियाद सर सैयद अहमद ख़ान के विचारों से जुड़ी है। सन 1882 में मुस्लिम एजुकेशनल कॉन्फ़्रेंस के ज़रिए उन्होंने तालीम के साथ-साथ ज़ुबान के सवाल को भी क़ौम के सामने रखा। उस दौर में उर्दू को लेकर एक विवाद पैदा हो गया था। कुछ लोग इसे सिर्फ़ मुसलमानों की ज़ुबान मानने लगे थे और हिन्दी को देश की इकलौती असली ज़ुबान बताने की कोशिश हो रही थी। सर सैयद अहमद ख़ान ने इस सोच का विरोध किया और साफ़ कहा कि उर्दू दरअसल हिंदुस्तानी ज़ुबान है, जो इस मुल्क की गंगा-जमुनी तहज़ीब की पैदाइश है।

संस्था का शुरुआती दौर
इसी आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए सन 1903 में Anjuman Taraqqi Urdu (Hind) को एक मुस्तक़िल इदारे के तौर पर क़ायम किया गया। इसके पहले सेक्रेटरी अल्लामा शिबली नोमानी बने, जो अपने इल्मी क़द और अदबी योगदान के लिए जाने जाते हैं। उनके साथ ही उनके काबिल शागिर्द मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को असिस्टेंट सेक्रेटरी की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। इन दोनों हस्तियों की मौजूदगी ने अंजुमन को मज़बूत बौद्धिक दिशा दी और उर्दू अदब को एक संगठित मंच मिला।
उर्दू के हक़ में ऐतिहासिक भूमिका
अंजुमन तरक्क़ी उर्दू हिंद ने सिर्फ़ किताबें छापने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि जब भी उर्दू ज़ुबान पर संकट आया, ये संस्था मज़बूती से उसके साथ खड़ी रही। सन 1951 में, जब उत्तर प्रदेश में उर्दू के ख़िलाफ़ आंदोलन तेज़ हो गया था, अंजुमन ने लाखों लोगों के दस्तख़त इकट्ठा कर देश के सद्र-ए-जम्हूरियत (राष्ट्रपति) को ज्ञापन सौंपा। इसका असर ये हुआ कि उत्तर प्रदेश में उर्दू को दूसरी सरकारी ज़ुबान का दर्जा मिला, जो आज भी कायम है। ये अंजुमन की दूरदर्शिता और संघर्ष का बड़ा उदाहरण है।
किताबें, तहक़ीक़ और अदबी ख़िदमत
उर्दू अदब की फील्ड में Anjuman Taraqqi Urdu (Hind) का योगदान बेहद बड़ा रहा है। संस्था ने इतिहास, साहित्य, शिक्षा और रिसर्च से जुड़ी हज़ारों किताबें प्रकाशित की हैं। पुरानी और दुर्लभ किताबों को दोबारा प्रकाशित और संरक्षण करना और नई पीढ़ी के लिए पाठ्यक्रम से जुड़ी सामग्री तैयार करना अंजुमन की अहम ज़िम्मेदारियों में शामिल रहा है। अंजुमन का मक़सद हमेशा ये रहा है कि उर्दू को एक मुक़म्मल इल्मी ज़ुबान के तौर पर पेश किया जाए।

सेमिनार, ट्रेनिंग और पत्रिकाएं
Anjuman Taraqqi Urdu (Hind) उर्दू शिक्षा के लिए टीचरों की ट्रेनिंग, क़ौमी सेमिनार और अदबी बैठकों का आयोजन भी करती है। इसके साथ ही संस्था दो मैगज़ीन पब्लिश करती है। छमाही पत्रिका “उर्दू अदब” पिछले 103 सालों से लगातार पब्लिश हो रही है, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। वहीं हर हफ़्ते आने वाली मैगज़ीन “हमारी ज़ुबान उर्दू” आम पाठकों के बीच ख़ासी लोकप्रिय है।
डिजिटल दौर में नई पहल
इंटरनेट और डिजिटल मीडिया के इस दौर में Anjuman Taraqqi Urdu (Hind) ने भी ख़ुद को समय के साथ ढाला है। कोशिश रहती है कि समय के साथ-साथ अपनी बातें लोगों तक पहुंचा देते हैं। संस्था की अपनी वेबसाइट है, जहां उसकी प्रकाशित किताबें और करीब 150 साल पुरानी लाइब्रेरी से जुड़ी सभी जानकारी पीडीएफ़ के तौर पर मौजूद है। इससे देश-विदेश के रिसर्चर, स्टूडेंट और उर्दू प्रेमी आसानी से इस इल्मी ख़ज़ाने तक पहुंच पा रहे हैं।

पढ़ने की आदत और सामाजिक ज़िम्मेदारी
सलीम फ़ारूक नदवी कहते हैं कि आज का सबसे बड़ा अफ़सोस ये है कि हमारे समाज में किताबें पढ़ने और ख़रीदने की संस्कृति कम होती जा रही है, ख़ासतौर पर उर्दू किताबों के मामले में। बच्चों के हाथों में मोबाइल है, लेकिन किताब नहीं। ज़रूरत है कि हम अपने घरों में छोटी ही सही, मगर एक लाइब्रेरी ज़रूर बनाएं और बच्चों को किताबों से जोड़ें।
Anjuman Taraqqi Urdu (Hind) सिर्फ़ एक संस्था नहीं, बल्कि उर्दू ज़ुबान की रूह है। ये इदारा बीते एक सौ साल से उर्दू की हिफ़ाज़त, तरक्क़ी और तालीम में लगा हुआ है। आज जब ज़ुबान और किताब दोनों हाशिए पर जा रही हैं, ऐसे में अंजुमन जैसे इदारों की अहमियत और भी बढ़ जाती है। उर्दू को ज़िंदा रखना दरअसल अपनी साझा तहज़ीब और विरासत को ज़िंदा रखना है।
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