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पंडित ब्रिज नारायण चकबस्त: उर्दू शायरी में हिंदुस्तानी तहज़ीब की आवाज़

उर्दू अदब की तारीख़ में कुछ नाम ऐसे हैं जिनका ज़िक्र आते ही ज़बान पर मोहब्बत, वतनपरस्ती और इंसानी हमदर्दी के रंग बिखर जाते हैं। पंडित ब्रिज नारायण चकबस्त भी ऐसे ही शायरों में शुमार होते हैं। उन्होंने अपनी शायरी के ज़रिये न सिर्फ़ उर्दू अदब को नई बुलंदियां दीं, बल्कि हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब को भी अपनी आवाज़ दी।

सन् 1882 में फ़ैज़ाबाद में पैदा हुए ब्रिज नारायण चकबस्त एक ऐसे घराने से ताल्लुक़ रखते थे जहां अदब और शायरी की ख़ुशबू पहले से मौजूद थी। उनके वालिद पंडित उदित नारायण शिवपुरी ख़ुद शायर थे और “यक़ीन” तख़ल्लुस से शेर कहा करते थे। वह पटना में डिप्टी कमिश्नर के ओहदे पर फ़ाइज़ थे। अफ़सोस कि उनका ज़्यादा कलाम महफ़ूज़ नहीं रह सका, लेकिन जो कुछ अशआर मिले हैं, उनसे उनकी शायराना सलाहियत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

“निगाह-ए-लुत्फ़ से ऐ जां अगर नज़र करते,
तुम्हारे तीरों से अपने सीना को हम सपर करते।”

लेकिन तक़दीर को कुछ और मंज़ूर था। जब चकबस्त महज़ पांच साल के थे, तभी उनके वालिद का इंतिक़ाल हो गया। पिता के साए से महरूम होने के बाद उनके बड़े भाई पंडित महाराज नारायण चकबस्त ने उनकी तालीम और परवरिश की ज़िम्मेदारी उठाई।

चकबस्त बचपन से ही बेहद ज़हीन थे। कहा जाता है कि उन्होंने नौ साल की उम्र में शेर कहना शुरू कर दिया था और 12 साल की उम्र तक उनके कलाम में ऐसी पुख़्तगी आ चुकी थी कि लोग हैरत में पड़ जाते थे। यही वजह थी कि कम उम्र में ही अदबी महफ़िलों में उनकी पहचान बनने लगी।

सन् 1894 में उन्होंने अपनी पहली नज़्म एक मुशायरेनुमा बैठक में पढ़ी और सुनने वालों का दिल जीत लिया। बाद में उन्होंने कानून की पढ़ाई की और 1908 में वकालत की डिग्री हासिल करके लखनऊ में वकालत शुरू की। मगर अदालत की बहसों के साथ-साथ उनका दिल शायरी और मुल्क की सियासत में भी लगा रहा। आज़ादी और क़ौमी बेदारी के मसलों पर उनकी गहरी नज़र थी और इसी वजह से उन्हें गिरफ़्तारी तक का सामना करना पड़ा।

चकबस्त की शायरी की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि उसमें हिंदुस्तानी तहज़ीब की रूह बसती है। उन्होंने उर्दू शायरी में रामायण जैसे भारतीय मज़ामीन को शामिल करके एक नई राह दिखाई। रामायण के कई मंज़रों को उन्होंने नज़्म की शक्ल दी। हालांकि यह काम मुकम्मल न हो सका, लेकिन जो कुछ लिखा गया, वह उनकी फ़िक्र की वुसअत और सांस्कृतिक समझ का सबूत है।

उर्दू अदब के हल्कों में चकबस्त का नाम सिर्फ़ एक शायर के तौर पर नहीं, बल्कि एक बारीक़-निगाह अदबी दानिश्वर के तौर पर भी लिया जाता है। मसनवी “गुलज़ार-ए-नसीम” पर होने वाली उनकी इल्मी और अदबी बहसें उस दौर में ख़ूब मशहूर रहीं। इन मुबाहिसों ने उनकी गहरी मुताला-अफ़रोज़ी, अदबी ज़ौक़ और उर्दू शायरी की रवायतों पर मज़बूत पकड़ को उजागर किया। यही वजह है कि चकबस्त को सिर्फ़ सुख़नवर नहीं, बल्कि उर्दू अदब का एक संजीदा नक़्क़ाद और साहिब-ए-फ़िक्र शख़्सियत भी माना जाता है। 

चकबस्त की शायरी में ज़िंदगी, मौत, इंसानी ख़्वाहिशों और तालीम की अहमियत जैसे विषय बार-बार सामने आते हैं। उनके कुछ अशआर आज भी लोगों की ज़बान पर हैं।


“ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़ुहूर-ए-तरतीब,
मौत क्या है इन्हीं अज्ज़ा का परेशां होना।”


“अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसां आश्ना होता,
न कुछ मरने का ग़म होता न जीने का मज़ा होता।”


“अदब तालीम का जौहर है, ज़ेवर है जवानी का,
वही शागिर्द हैं जो ख़िदमत-ए-उस्ताद करते हैं।”


“इक सिलसिला-ए-हवस का है इंसां की ज़िंदगी,
इस एक मुश्त-ए-ख़ाक को ग़म दो-जहां के हैं।”

चकबस्त की शायरी में फ़लसफ़ा भी है, जज़्बात भी, और वतन की मिट्टी से मोहब्बत भी। यही वजह है कि उनका कलाम आज भी पुराना नहीं लगता।

12 फ़रवरी 1926 को एक मुक़दमे की पैरवी करके लौटते वक़्त रेलवे स्टेशन पर उनका इंतिक़ाल हो गया। उनकी उम्र ज़्यादा नहीं थी, लेकिन उन्होंने उर्दू अदब को जो दौलत दी, वह हमेशा ज़िंदा रहेगी।

शायद अपने ही इस शेर में उन्होंने अपनी ज़िंदगी का ख़ुलासा कर दिया था।

“इस को ना-क़दरी-ए-आलम का सिला कहते हैं,
मर चुके हम तो ज़माने ने बहुत याद किया।”

वाक़ई, चकबस्त आज हमारे बीच नहीं हैं, मगर उनकी शायरी, उनका फ़िक्र और उनकी हिंदुस्तानी रूह उर्दू अदब में हमेशा ज़िंदा रहेगी।

ये भी पढ़ें: मियां दाद ख़ां सैयाह: उर्दू शायरी का मुसाफ़िर जिसने ज़िंदगी को सफ़र बना दिया    

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