Tufail Niazi: जब रांझे (Ranjhe) से मिलने की सारी उम्मीदें ध्वस्त हो जाती हैं, हीर (heer) के दिल से इस अहसास का दर्द रिसना शुरू होता है कि ढूंढ़ते-ढूंढ़ते मुझे भगवान तो मिल गया मगर रांझा न मिल सका क्योंकि भगवान भी रांझे जैसा नहीं है –
रांझण ढूँढण मैं चली, मैनू रांझण मिलिया ना
रब मिलिया रांझा ना मिलिया, रब रांझे वरगा ना
साल 1992 की बात है जब पंजाब की ज़मीन में उपजी इस अमर प्रेम कहानी के गायन के दो कैसेट कहीं से हाथ लग गए. यह तकरीबन डेढ़ घंटे की परफॉरमेंस थी. एक उस्ताद गवैया-नैरेटर था जो अपनी असम्पृक्त आवाज़ में क़िस्सा सुनाता और बीच-बीच में हीर बन कर गाता. इसी हीर को पहली बार अकेले में सुन कर मशहूर उर्दू लेखक मुमताज़ मुफ्ती (Famous Urdu writer Mumtaz Mufti) को लगा था जैसे कोई बेज़ुबान गुलाम अपनी मज़लूमियत और दुःख पर कराह रहा हो.
तुफैल नियाज़ी (Tufail Niazi) की गायकी को मैंने पिछले तीस सालों से अपने एकांत के लिए संजो-सम्हाल रखा है. दुखी होता हूँ तो उन्हें सुनता हूं. खुश होता हूं तो उन्हें सुनता हूं. कई बार उन्हें ऐसे भी सुना जाता है. हर बार कैथार्सिस (catharsis) घटती है, हर बार अपने और संसार के भीतर की कोई चीज नए तरीक़े से समझ में आती है.
पखावज बजाने वालों के ख़ानदान से ताल्लुक रखने वाले तुफैल पंजाब के जालन्धर जिले के एक छोटे से मडेरां गांव में 1916 में जन्मे थे. सिख-बहुल मडेरां गांव में उनका इकलौता मुसलमान ख़ानदान था.
हिन्दुस्तानी गायकी की बुनियाद यानी ध्रुपद का पालना कहा जाने वाला शाम चौरासी कस्बा उनके गांव का रेलवे स्टेशन था. उनके पुरखे शाम चौरासी के बड़े गवैयों के साथ संगत करते आये थे.
बचपन में ही उनकी समझ में आ गया था कि संगीत का शरीर तो ताल के भीतर होता है पर उसकी आत्मा सुर में बसती है. सो खानदानी पेशा छोड़ कर उन्होंने गाना सीखा और बहुत छोटी आयु में अमृतसर के नज़दीक पैनी साहब गुरुद्वारे में गुरबानी, कीर्तन और श्लोक गाने का पवित्र पेशा अपना लिया. कुछ साल बाद उनके पिता उन्हें अमृतसर जिले की ही गोंदवाल नाम की जगह पर लेकर गए जहां उन्होंने एक गौ-सेवा संगठन के लिए गाँव-गाँव घूम कर गाना गाते हुए प्रचार का काम सम्हाला. इन सीधे-सादे गीतों में लोगों से गायों की सेवा-टहल करने की अपील की जाती थी.
चार साल इस काम को करते रहने के दरम्यान तुफैल की संगत बटाला के रहने वाले पंडित नत्थूराम से बैठ गयी जिनसे उन्होंने अनेक रागों और बंदिशों की तफसीलें सीखीं. इसी गोंदवाल में हरबल्लभ का छोटा मेला लगा करता थी जिसमें जालन्धर-दिल्ली-सहारनपुर-आगरा जैसी जगहों के बड़े शास्त्रीय गवैये शिरकत करते थे. उनसे सिलसिला बन गया. गौशालों में ध्रुपद का रियाज़ करते क्लासिकल संगीत से ऐसी लगावट लगी कि वे रासधारियों में शामिल हो गए. रासधारियों के यहां राम और कृष्ण की पूजा होती थी और उनके पास लोकसंगीत का खजाना हुआ करता था.
दो साल रासधारियों के साथ बिताने के बाद तुफैल नियाजी बाकायदा एक नौटंकी पार्टी में शामिल हो गए. किस्साख़ानी की इस लोकप्रिय विधा से उन्होंने सुर और बयान की संगत करने का शऊर सीखा. गाने के साथ-साथ अभिनय भी किया और तमाम ड्रामों में पूरन भगत से लेकर पुन्नू और रांझे से लेकर महीवाल के रोल किये.
इतने विविध और रंगबिरंगे इलाकों से होकर उनकी गायकी में जब एक अलग रंग आने लगा तो उन्होंने अपनी अलग टोली बना ली और मेलों-कूचों में गाने लगे. बाकायदा बुकिंग होने लगी. रोटी-पानी का सही मिजान बैठने लगा. जिन्दगी में पहली बार सलीके की कमाई होने लगी ही थी कि मुल्क का बंटवारा हो गया.
फैज़ का शेर है –
दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझसे भी दिलफरेब हैं ग़म रोज़गार के
मुल्तान पहुंचने के बाद इसी तर्ज़ पर संगीत उनके जीवन के हाशिये में चला गया. रोजी-रोटी का मसला फिर से उठ खड़ा हुआ. ऊपर से मुल्तान की जुबान भी उनकी समझ में ज्यादा नहीं आती थी. गोंदवाल का तजुर्बा काम आया और तुफैल नियाज़ी ने चुपचाप दूध-खोये का धंधा करने के साथ-साथ हलवाईगिरी भी शुरू कर दी.
ऐसे में कुछ महीनों बाद एक दिन किसी फ़रिश्ते की तरह ख़ुशी मोहम्मद चौधरी नाम का एक पुराना दोस्त तुफैल की दुकान में आ गया. चौधरी और तुफैल की जान-पहचान जालंधर के दिनों से थी और वह मुल्तान के उस इलाके के पुलिस महकमे में मुलाजिम लग गया था. उसने तुफैल को पहचाना और गायक से हलवाई बन जाने पर मोहब्बत भरी लताड़ लगाई. ख़ुशी मोहम्मद चौधरी ने दुकान छुड़वा दी, साज़ दिलवाए और इधर-उधर से पैसा इकठ्ठा कर तुफैल को वापस संगीत में आने में मदद की.
किसी भी हुनर का उस्ताद बन जाने के बाद बड़ी कामयाबी के लिए इत्तफाकों का होना बहुत ज़रूरी होता है. ऐसे ही इत्तफाकों के चलते एक दिन तुफैल रेडियो पर आये और फिर टीवी पर. टीवी की पहली बड़ी महफ़िल के बाद तुफैल नियाज़ी सुनने वालों के दिल बन गए. 1990 में हुई मृत्यु के बाद आज भी उनकी गिनती सबकॉन्टिनेंट के सर्वकालीन महानतम लोकगायकों में की जाती है.
इतने सारे टेढ़े-मेढ़े रास्तों से होते हुए, रोज़गार की तमाम भूलभुलैयों को छकाते हुए जब उनके जीवन में सुकून आया तो उन्होंने दर्द की इबादत शुरू की और जीवन भर सिर्फ हीर गाई. उस हीर के दर्द को जुबान देने से बड़ी इबादत क्या हो सकती थी जिसका रांझा ख़ुदा से भी बड़ा था और जिससे मिलने की इकलौती सूरत उन दोनों की ट्रेजिक मौत में बन सकनी थी.
तुफ़ैल नियाज़ी को सुनना मोहब्बत करने जैसा है.
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में बताए गए विचार सिर्फ़ लेखक के हैं और DNN24 या किसी जुड़े हुए संगठन के विचारों या राय को नहीं दिखाते हैं।
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