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असम के मुख्यमंत्री गोपीनाथ बोरदोलोई ने पहली बार असमिया भाषा में लिखी पैगंबर मुहम्मद की जीवनी

असम के पहले मुख्यमंत्री गोपीनाथ बोरदोलोई ने असमिया भाषा में पैगम्बर मुहम्मद की जीवनी लिखी है। ये पहली बार
1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब गोपीनाथ बोरदोलोई जेल में थे, उस समय उन्होंने बच्चों के लिए कई जीवनियां लिखीं। उनमें से एक का शीर्षक था ‘हज़रत मुहम्मद’। उन्होंने ये किताब बच्चों के लिए लिखी है।

बोरदोलोई ने अपनी सभी जीवनियों में अपने पाठकों को ‘प्यारे बेटे’ या ‘बेटा’ कहकर संबोधित किया है। वे लिखते हैं कि “बेटा अब मैं तुम्हें इस्लाम के प्रचारक पैगंबर मुहम्मद की जीवनी के बारे में संक्षेप में बताऊंगा”। बोरदोलोई मानते हैं कि पैगम्बर मुहम्मद की जीवनी दूसरे महान संतों की जीवनी से कहीं ज़्यादा ऐतिहासिक है। इस जीवनी में उन्होने पैग़ंबर मुहम्मद के उपदेश, शासन करने से लेकर जीवन के सभी पहलुओं को शामिल किया है। उन्होंने इस्लाम का प्रचार करने के दौरान उनपर हुए अत्याचार को सहते हुए असीम धैर्य का ज़िक्र किया है। साथ ही उन्होंने ये भी उल्लेख किया है कि कैसे लोग पैगंबर मुहम्मद से धैर्य का पाठ सीख सकते हैं।

बोरडोलोई अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि पैग़ंबर मुहम्मद ने कभी भी अपने दुश्मनों के खिलाफ व्यंग्यात्मक और कठोर शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया। “मैं अब पहले से कहीं अधिक आश्वस्त हूं कि ये तलवार की ताकत नहीं थी जिसने दुनिया में इस्लाम को जीत दिलाई, बल्कि ये इस्लाम के पैगंबर का बहुत ही सरल जीवन था, उनकी निस्वार्थता, वादा-खिलाफी और निडरता, अपने दोस्तों और अनुयायियों के लिए उनका प्यार और ईश्वर में उनका भरोसा था।”

ये उनके गुण थे जिन्होंने सभी बाधाओं को दूर किया और सभी कठिनाइयों पर जीत हासिल करने में सक्षम बनाया। बोरदोलोई ने पैग़म्बर मुहम्मद की जीवनी लिखने से पहले श्री रामचंद्र, बुद्ध और ईसा मसीह की जीवनी भी लिखी है।

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