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Sunil Jaglan: एक पिता ने बदल दी सोच: Selfie with Daughter से गालीबंद घर तक की Journey

आज हम बात कर रहे हैं सुनील जगलान (Sunil Jaglan) की, जिन्होंने एक Math teacher से लेकर गांव के सरपंच तक का सफर तय किया और फिर देश-दुनिया में ‘Selfie with Daughter’ जैसे मुहिम से समाज की सोच बदलने का काम किया। हाल ही में हमारे Podcast Diverse Dialogues में उन्होंने अपने अनूठे सफर और विचारों पर खुलकर बातचीत की।

शुरुआत एक पिता के एहसास से

सुनील जी का कहना है कि उनके अंदर का बदलाव उनकी बेटी नंदिनी ने लाया। 9 जून 2015 को उन्होंने अपनी बेटी के साथ एक सेल्फी ली और सोशल मीडिया पर डाली। उनका मकसद था पिता-बेटी के प्रेम को एक साधारण तस्वीर के ज़रिए दिखाना। ये सेल्फी धीरे-धीरे देश भर में फैल गई और लाखों पिताओं को अपनी बेटियों के साथ ऐसी ही सेल्फी लेने के लिए इंस्पायर  किया। उनका कहना है, ‘सेल्फी एक तरह से ‘सेल्फिश’ होती थी, लेकिन बेटी को जोड़ने से उसका मतलब बदल गया।’

खाप पंचायत से लड़कियों की ‘लाडो पंचायत’ तक

हरियाणा जैसे राज्य में जहां खाप पंचायतों (Khap Panchayats) में महिलाओं की भागीदारी न के बराबर थी, सुनील जी ने बदलाव की शुरुआत की। उन्होंने ‘लाडो पंचायत’ (Lado Panchayat) की शुरुआत की, जहां लड़कियां खुद अपने हकों की बात करती हैं। इन पंचायतों में हजारों लड़कियों ने हिस्सा लिया और उन्होंने लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने जैसे मुद्दों पर 10,000 से ज्यादा पोस्टकार्ड प्रधानमंत्री मोदी को भेजे। हैरानी की बात है कि इस जनआंदोलन का असर संसद तक हुआ और इस सबजेक्ट पर गंभीरता से विचार हुआ।

महिलाओं के ख़िलाफ़ गाली: एक मानसिक बीमारी

सुनील जी का एक और बड़ा अभियान है ‘गालीबंद घर’ (Gaali Band Ghar)। उनके मुताबिक, गाली देना एक तरह की मानसिक हिंसा (Mental violence) है, जो अक्सर महिलाओं के खिलाफ होती है। उन्होंने बताया कि दिल्ली जैसे महानगर में 80 फीसदी लोग मां-बहन-बेटी की गाली देते हैं, जबकि नॉर्थ ईस्ट  के राज्यों में ये आंकड़ा 7-15 फीसदी ही है। उनका कहना है कि गाली इमोशनल वायलेंस की शुरुआत है और इसे रोकना जरूरी है। यहां तक कि उन्होंने इस मुद्दे को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुंचाया, जिन्होंने लाल किले से भी इस पर बात की।

महिलाओं की आज़ादी अधूरी है: सुनील जगलान

सुनील जी मानते हैं कि देश 1947 में आजाद हुआ, लेकिन 70 फीसदी महिलाएं आज भी पूरी तरह आज़ाद नहीं हैं। उनका कहना है कि बदलाव की शुरुआत घर से होनी चाहिए। ‘जिस घर में लड़कियों को सम्मान मिलेगा, वहीं से एक नए समाज की नींव पड़ेगी,’ वे कहते हैं। उन्होंने अपने गांव में महिला हितैषी पंचायत बनाई, बेटियों के नाम पर सड़कों के नाम रखे और देश की पहली डिजिटल पंचायत (Digital Panchayat) का संचालन किया।

युवाओं का साथ और भविष्य की योजना

सुनील जी अब तक 100 से ज्यादा प्रोजेक्ट लॉन्च कर चुके हैं, जिनमें मेनोपॉज अवेयरनेस, ब्रेस्ट कैंसर जागरूकता और लाडो पुस्तकालय जैसे अभियान (Campaigns such as menopause awareness, breast cancer awareness, and the Lado Library project.) शामिल हैं। उनका लक्ष्य है कि 2026 तक देश भर में 75 बालिका सरपंच बनाए जाएं। वे युवाओं से अपील करते हैं कि वे www.selfiewithdaughter.org या उनकी फाउंडेशन से जुड़कर इस बदलाव का हिस्सा बनें।

बदलाव की शुरुआत हमसे

सुनील जगलान की कहानी साबित करती है कि एक व्यक्ति का विचार दुनिया बदल सकता है। सेल्फी विद डॉटर से लेकर गालीबंद घर (From Selfie with Daughter to Abuse-Free Home) तक, उनका सफर इस बात का प्रमाण है कि सच्चा बदलाव हमारी सोच से शुरू होता है।

ये भी पढ़ें: अब्दुल मन्नान समदी: रूहानी एहसास और अदबी फ़िक्र का संगम

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