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बंगाल की रूह तांत साड़ी : सूत में बसी जान, रेशम से भी निराली पहचान

आज के रंगीन और चकाचौंध भरे दौर में, जहां हर दुल्हन कस्टमाज़ वेडिंग ड्रेस के पीछे दीवानी दिखती है, वहीं बंगाल की तांत साड़ी अपनी सादगी, नज़ाकत और मिट्टी से जुड़ी ख़ूबसूरती के साथ एक अलग ही मुकाम रखती है। ये साड़ी महज़ एक कपड़ा नहीं, बल्कि बंगाल की रूह और तहज़ीब है, जो सदियों की तारीख़, मुहब्बत और हुनर को अपने नर्म सूती धागों में बुने हुए है।

तांत साड़ी (Image-Social Media)

हर बंगाली दुल्हन के लिए तांत की साड़ी अहम 

बंगाल के त्योहारों, शादी-ब्याह और हर ख़ुशी के मौक़े पर तांत साड़ी की मौजूदगी को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, क्योंकि यहां की पारंपरिक लाल-सफ़ेद साड़ी हर बंगाली औरत के जज़्बातों से जुड़ी हुई है, भले ही आज कल लड़कियां बनारसी रेशम को सिलेक्ट करें, लेकिन तांत की रस्म हर बंगाली शादी में किसी न किसी रूप में ज़रूर शामिल होती है।

Image- Social Media

बेहद दिलचस्प है तांत साड़ी का इतिहास 

तांत साड़ी का इतिहास बेहद दिलचस्प और मुश्किलों भरा रहा है। मुगल काल के दौरान ढाका (जो आज बांग्लादेश है) और मुर्शिदाबाद (वेस्ट बंगाल) में तांत और जामदानी को शाही सरपरस्ती हासिल थी, और येे बुनाई कला अपने उरूज़ पर थी। लेकिन जब अंग्रेज़ों ने हुकूमत की, तो उन्होंने मैनचेस्टर के मिलों के कारोबार को बचाने के लिए इस देसी हुनर को तबाह करने की कोशिश की, मगर हैरानतौर से ये कला आग की तरह बची रही और उस मुश्किल दौर से भी गुज़र गई।

Image-Wikipedia

1947 में जब बंगाल का बंटवारा हुआ, तो बुनकरों का एक बड़ा तबक़ा वेस्ट बंगाल आ गया और उन्होंने अपने काम को जारी रखा, इसलिए आज तांत के बुनकर दोनों बंगालों में मौजूद हैं और ये सिलसिला आज भी ज़िंदा है। 

सबसे मुफ़ीद और आरामदायक कपड़ा तांत 

इस साड़ी की बुनाई का तरीक़ा भी अपने आप में एक फ़न है, जिसमें दो शटलों (धागों की ख़ास नावों) का इस्तेमाल किया जाता है, एक Transverse धागे के लिए और दूसरा बेल-बूटों और डिज़ाइनों के लिए। पहले ये सारा काम हथकरघे पर होता था, लेकिन अब पॉवरलूम ने जगह ले ली है, फिर भी तांत साड़ी की ख़ासियत उसकी हल्की और ट्रांसपेरेंट बनावट है, जो यहां की गर्म और उमस भरी जलवायु के लिए सबसे मुफ़ीद और आरामदायक कपड़ा माना जाता है, मानो गर्मी में ठंडी हवा का झोंका हो।

तांत साड़ी (Image-Social Media)

तांत के मोटिफ़ का निराला अंदाज़ 

तांत साड़ी की पहचान उसकी मज़बूत और मोटी कोर यानी बॉर्डर से होती है, जिसे इसलिए मोटा बनाया जाता है क्योंकि ये जल्दी फ़टने का ख़तरा रखती है, साथ ही इसका पल्लू भी बेहद शानदार और अट्रैक्टिव होता है। इस पर जो मोटिफ़ बुने जाते हैं, वे बंगाल की मिट्टी, नदियों और जंगलों से इंस्पायर हैं। जैसे भोमरा (भौंरा), ताबीज़ (अमुलेट), राजमहल (शाही महल), अर्ध-चंद्र (आधा चांद), चांदमाला, अंश (मछली के छिलके), हाथी, नीलाम्बरी (नीला आसमान), रतन चोख (रत्न-जैसी आंख), बेंकी (कुंडली), तारा (सितारा), कल्का (पैस्ली डिज़ाइन) और फूल। मॉडर्न दौर में इन पारंपरिक डिजाइन के साथ-साथ नए आर्टिस्टिक और समकालीन डिज़ाइन भी इसमें शामिल किए गए हैं, जिससे इसकी रेंज और भी बड़ी हो गई है। 

Image-Social Media

यूनेस्को ने दिया Intangible Cultural Heritage दर्जा 

इसी परिवार की सबसे उम्दा किस्म जामदानी को यूनेस्को ने intangible cultural Heritage का दर्जा देकर उसकी अहमियत को पूरी दुनिया में साबित कर दिया है, जो इस कला की एक्सिलेंस और गहराई को दिखाता है।

Image-ich.unesco.org

ममता बनर्जी से लेकर शेख़ हसीना तक की फेवरेट 

आज के दौर में भी तांत साड़ी अपनी जगह बनाए हुए है, क्योंकि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना, बांग्लादेश की संसद अध्यक्ष शिरीन शर्मिन चौधरी और वेस्ट बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जैसी बड़ी शख़्सियतें भी इसे अपनी रोज़मर्रा की पोशाक के तौर पर पसंद करती हैं। 

ममता बनर्जी (Image-Social Media)

बंगाली औरत की मर्यादा, सादगी और कामयाबी की अलामत

ये साड़ी सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि बंगाली औरत की मर्यादा, उसकी सादगी, उसके संघर्ष और उसकी कामयाबी की अलामत है। इसकी देखभाल का एक ख़ास तरीक़ा भी है। पहली धुलाई से पहले इसे गर्म पानी में सेंधा नमक के साथ कुछ देर भिगोना चाहिए, ताकि इसका रंग बाद में न उड़े, फिर हल्के साबुन से धोकर, कलफ़ (स्टार्च) डालकर और छांव में सुखाकर आप इसकी उम्र बढ़ा सकते हैं।

Image-Wikipedia

ज़मीनी और रूहानी अपनापन 

आख़िर में, ये कहना बिल्कुल सही होगा कि जहां रेशम अपनी चमक-दमक से ध्यान खींचता है, वहीं तांत साड़ी अपनी ज़मीनी और रूहानी अपनेपन से ज़्यादा गहरे तरीक़े से दिलों में जगह बनाती है। ये बंगाल की सांस है, उस मज़दूर की मेहनत है जो पीढ़ियों से इस हुनर को संजोए हुए है, और उस औरत की शान है जो इस सादगीभरे कपड़े में पूरी दुनिया का सामना करती है।

ये हुनर, ये जज़्बा और ये मुहब्बत ही तांत को अमर बनाती है, भले ही वक़्त कितना भी बदले।

ये भी पढ़ें-   Maheshwari Fabric: रानी का ख़्वाब, बुनकरों की मेहनत और इतिहास का रेशमी सफ़र

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