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असम की नृत्यांगना आरिशा शेख़: शास्त्रीय नृत्य में आधुनिकीकरण ऐसे किया जाए कि उसकी शुद्धता बरकरार रहे 

शास्त्रीय नृत्य एक मंत्रमुग्ध कर देने वाली कला है जो सदियों से संस्कृति का हिस्सा रही है। ये सिर्फ़ संगीत पर थिरकना मात्र नहीं है, बल्कि भावनाओं को व्यक्त करने की एक कड़ी भी है। शास्त्रीय नृत्य करते हुए नर्तक या नृत्यांगना हमारे दिल और ज़हन को मोहित कर लेते हैं। ऐसी ही एक नृत्यांगना हैं असम की आरिशा शेख़। गुवाहाटी की रहने वाली 17 साल की आरिशा शेख़ दक्षिण भारत की शास्त्रीय नृत्य शैली भरतनाट्यम और असम की शास्त्रीय नृत्य सत्रिया की तालीम पूरी कर अब नृत्य की दुनिया में अपना नाम रोशन कर रही हैं। 

तीन साल की उम्र में सीखना शुरू किया भरतनाट्यम

एक कहावत है कि पूत के पांव पालने में नज़र आ जाते हैं। इसका मतलब है कि किसी भी व्यक्ति की प्रतिभा का अंदाज़ा शुरुआती दौर में ही हो जाता है। कुछ ऐसा ही आरिशा के साथ भी हुआ। आरिशा ने 15 अगस्त 2009 को एक स्थानीय चैनल पर प्रसारित सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान कुछ नृत्य प्रदर्शनों में भाग लेकर अपनी प्रतिभा दिखाई। तब वो सिर्फ़ 3 साल की थी। आरिशा के माता पिता ने उसके अंदर के कलाकार को पहचाना और उसे पद्मश्री इंदिरा पीपी बोरा के मार्गदर्शन में भरतनाट्यम सिखाना शुरू कर दिया। इस तरह आरिशा का नृत्य सीखने का सफ़र शुरू हो गया। 

सात साल बाद 2018 में भरतनाट्यम की तालीम पूरी की। इसी बीच जब वो सात साल की थी तब उन्होंने असम का शास्त्रीय नृत्य “सत्रिया” भी सीखना शुरू कर दिया था और 11 साल बाद 2024 में सत्रिया की तालीम भी पूरी कर ली। 

रामकृष्ण और रूमी तालुकदार के देखरेख में सीखा सत्रिया नृत्य

आरिशा की मम्मी ने गुरु रामकृष्णा तालुकदार का एक कार्यक्रम देखा तो उन्हें लगा कि “सत्रिया नृत्य” तो असम का शास्त्रीय संगीत है। वो आरिशा को इस की तालीम ज़रूर दिलवायेंगी। दूसरे ही दिन आरिशा का दाखिला गुरु रामकृष्णा के नर्तन कला निकेतन में करवा दिया और इस तरह आरिशा ने असम का शास्त्रीय नृत्य “सत्रिया” भी सीखना शुरू कर दिया। आरिशा ने गुवाहाटी में ही संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार विजेता गुरु रामकृष्ण तालुकदार और उनकी पत्नी गुरु रूमी तालुकदार की देखरेख में सत्रिया नृत्य की तालीम पूरी की। 

यहां तक की गुरु रामकृष्णा आरिशा को नृत्य कार्यक्रमों में भी लेकर जाने लगे। आरिशा के नृत्यांगना बनने के इस सफ़र में उनके माता-पिता, अंजुमा शेख़ और अरमान शेख़ का भी अहम योगदान रहा। उनकी प्रेरणा और सहयोग ने आरिशा को अपनी कला में निखार लाने और अपनी प्रतिभा को नये मुकाम तक पहुंचाने में मदद की।

आरिशा के पिता कहते हैं कि ‘’आरिशा की सफलता की पीछे उनसे ज्यादा उनकी मां का हाथ है। मेरे बच्चों को जो पसंद आता है मैं उन्हें वो करने देता हूं। मैं उनसे कहता हूं कि तुम लोग करो मैं तुम्हारे साथ में हूं।’’

असम का शास्त्रीय नृत्य ‘सत्रिया’ 

सत्रिया असम का एक शास्त्रीय नृत्य है जो जटिल हस्त मुद्राओं, चेहरे के हाव भाव और पृष्ठभूमि संगीत से बना है। आंखें, भौंवें, हाथों, पैरों, हथेलियों, गाल, ठोड़ी, गर्दन के लिए पारम्परिक मुद्राएं निर्धारित है। पांव की अलग-अलग गतियां जैसे- इठलाना, ठुमकना, तिरछे चलना, और ताल सावधानी से की जाती हैं। लेकिन इन सब से ऊपर होता है कि जिस कथा को कलाकार अपने नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत कर रहा हो उस के किरदार में खुद का गहराइयों तक उतर जाना। तब ही एक कलाकार का स्टेज से ऑडियंस के साथ कम्यूनिकेशन हो पता है।

आरिशा का मानना है कि आधुनिकीकरण और प्रचार के नाम पर सत्रिया नृत्य की पारंपरिक शैली और उसकी शुद्धता कभी कम नहीं होनी चाहिए। हां ये ज़रूरी है कि अपने दर्शकों के अनुसार नृत्य में कुछ बदलाव किया जाए लेकिन नृत्य की जड़ और उसकी शुद्धता को बरकरार रखते हुए। 

आरिशा की तालीम और अवॉर्ड 

आरिशा ने लखनऊ के भतखंडे विश्वविद्यालय से भरतनाट्यम में विशारद प्वाइंट 2 सर्टिफिकेट हासिल किया। कोलकाता में आरिशा को अपने हुनर को और निखारने का मौका मिला, क्योंकि उन्होंने भरतनाट्यम के विशेषज्ञ गुरु राम वैद्यनाथन की कार्यशालाओं में हिस्सा लिया। उन्होंने ने अब तक मुंबई, पुरी, बेंगलुरू और दिल्ली जैसे भारत के कई स्थानों पर अपनी नृत्य शैली से हज़ारों लोगों को मंत्रमुग्ध किया है। 

2023 में आरिशा को केन्या के नैरोबी में राउंड स्क्वायर इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस 2023 में भी प्रदर्शन करने का मौका मिला था। आरिशा को दो बार आईआईडीएफ गुवाहाटी के फ्यूचर फेस अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। आरिशा शेख़ की दिली चाहत है कि वो दुनिया भर में सत्रिया नृत्य को लोकप्रिय बनाने में अपना योगदान दें और इसी तरह भारत की सांस्कृतिक विरासत का झंडा दुनियाभर पर लहराए।

 ये भी पढ़ें: अपनी Disability को Ability बनाने वाले कश्मीर के कमेंटेटर इरफ़ान भट्ट

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