हर बच्चे की ज़िंदगी में पिता का रोल अलग होता है। कोई पिता अपने बच्चे का पहला शिक्षक बनता है, कोई उसका सबसे बड़ा हौसला, तो कोई अपने कर्मों से ऐसी मिसाल छोड़ जाता है जो सिर्फ़ अपने परिवार ही नहीं बल्कि पूरे समाज की ज़िंदगी बदल देती है। Father’s Day पर अक्सर हम पिता को एक ऐसे शख़्स के तौर पर याद करते हैं जो परिवार की ज़िम्मेदारियां उठाता है।
लेकिन कुछ कहानियां हमें बताती हैं कि पिता सिर्फ़ घर चलाने वाले नहीं होते, बल्कि वो अपने बच्चों के सपनों को पहचानने वाले, मुश्किल रास्तों पर उनका हाथ थामने वाले और इंसानियत की सीख देने वाले भी होते हैं। ऐसी ही चार कहानियां हमें कश्मीर से लेकर दिल्ली तक ले जाती हैं, जहां पिता और बच्चों का रिश्ता सिर्फ़ ख़ून का नहीं, बल्कि भरोसे, मेहनत और ख़िदमत का रिश्ता बन जाता है।
जब पिता बने बेटी की ताक़त
कश्मीर की रहने वाली आमिना कय्यूम की कहानी इसी भरोसे की कहानी है। खेलों की दुनिया में अपना मुक़ाम बनाना किसी भी लड़की के लिए आसान नहीं होता, ख़ासकर उन इलाकों में जहां लड़कियों के लिए खेल को करियर के तौर पर देखना अभी भी आम बात नहीं है। लेकिन आमिना के सफ़र में एक चीज़ हमेशा उनके साथ रही उनके पिता का यक़ीन।
जब दूसरे लोग सवाल करते थे कि एक लड़की खेलों में कितना आगे जा पाएगी, तब उनके पिता ने उन्हें रुकने नहीं दिया। उन्होंने बेटी के सपनों को अपना सपना बनाया। यही वजह है कि आमिना ने तमाम मुश्किलों के बावजूद अपने खेल में पहचान बनाई और कई लड़कियों के लिए मिसाल बन गई। हर कामयाबी के पीछे सिर्फ़ खिलाड़ी की मेहनत नहीं होती, बल्कि उस पिता का भरोसा भी होता है जो हर हार के बाद कहता है, “फिर कोशिश करो।”
जब पिता और बेटी ने साथ मिलकर रचा इतिहास
कश्मीर की ही एक और कहानी है सज्जाद मुक़दूस और उनकी बेटी की। पेंचक सिलाट जैसे मार्शल आर्ट में पिता और बेटी की ये जोड़ी सिर्फ़ खेल नहीं खेलती, बल्कि एक-दूसरे का हौसला भी बनती है। जहां एक तरफ़ पिता ने इस खेल को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाया, वहीं दूसरी तरफ़ उन्होंने अपनी बेटी को भी उसी रास्ते पर आगे बढ़ने का मौक़ा दिया। अक्सर देखा जाता है कि पिता अपने बच्चों को सलाह देते हैं, लेकिन यहां रिश्ता कुछ और ही था। यहां पिता और बेटी दोनों एक टीम की तरह खड़े नज़र आते हैं।
मैदान में पसीना बहाने से लेकर प्रतियोगिताओं की तैयारी तक, दोनों का सफ़र साथ-साथ चला। ये कहानी बताती है कि जब पिता अपने बच्चों के सपनों को समझते हैं, तो रिश्ता सिर्फ़ अभिभावक और बच्चे का नहीं रहता, बल्कि वो साझेदारी में बदल जाता है। आज ये जोड़ी कई परिवारों के लिए प्रेरणा है कि बेटियों को मौक़ा दिया जाए, उन पर भरोसा किया जाए और उन्हें अपने सपने चुनने की आज़ादी मिले।
जब एक पुलिसकर्मी बना सैकड़ों बच्चों का पिता जैसा सहारा
पिता होने का मतलब सिर्फ़ अपने बच्चों की परवरिश करना नहीं है। कई लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने परिवार से बाहर निकलकर समाज के बच्चों की ज़िंदगी बदलने का काम करते हैं। दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल थान सिंह की कहानी ऐसी ही एक मिसाल है। उन्होंने देखा कि कई बच्चे आर्थिक तंगी की वजह से पढ़ाई से दूर हो रहे हैं। कुछ बच्चे सड़कों पर समय गुज़ारते थे, तो कुछ के पास स्कूल जाने का मौका नहीं था। यहीं से शुरू हुई ‘थान सिंह की पाठशाला’।
ये सिर्फ़ एक पाठशाला नहीं, बल्कि उन बच्चों के लिए उम्मीद का दरवाज़ा है जिन्हें शिक्षा की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी। थान सिंह ने अपने समय और मेहनत से ऐसे बच्चों को पढ़ाना शुरू किया जिनके पास अच्छे संसाधन नहीं थे। इन बच्चों के लिए वो सिर्फ़ शिक्षक नहीं, बल्कि पिता जैसी शख़्सियत बन गए। कोई पढ़ाई में पीछे रह जाता तो उसे संभालते, कोई हिम्मत हारता तो उसे आगे बढ़ने की सलाह देते। पिता का रिश्ता कई बार कोई इंसान अपने कर्मों से भी पिता जैसा दर्जा हासिल कर लेता है।
जब एक पिता की सेवा बन गई सबसे बड़ी विरासत
इन सब के साथ ही दिल्ली में एक ऐसी कहानी भी है, जो इंसानियत, तहज़ीब और भाईचारे की मिसाल पेश करती है। ये कहानी है ‘वीर जी दा डेरा संगठन’ की, जिसकी नींव स्वर्गीय त्रिलोचन सिंह ने साल 1989 में रखी थी। उन्होंने सेवा को सिर्फ़ एक काम नहीं, बल्कि अपनी ज़िंदगी का मक़सद बनाया। उनका मानना था कि समाज की ख़िदमत ही सबसे बड़ी इबादत है। इसी सोच के साथ उन्होंने ज़रूरतमंद लोगों की मदद का सिलसिला शुरू किया, जो आज भी बदस्तूर जारी है।
त्रिलोचन सिंह ने अपने बच्चों को सिर्फ़ परवरिश ही नहीं दी, बल्कि इंसानियत, मोहब्बत और सेवा के संस्कार भी दिए। यही वजह है कि उनके जाने के बाद ये मुहीम थमी नहीं, बल्कि और मज़बूत होती चली गई। आज उनके दोनों बेटे, ब्रिगेडियर प्रेमजीत सिंह और कमलजीत सिंह, अपने पिता की इस विरासत को पूरी लगन और समर्पण के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।
तीन दशकों से ज़्यादा समय बीत जाने के बाद भी ‘वीर जी दा डेरा’ लोगों की मदद, भाईचारे और इंसानियत का पैग़ाम दे रहा है। ये सिर्फ़ एक संगठन नहीं, बल्कि एक पिता की सोच, उनके मूल्यों और उनके संस्कारों की ज़िंदा मिसाल है। Father’s Day पर ये कहानी हमें याद दिलाती है कि एक पिता की सबसे बड़ी विरासत ज़मीन-जायदाद नहीं, बल्कि वो उसूल और संस्कार होते हैं, जो आने वाली पीढ़ियों का रास्ता रोशन करते हैं।
पिता की असली पहचान
Father’s Day के मोक़े पर इन चारों कहानियों को अगर एक धागे में पिरोया जाए, तो एक बात साफ़ दिखाई देती है पिता होना सिर्फ़ एक रिश्ता नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी और एहसास है। कहीं एक पिता बेटी के सपनों को उड़ान देता है, कहीं पिता और बेटी साथ मिलकर नई मिसाल कायम करते हैं। कहीं एक पुलिसकर्मी सैकड़ों बच्चों के लिए पिता जैसा सहारा बन जाता है, तो कहीं सेवा की परंपरा आने वाली पीढ़ियों को इंसानियत का सबक सिखाती है।
Father’s Day हमें सिर्फ़ अपने पिता को धन्यवाद कहने का मौका नहीं देता, बल्कि उन सभी लोगों को याद करने का भी मौका देता है जिन्होंने किसी न किसी रूप में हमारी ज़िंदगी को बेहतर बनाया। क्योंकि असली पिता वही है जो सिर्फ़ हाथ पकड़कर चलना नहीं सिखाता, बल्कि इतना मज़बूत बना देता है कि हम अपने पैरों पर खड़े होकर दुनिया का सामना कर सकें।
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