उर्दू अदब और तसव्वुफ़ की दुनिया में आगा मुहम्मद दाऊद का नाम बड़े एहतराम से लिया जाता है। आप सिर्फ़ एक शायर ही नहीं, बल्कि एक कामिल सूफ़ी बुज़ुर्ग, बेहतरीन वक्ता और लोगों को रूहानी राह दिखाने वाले रहनुमा भी थे। आपकी शायरी में इश्क़, तसव्वुफ़, इंसानियत और ख़ुदा से मुहब्बत का ऐसा रंग मिलता है, जो आज भी पढ़ने वालों के दिल को छू लेता है।
आगा मुहम्मद दाऊद की पैदाइश 1248 हिजरी में हैदराबाद में हुयी। आपका पूरा नाम आगा मुहम्मद दाऊद बिन आगा मुहम्मद हैदर बिन आगा मुहम्मद क़ादिर था, जबकि अदबी दुनिया में आप ‘सहव’ हैदराबादी के तख़ल्लुस से मशहूर हुए। आपके बुज़ुर्ग क़ुतुबशाही सल्तनत के दौर में ऊंचे ओहदों और फ़ौजी ज़िम्मेदारियों पर फ़ाइज़ थे। आसिफ़जाही हुकूमत के शुरुआती ज़माने में बरार सूबे के कई इलाक़े, गांव और ज़मींदारियां भी आपके ख़ानदान के पास थीं। साथ ही सैकड़ों सवार और हाथियों जैसी शाही इज़्ज़त भी उन्हें हासिल थी। बाद में जब यह इलाक़ा अंग्रेज़ी हुकूमत के अधीन चला गया, तो यह जागीर भी उससे अलग हो गई।
सहव हैदराबादी का झुकाव बचपन ही से तसव्वुफ़ की तरफ़ था। उनका स्वभाव बेहद नरम, मिलनसार और मेहमाननवाज़ था। जो भी उनके पास आता, वह ख़ुलूस और मुहब्बत के साथ उसकी बात सुनते और उसे दीन – इंसानियत का रास्ता समझाते। उनकी महफ़िलें सिर्फ़ ज़िक्र या बयान तक सीमित नहीं होती थीं, बल्कि इल्म और समझ का ख़ज़ाना होती थीं।
अपने बयान में सहव हैदराबादी अक्सर पुराने दौर की किताबों, दस्तावेज़ों और अकबर के ज़माने के ख़ुतूत (पत्रों) का हवाला देते थे। फिर उन बातों को आसान मिसालों के ज़रिए समझाते, ताकि आम लोग भी गहरी बात को आसानी से समझ सकें। यही वजह थी कि उनकी तक़रीरें लोगों के दिलों पर गहरा असर छोड़ती थीं।
सहव हैदराबादी को शायरी से भी ख़ास लगाव था। उन्होंने उर्दू और फ़ारसी—दोनों ज़बानों में शायरी की और एक मुकम्मल दीवान भी तैयार किया। उनकी शायरी पर ईरानी उस्ताद शायरों का असर साफ़ दिखाई देता है। अल्फ़ाज़ की नफ़ासत, ख़यालों की बुलंदी और सूफ़ियाना अंदाज़ उनकी पहचान बन गए।
उनके अशआर में इश्क़-ए-हक़ीक़ी और इश्क़-ए-मजाज़ी दोनों की झलक मिलती है।
“क्या करते हैं घर बैठे ही दर्शन उनके जोबन का,
मिला है आईना हमको सिकंदर क़ल्ब-ए-रौशन का।”
इस शेर में महबूब की ख़ूबसूरती और दिल की रौशनी को बेहद ख़ूबसूरत अंदाज़ में बयान किया गया है।
एक और मशहूर शेर में उनका सूफ़ियाना रंग साफ़ दिखाई देता है।
“न मैं काफ़िर, न मैं मोमिन, वो जाने और मैं जानूं,
सर-ए-बाज़ार कह दूं, डर नहीं शैख़-ओ-बरहमन का।”
यह शेर इंसान और ख़ुदा के बीच के निजी रिश्ते की तरफ़ इशारा करता है, जहां बाहरी पहचान से ज़्यादा अहमियत दिल की सच्चाई को दी गई है।
जुदाई का दर्द भी उनकी शायरी का अहम हिस्सा है। वे लिखते हैं।
“क़ियामत-सा गुज़रता है मेरा हर दम जुदाई का,
किससे करूं मैं ज़िक्र तेरी बेवफ़ाई का।”
इस शेर में जुदाई की तड़प और मोहब्बत का दर्द बेहद असरदार अंदाज़ में सामने आता है।
सहव हैदराबादी ने औलिया-ए-किराम और बुज़ुर्गों की शान में भी बेहतरीन कलाम कहा। उनकी नज़्मों और ग़ज़लों में रूहानी मुहब्बत, अदब और अक़ीदत का गहरा रंग दिखाई देता है। यही वजह है कि उनका कलाम सिर्फ़ साहित्य नहीं, बल्कि रूह की ग़िज़ा भी माना जाता है।
15 रबीउल अव्वल 1324 हिजरी को 67 साल की उम्र में सहव हैदराबादी का इंतिक़ाल हुआ। मगर उनकी शायरी, उनके ख़यालात और उनकी सूफ़ियाना तालीम आज भी ज़िंदा है। उन्होंने अपने इल्म, अदब और शायरी के ज़रिए यह पैग़ाम दिया कि इंसान की असली पहचान उसके अख़लाक़, मोहब्बत और ख़ुदा से सच्चे रिश्ते में है।
उर्दू अदब के इतिहास में आगा मुहम्मद दाऊद ‘सहव’ हैदराबादी का नाम एक ऐसे सूफ़ी शायर के रूप में हमेशा याद रखा जाएगा, जिसने अपनी शायरी और अपने किरदार से मुहब्बत, इंसानियत, तसव्वुफ़ और इल्म की शमा हमेशा रौशन रखी।
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