Wednesday, October 7, 2026
26.5 C
Delhi

कश्मीर की कला में पश्मीना और आधुनिक चरखा से निखार 

कश्मीर की ख़ूबसूरत वादियां हर किसी को अपने आगोश में ले लेती हैं, जो भी कश्मीर आता है, दिवाना हो जाता है। अगर कश्मीर की कारीगरी की बात करें तो वो बेमिसाल है। घाटी में कला और शिल्प को जिंदा रखने के लिए कारीगर दिन-रात काम करते हैं। कश्मीर में टेक्सटाइल ट्रेडिशन का इतिहास काफ़ी पुराना है, कानी शॉल हो, पश्मीना शॉल हो या अमलीकर सुई का काम, आज भी हाथ से बुने हुए टेक्सटाइल प्रोडक्ट्स  कश्मीरी कुशल बुनकर (skilled weavers) की ख़ासियत हैं। इसी वजह से कश्मीरी हस्तशिल्प आइटम की डिमांड ज़्यादा रहती है।

पश्मीना शॉल, जिसे पश्मियां भी कहते हैं, जो पश्मीना बकरी के ऊन से बनाई जाती है। कश्मीर में पश्मीना शॉल का काम सदियों से होता आ रहा है। इस चरखा को कश्मीर में स्थानीय तौर पर “येंडर” कहा जाता है। और ये कश्मीरी ट्रेडिशन का एक अहम हिस्सा माना जाता है। येंडर की मदद से पश्मीना रेशे से धागे बनाए जाते हैं। लेकिन, अब आधुनिक चरखा (Modern charkha) से धागे को तैयार किया जाता है।  

गुलाम हसन मलिक मॉर्डन चरखे से रेशे को धागे में तब्दील करते है। इस दस्तकारी से 5 साल से ज़्यादा से जुड़े हुए हैं। गुलाम ने बताया कि, ये ऐसी दस्तकारी है कि अपने हाथों से कमाए और खाए। गुलाम हसन सिंगपोरा में एक सेंटर चलाते है। इस वक़्त 15 से 20 लड़कियों को सिखाते हैं। इस दस्तकारी को सीखने के लिए सरकार की तरफ़ 1000 रुपये महीने मिलते है। हैंडलूम में कई स्कीम चल रही है जिससे दस्तकारी को सीखने के साथ पैसे भी मिलते है। 

चरखे ने बढ़ाई कश्मीरी कारीगरों की आमदनी

पहले चरखे को हाथ से चलाने में काफ़ी मेहनत लगती थी लेकिन मॉर्डन चरखा के आने से काफ़ी राहत मिल गई है। मॉर्डन चरखा (टेबल-टॉप) को पैरों की मदद से चलाने में ज़्यादा थकान महसूस नहीं होती है। हथकरघा यानि हैंडलूम के ज़रिए से पश्मीना शॉल की बुनाई की जाती है। चरखे को एक मेज़ पर रखा जाता है ताकि कारीगरों को कताई करने के लिए ज़मीन पर न बैठना पड़े।

ऐसा माना जाता है कि 14वीं शताब्दी में, हज़रत मीर सैयद अली हमदानी, जो एक सम्मानित ईरानी व्यक्ति थे और जिन्हें “शाह हमदान” के नाम से भी जाना जाता था। कश्मीर में पश्मीना शिल्प की शुरुआत की थी। Modern Table-Top चरखा से काम में सहूलियत मिली और प्रोडक्शन में भी इज़ाफ़ा हुआ है। महिला कारीगरों के लिए भी महफ़ूज़ है, जो पहले परंपरागत (traditional) चरखे का इस्तेमाल करते वक्त पीठ दर्द की शिकायत करती थीं। इस तकनीक (Technology) के आने से रोज़गार में भी इज़ाफ़ा हुआ है और पश्मीना कारीगरों की ज़िदंगी को बेहतर बनाने की नायाब कोशिश की गयी है।

आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

महेंद्र नाथ: मेहनतकशों की आवाज़ और उर्दू कहानी का एक सच्चा क़लमकार

"तवाइफ़ीयत का मसला तवाइफ़ों को गाली देने से हल...

किन्हाल के खिलौने: लकड़ी में बसी एक सभ्यता की दास्तान

तुंगभद्रा नदी जब कर्नाटक की धरती से गुज़रती है,...

Cab Driver से आर्मी और फिर Rower, Salman Khan कैसे पहुंचे Asian Games तक?

जिस खेल का नाम तक उन्होंने कभी नहीं सुना...

तिब्बत पहुंचने वाली पहली विदेशी महिला

अपने सौवें जन्मदिन पर जब उसने अपना पासपोर्ट रिन्यू...

मीराजी: हिंदुस्तानी फ़िज़ा में रची-बसी एक अनोखी आवाज़ 

उर्दू शायरी के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं...

Topics

महेंद्र नाथ: मेहनतकशों की आवाज़ और उर्दू कहानी का एक सच्चा क़लमकार

"तवाइफ़ीयत का मसला तवाइफ़ों को गाली देने से हल...

किन्हाल के खिलौने: लकड़ी में बसी एक सभ्यता की दास्तान

तुंगभद्रा नदी जब कर्नाटक की धरती से गुज़रती है,...

Cab Driver से आर्मी और फिर Rower, Salman Khan कैसे पहुंचे Asian Games तक?

जिस खेल का नाम तक उन्होंने कभी नहीं सुना...

तिब्बत पहुंचने वाली पहली विदेशी महिला

अपने सौवें जन्मदिन पर जब उसने अपना पासपोर्ट रिन्यू...

मीराजी: हिंदुस्तानी फ़िज़ा में रची-बसी एक अनोखी आवाज़ 

उर्दू शायरी के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं...

 वर्ली पेंटिंग्स: सफ़ेद-काली लकीरों में छुपी हज़ारों साल पुरानी दास्तान 

क़बीलाई समाज हमेशा प्रकृति के सबसे क़रीब रहा है।...

आनंद नारायण मुल्ला: मैं मज़हब छोड़ सकता हूं, मगर मादरी ज़बान उर्दू नही…

हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब की जब भी बात होती...

Related Articles

Popular Categories