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मुन्शी बनवारी लाल ‘शोला’: ग़ालिब की सोहबत से शायरी की बुलंदियों तक

उर्दू अदब की दुनिया में मुन्शी बनवारी लाल ‘शोला’ का नाम एक ऐसे शायर के तौर पर लिया जाता है जिनकी शायरी में दिल की कैफ़ियत, इश्क़ की नज़ाकत और ख़्याल की ताज़गी एक साथ दिखाई देती है। 

‘शोला’ को शायरी का ज़ौक़ विरासत में नहीं मिला था, बल्कि उन्होंने अपनी मेहनत और उस्तादों की रहनुमाई से इस फ़न में कमाल हासिल किया। वे मिर्ज़ा ग़ालिब के महबूब शागिर्द मिर्ज़ा हरगोपाल ‘तफ़्ता’ और ग़ालिब के एक और शागिर्द बाल मुकुंद ‘बेसब्र’ के शागिर्द थे। इसी सिलसिले से उन्हें मिर्ज़ा ग़ालिब की सोहबत का भी मौक़ा मिला। यह उनके लिए किसी बड़ी नेमत से कम नहीं था।

कहा जाता है कि ‘शोला’ ने कम उम्र में ही शेर कहना शुरू कर दिया था। उनकी सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि वे बात से बात बनाने का हुनर जानते थे। आसान-सी बात को भी वे ऐसे अंदाज़ में बयान करते कि सुनने वाला दाद दिए बिना न रह सके।

“क्या लिए जाते हो चुपके से छुपा कर हाथ में,
दिल नहीं है गर तो क्या है बंदा-परवर हाथ में।”

शोला

इस शेर में महबूब की अदा और आशिक़ की बेचैनी बड़ी ख़ूबसूरती से दिखाई देती है।

‘शोला’ की शायरी में इश्क़ के साथ-साथ इंसानियत और मज़हबी हमआहंगी का पैग़ाम भी मिलता है। उनका यह शेर इसकी बेहतरीन मिसाल है।

“दैर-ओ-हरम में जल्वा-ए-जानाना एक है,
पर्दा उठे तो काबा-ओ-बुतख़ाना एक है।”

शोला

इस शेर में उन्होंने बताया कि ख़ुदा की तलाश का रास्ता अलग-अलग हो सकता है, लेकिन मंज़िल एक ही है। यही वजह है कि उनकी शायरी में मोहब्बत और इंसानी एकता का रंग साफ़ नज़र आता है। उनके अशआर में दर्द और तजुर्बे की गहराई भी दिखाई देती है।

“लाख दिल चीर के यक-लख़्त जिगर आता है,
आंखें सौ फोड़ के इक होता है आंसू पैदा।”

शोला

यह शेर बताता है कि एक सच्चे आंसू के पीछे कितनी तकलीफ़ और कितने जज़्बात छिपे होते हैं।

इसी तरह उनका यह शेर इंसानी ख़्वाहिशों और कुर्बानियों की कहानी बयान करता है।

“मिटी हज़ार तमन्ना इक आरज़ू के लिए,
मिला हूं ख़ाक में दुनिया की आबरू के लिए।”

शोला

मुन्शी बनवारी लाल ‘शोला’ उन शायरों में थे जिन्होंने अपनी शायरी के ज़रिये दिलों को छुआ और सोचने पर मजबूर किया। उनकी ग़ज़लों में इश्क़ भी है, फ़लसफ़ा भी और ज़िंदगी की सच्चाइयां भी। यही वजह है कि एक सदी से ज़्यादा वक़्त गुज़र जाने के बाद भी उनका कलाम अदब की महफ़िलों में पूरे एहतराम के साथ पढ़ा और सुना जाता है।

ये भी पढ़ें: मियां दाद ख़ां सैयाह: उर्दू शायरी का मुसाफ़िर जिसने ज़िंदगी को सफ़र बना दिया 

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