जम्मू-कश्मीर के बांदीपोरा ज़िले की रहने वाली 32 साल की Aasiya (आसिया) की कहानी किसी एक महिला की नहीं, बल्कि उन तमाम औरतों की आवाज़ है जो मुश्किल हालात के बावजूद हार मानने से इंकार कर देती हैं। Aasiya (आसिया) के पति इंडियन आर्मी में सेवा कर रहे थे और ड्यूटी के दौरान वो शहीद हो गये। पति को खोना, दो बच्चों की ज़िम्मेदारी और सामाजिक दबाव इन सबने Aasiya (आसिया) की ज़िंदगी को अचानक बदल दिया। लेकिन इन हालातों ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि मज़बूत बनाया।
सेना से मिला रास्ता, खेती से मिली पहचान
Aasiya (आसिया) ने DNN24 को बताया कि “मेरे पति 2 नवंबर 2015 में शहीद हो गये थे। Aasiya (आसिया) को मशरूम खेती का आइडिया उस समय मिला जब वो बटालियन कुपवाड़ा में गई, जहां उनके पति तैनात थे। उस वक़्त सालगिरह बनाने के लिए बटालियन के सीओ साहब ने बुलाया था। तब उन्होने अपनी सारी परेशानियां सीओ साहब को बताई। और कहा कि मैं कुछ करना चाहती हूं। वहां यूनिट के सीओ साहब ने उनकी बात सुनी और उन्हें मशरूम कल्टीवेशन का सुझाव दिया। उन्होंने Aasiya (आसिया) की बात ज़िला कृषि अधिकारियों तक पहुंचाई। वहां से Aasiya (आसिया) को सही दिशा और गाइडेंस मिला।
ज़मीन नहीं थी, हौसला था
Aasiya (आसिया) के पास न खेत थे, न खेती के लिए ज़मीन और न ही कोई बड़ा संसाधन। लेकिन उनके पास था हौसला, और कुछ कर दिखाने की ज़िद। उन्होंने ये साबित कर दिया कि एक कामयाब किसान बनने के लिए ज़मीन से ज़्यादा ज़रूरी होता है इरादा। Aasiya (आसिया) ने अपने पिता के घर की छत को ही अपनी खेती की ज़मीन बना लिया। उसी छत से उनकी नई ज़िंदगी की शुरुआत हुई।

Aasiya (आसिया) ने सबसे पहले छत पर मशरूम उगाने का काम शुरू किया। इस दौरान उन्हें कृषि डिपार्टमेंट की मदद मिली। मशरूम तैयार करने के बाद बचने वाले कंपोस्ट को ज़ाया न करने की सोच ने उन्हें नया रास्ता दिखाया। क्योंकि उनके पास ज़मीन नहीं थी, इसलिए उन्होंने पहले स्लैब पर और फिर टोकरियों में मिट्टी भरकर सब्जियां उगाने का तरीका अपनाया। ये एक छोटा कदम था, लेकिन यही कदम उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मोड़ बन गया।
पहली सफलता ने बढ़ाया आत्मविश्वास
कई तरह की परेशानियां, लोगों की बातें और असुरक्षा के माहौल के बीच भी Aasiya (आसिया) अपने बच्चों के भविष्य को लेकर डटी रहीं। उन्होंने तय कर लिया था कि हालात चाहे जैसे भी हों, वो आत्मनिर्भर बनेंगी। मशरूम की पहली ही फसल में आसिया को सफलता मिली। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी छत पर सब्जियां, मसाले और औषधीय पौधे उगाने शुरू किए। पूरी छत को एक न्यूट्रिशन गार्डन में बदल गई। ये सिर्फ खेती नहीं थी, बल्कि आत्मनिर्भरता की एक नई मिसाल थी।
मेहनत से बनी कमाई का रास्ता
आज Aasiya (आसिया) हर महीने लगभग 30 किलो मशरूम और सैकड़ों किलो सब्जियां बेचती हैं। कस्टमर खुद फोन करके उनके घर से सामान ले जाते हैं। उन्हें बाज़ार जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। मशरूम और सब्जियों से Aasiya (आसिया) हर महीने करीब 30 से 35 हज़ार रुपये कमा लेती हैं। ये कमाई उनके आत्मसम्मान और आत्मविश्वास की पहचान है।
पति के जाने के बाद Aasiya (आसिया) के लिए उस जगह रहना मुश्किल हो गया। बाद में वो अपने पिता के घर आ गईं। पिता ने उन पर भरोसा किया और हर कदम पर साथ दिया। इस सपोर्ट ने आसिया को आगे बढ़ने की ताकत दी। आज वो न सिर्फ़ अपने बच्चों की पढ़ाई और ज़रूरतें पूरी कर रही हैं, बल्कि परिवार का मज़बूत सहारा भी बन चुकी हैं।

महिलाओं के लिए बनीं प्रेरणा
Aasiya (आसिया) की कहानी सिर्फ़ उनकी अपनी नहीं रही। वो अब दूसरी महिलाओं को भी मशरूम और रूफ-टॉप फार्मिंग की ट्रेनिंग देती हैं। कई लड़कियां उन्हें कॉल करके सीखना चाहती हैं। कृषि डिपार्टमेंट के स्टॉल्स, डीसी ऑफिस, स्कूल और लोकल इवेंट्स में आसिया को बुलाया जाता है। इससे उनकी पहचान और मार्केटिंग दोनों बढ़ी हैं।
Aasiya (आसिया) को उनके काम के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। हाल ही में मिला सम्मान इस बात का प्रतीक है कि अगर ज़मीन कम हो, तो रास्ते आसमान में भी खोजे जा सकते हैं। उनकी मेहनत ने उन्हें कश्मीर की एक प्रेरणादायक महिला किसान के रूप में पहचान दिलाई है।
छत पर उगता बदलाव
Aasiya (आसिया) की कहानी हमें सिखाती है कि खेती सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है। इच्छा, मेहनत और हिम्मत भी एक तरह की ज़मीन होती है। रूफ-टॉप और इंडोर फार्मिंग आज महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने, अपनी पहचान बनाने और सम्मान के साथ जीने का मौका दे रही है। कश्मीर की इस छत पर उगती हर फसल इस बात का सबूत है कि बदलाव कहीं भी पनप सकता है।
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