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गायक अताउल्ला ख़ान की दास्तान

अताउल्ला ख़ान (Ataullah Khan) का पूरा खेल एक गढ़ी गयी कहानी में छिपा है.

1980 के दशक के बीच में शुरू हुई कैसेट क्रान्ति (The Cassette Revolution) ने दुनिया भर के संगीत को देश के दूरस्थ गांवों-नगरों तक पहुंचा दिया था. इसके चलते देश के छोटे-छोटे कस्बों तक में मैडोना का ‘पापा डोन्ट प्रीच’ भी पहुँच गया था और मेहदी हसन का ‘प्यार भरे दो शर्मीले नैन’ भी. इसी दौर में एक कैसेट कम्पनी के नेतृत्व में रफी-किशोर की नकली आवाजों का कारोबार फूलना शुरू हुआ. एचएमवी और ईएमआई से एक तिहाई दाम पर मिल जाने वाले इस कम्पनी के कैसेट्स ने हर तरह के संगीत को कुलीन ड्राइंगरूमों से बाहर निकाल कर जनसुलभ बनाया. 1990 नब्बे के दशक के आते-आते तमाम ट्रक और ऑटोरिक्शे टेपरेकॉर्डरों से लैस हो चुके थे जिन्हें डेक कहा जाता था. टी सीरीज और डेक की यही जुगलबंदी भारत भर में अताउल्ला खान (Ataullah Khan) की प्रसिद्धि का सबब बनी.

दिल्ली की गर्मी में आईएसबीटी से महरौली जा रहा ऑटो हो चाहे कानपुर से गौहाटी के लम्बे रास्ते पर जा रहा ट्रक – ड्राइवरों के संग्रहों में अताउल्ला खान के एकाध कैसेट ज़रूरी तौर पर पाए जाते थे. परिवार और व्यक्तिगत जीवन से महरूम बना दी गयी इस कौम की आधी-अधूरी प्रेमकथाओं और दुखों को अताउल्ला ख़ान ने संबोधित किया. उसकी आवाज में इन लोगों को अपनी मोहब्बत की आवाज नसीब हुई. रात के तीन बजे सड़क पर ट्रक चला रहे उस उनींदे युवा ड्राइवर के बारे में सोचिये जिसे हर मोड़ पर पुलिस की चेकिंग का खतरा है. जाहिर है उसे अपनी महबूबा की याद भी आती होगी. उस बेचैनी में वह कैसेट पर ‘तुझे भूलना तो चाहा लेकिन भुला न पाया’ लगा देता है और अगले पांच-सात मिनट तक उसकी आत्मा एक संत में तब्दील हो जाती है.

पाकिस्तान के पंजाब में मियांवाली के समीप ईसाखेल नाम के छोटे से गांव में 19 अगस्त 1951 को जन्मे अताउल्ला ख़ान नियाजी को लेकर किसी शातिर इंसान ने एक झूठी कहानी बनाई और उसे सारे भारत में फैला दिया. पता नहीं पाकिस्तान में यह कहानी चली भी या नहीं.

इस कहानी के मुताबिक़ अताउल्ला ख़ान की एक प्रेमिका थी. प्रेमिका ने बेवफाई की और किसी और से निकाह करने का फैसला कर लिया. ऐन निकाह के दिन अताउल्ला शादी के मंडप में पहुंचे और प्रेमिका के होने वाले शौहर की हत्या कर दी. जेल हुई, मुकदमा चला और अताउल्ला को फांसी की सजा सुनाई गयी. जेल में ही उन्होंने वे सारे गाने लिखे, गाये और रेकॉर्ड किये. हिन्दी सिनेमा में दिखाई जाने वाली अतिसंवेदनशील और सतही मोहब्बत की मारी हिन्दुस्तान की मजलूम और दुखी जनता को अताउल्ला खान की यह ठेठ फ़िल्मी कहानी बेतरह पसंद आई. यहां तक बताया गया कि अताउल्ला के सारे गानों की रेकॉर्डिंग जेल के भीतर की जाती है.

कैसेट्स की बिक्री बढ़ाने के लिए फिर एक और शगूफा छोड़ा गया – अताउल्ला को रिहा कराना है और इस काम के लिए बहुत सारे पैसे चाहिए. कैसेट कम्पनियां खुद जी-जान से उसके साथ हैं और दुनिया के सबसे महंगे वकीलों को इस काम के लिए रख रही हैं. हर कैसेट से होने वाली कमाई का हिस्सा इस खर्च की मद में जाएगा. अताउल्ला के हर चाहने वाले ने इस पवित्र अनुष्ठान में हाथ बंटाया और बिक्री कई गुना बढ़ गयी. कई लोगों ने तो अपनी बचत के पैसों के ड्राफ्ट बनवा कर कैसेट कंपनी के दफ्तर भेजे. ट्रकों-रिक्शों के अलावा अब छोटे-मोटे ढाबों-खोमचों में भी अताउल्ला खान के तनिक दबे हुए तलफ्फुज वाली लेकिन गहरी आवाज ऐलान करने लगी – ‘मुझको ये तेरी बेवफाई मार डालेगी’.

अताउल्ला खान ने करीब दस साल तक उत्तर भारत के गरीब और वंचित वर्ग को अपने गीतों से मोहब्बत का वह मरहम मुहैया कराया जिस तक उसके पहले केवल मध्यवर्ग की पहुंच थी. इस मध्यवर्ग ने अताउल्ला ख़ान की आवाज का मजाक उड़ाया और उसकी अनदेखी करने की तमाम असफल कोशिशें भी कीं.

फिर कुछ हुआ कि अताउल्ला खान को हमारी स्मृति से गायब कर दिया गया.

दस बरस पहले कोक स्टूडियो (Coke Studio) ने इस गायक को नए अंदाज में पेश किया. उसके बाद जब 2018 में फैज-इकबाल बानो की जुगलबंदी वाले ‘हम देखेंगे’ के रीमिक्स वीडियो में भी उन्हें जगह मिली तो अपने यहां के लोगों के भीतर उनके बारे में और अधिक मालूमात करने की इच्छा जागी.

जो लोग अताउल्ला खान को एक घटिया गायक समझते आये हैं उनकी जानकारी के लिए बताना उचित रहेगा कि सत्तर के दशक की शुरुआत से ही पंजाबी, पश्तो और सरैकी लोकसंगीत में एक बड़ा नाम समझे जाने वाले इस गायक को उनके देश ने सितारा-ए-इम्तियाज और प्राइड-ऑफ़-परफॉरमेंस अवार्ड से नवाजा है. उनका अपना कल्ट है और उनके बेशुमार चाहने वाले उन्हें लाला (बड़ा भाई) के नाम से संबोधित करते हैं. मेहराबों और नक्काशियों वाली क्लासिकल शैली में बनाई गयी अपनी हवेली में रहने वाले अताउल्ला ख़ान साक्षात्कारों में एक शॉफ्ट स्पोकन और बेहद जहीन इंसान के तौर पर सामने आते हैं. हमेशा पठान सूट और शाल पहनने वाला यह उस्ताद लोकगायक संगीत के अंडरग्राउंड का बेताज बादशाह रहा है.

जेल और फांसी वाली कहानी पूरी तरह नकली है. असल कहानी यह है कि उन्होंने चार बार निकाह रचाया. मोहब्बत की चोटों और बेवफाइयों को एक अत्यंत सफल कारोबार में बदल देने वाले इस गवैये को जिन्दगी में इतनी मोहब्बत हासिल हुई कि आप उससे जितनी चाहें ईर्ष्या कर सकते हैं.

डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में बताए गए विचार सिर्फ़ लेखक के हैं और DNN24 या किसी जुड़े हुए संगठन के विचारों या राय को नहीं दिखाते हैं।

इस लेख को पंजाबी में पढ़ें

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Ashok Pande
Ashok Pandehttp://kabaadkhaana.blogspot.com
अशोक पांडे चर्चित कवि, चित्रकार और अनुवादक हैं। उनका प्रकाशित उपन्यास ‘लपूझन्ना’ काफ़ी सुर्ख़ियों में रहा है। पहला कविता संग्रह ‘देखता हूं सपने’ 1992 में प्रकाशित। जितनी मिट्टी उतना सोना, तारीख़ में औरत, बब्बन कार्बोनेट अन्य बहुचर्चित किताबें। कबाड़खाना नाम से ब्लॉग kabaadkhaana.blogspot.com। अभी हल्द्वानी, उत्तराखंड में निवास।

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