Monday, July 13, 2026
41.7 C
Delhi

लखनवी ज़ायका कैसे पहुंचा कोलकाता ?

कोलकाता के ‘Manzilat’s Restaurant’ में आज भी अवध के आख़िरी नवाब वाजिद अली शाह की रसोई की लॉस्ट रेसिपी ज़िंदा हैं। आज भी ये रेस्टोरेंट 167 साल पुराने कुजीन की ख़ुशबू से महकता है। इस रेस्टोरेंट को चला रही हैं अवध के आख़िरी नवाब वाजिद अली शाह की परपोती मंज़िलत फ़ातिमा। जो शाही कुजीन को आम लोगों के साथ शेयर कर रही हैं। आज वाजिद अली शाह की चौथी पीढ़ी यानि कि मंज़िलत फ़ातिमा अपनी विरासत को आगे बढ़ा रही हैं।

मंज़िलत फ़ातिमा ने DNN24 को बताया कि “उनकी मां लखनऊ से थीं और बाबा से शादी करने के बाद वो कोलकाता आ गईं। मेरे बाबा अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे। मंज़िलत ने बताया कि उनकी पैदाइश कोलकाता की है, लेकिन कुछ कारणों की वजह से हमें अलीगढ़ जाना पड़ा। कुछ वक्त के बाद भाई और बहन मां के साथ वापस कोलकाता आ गये। मंज़िलत अपने बाबा के साथ रही और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पांचवीं क्लास और ग्रेजुएशन बी.ए इंग्लिश से ऑनर्स किया।

मंज़िलत ने DNN24 को बताया कि जब वो बाबा के साथ अकेले रहती थीं तब खाना पकाना उनकी ज़रूरत बन गई थी। उस वक्त अम्मा ने उनको कुछ आसान चीजें बनाना सीखा दी थीं जैसे खिचड़ी, शामी कबाब। इन्हें बनाना काफी आसान होता है।

कैसे हुई ‘Manzilat’s Restaurant’ की शुरुआत

मंज़िलत रेस्टोरेंट की शुरुआत 2015 में हुई। रेस्टोरेंट से पहले मंज़िलत फ़ातिमा घर में ही दोस्तों के लिए खाना बनाती थीं। उनके दोस्त बोलते थे कि मुस्लिम खानों की तरह तुम्हारे हाथ के खाने का स्वाद कुछ अलग है। दोस्तों को कोलकाता के खाने में लखनवी खाने का स्वाद आता था। तब वो लोग मंज़िलत को रेस्टोरेंट खोलने की सलाह देते थे। एक दिन मंज़िलत ने अपने दोस्तों की सलाह के बारे में अपनी अम्मा को बताया उन्होंने कहा कि “तुम्हें वाकई में कुछ करना चाहिए। तुम्हारे खानदान का बैकग्राउंड अलग है और लोग वाजिद अली शाह और हज़रत महल को भूलते जा रहें हैं इसलिए तुम कुछ ऐसा करो जिससे कि उनकी यादें भी ताज़ा हो और लखनऊ का ज़ायका कोलकाता के लोगों को मिले जो वाजिद अली शाह की विरासत है।”

जब वाजिद अली शाह ने कोलकाता में बसाया मिनी लखनऊ

वाजिद अली शाह अवध के नवाब थे। 1856 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने वाजिद अली शाह की सत्ता छीन कर उन्हें कोलकाता के मटियाबुर्ज में भेज दिया था। इतना सब होने के बावजूद नवाब साहब को यकीन था कि वो उनके साथ हुए ग़लत बर्ताव के लिए ब्रिटिश पार्लियामेंट में अपील करेंगे और महारानी विक्टोरिया को अपनी ‘बेगुनाही’ बताएंगे।

यही उम्मीद लिए हुए वो चुनिंदा बेगमों, मलिका-ए-किश्वर (राजमाता) और मरियम मकानी (विश्वमाता) कहलाने वाली मां, युवराज मिर्जा हामिद अली, भाई सिकंदर हशमत सहित कुछ भरोसेमंद साथियों और मुलाजिमों के साथ निकले। सोचा था कि कलकत्ता पहुंचते ही लंदन जाने वाले जहाज में बैठ जाएंगे। लेकिन उनकी रास्ते में उनकी तबीयत खराब हो गई थी जिसकी वजह से वो वापस लखनऊ नहीं जा पाए थे। न ही वह लंदन जा पाएं। उन्हें कोलकाता में नज़रबंद कर दिया गया। उसके बाद वो लखनऊ नहीं जा पाएं। वाजिद अली शाह को हर चीज का शौक था। जब वो कोलकाता आए तो उन्होंने एक छोटा लखनऊ कोलकाता में तामीर करना शुरू किया था।

कोलकाता की बिरयानी में क्या है आलू का इतिहास

मंज़िलत फ़ातिमा बताती हैं कि बिरयानी कोलकाता में बहुत पॉपुलर डिश है। बंगाल के लोग तस्सवुर भी नहीं करते कि बिरयानी के बिना कोई भी फेस्टिवल गुज़र जाए। अवध के बावर्ची खाने में बहुत इनोवेशन करते थे। इस इनोवेशन के ज़रिए आलू को बिरयानी में डाला गया, ये देखने के लिए कि अगर बिरयानी में आलू डाला जाता है तो उसका स्वाद कैसा आएगा? “आलू उस वक्त गोश्त से ज्यादा महंगा था। आम लोग आलू नहीं खरीद पाते थे। जैसे ही बिरयानी में आलू डाला गया तो उसने बिरयानी का स्वाद अपने अंदर जज़्ब कर लिया और सबको वो स्वाद पसंद आया तब से यह परंपरा जारी रही।”

“हमारे यहां जो खाना बनाया जाता है वो सारा सरसो के तेल में बनाता है। खाना बनाने के लिए मैं सारे मसाले खुद तैयार करती हूं। जब हम लखनऊ जाते हैं तो वहां से कुछ मसाले लेकर आते है। अगर हम शहर से बाहर किसी इवेंट में जाते हैं तो हम अपने सूखे मसाले लेकर जाते है। हमारी टीम में सात लेडीज काम करती हैं। अगर हमें ज्यादा लोगों की ज़रूरत होती है तो हम बाहर से मांगा लेते है।”

गंगा जमुनी तहज़ीब को नवाबों ने कैसे दिया बढ़ावा

मंज़ितल कहती हैं कि जब वाजिद अली तख़्त पर आए तब गंगा जमुनी तहज़ीब का कल्चर अपने टॉप पर था। उन्होंने हिंदू मुस्लिम में कभी बैर नहीं किया। मंदिर के तामीर के लिए बहुत सारी ज़मीने दान दी गई थीं। कई मेले लगते थे जिसमे हिंदू मुस्लिम मिलकर शिरकत करते थे। वाजिद अली शाह कृष्ण जी को बहुत मानते थे उन्होंने काफी ठुमरियां कृष्ण जी के लिए लिखी हैं। कहते है कि जन्माष्टमी के दिन वो खुद कृष्ण जी अवतार बनते थे और नुक्कड़ नाटक करते थे।

जब मोहर्रम पर हिंदुओं ने नहीं मनाई होली

मंज़िलत फ़ातिमा ने DNN24 को बताया कि मोहर्रम में एक बार जब वाजिद अली शाह जुलूस में जा रहे थे तो उन्होंने देखा कि उनके हिंदू भाई कुछ उदास है, तो उन्होंने अपने वज़ीर को उनके पास भेजा ये पूछने के लिए कि वो लोग उदास क्यों है? तो उन्होंने बताया कि आज बादशाह मोहर्रम मना रहें हैं आज ग़म का दिन है इसलिए उन्होंने होली का त्योहार नहीं मनाया।जब उन्हें ये बात पता चली तो नवाब साहब काफी जज़्बाती हो गए और जब जूलुस ख़त्म हुआ तो नवाब साहब वापस उन लोगों के पास गए और होली का त्योहार मनाया।

फ़िल्म गुलाबो सिताबो और तोहफे में मिला महल

मंज़िलत से जब पूछा गया कि वो अपनी ज़िंदगी से जुड़ा कोई रोचक किस्सा शेयर करें तो उन्होंने बताया कि एक दिन उनसे मिलने एक फैमिली आई थी, जिन्होंने उन्हें बताया कि उनके बुजुर्ग वाजिद अली शाह के दरबार में जानवरों के डॉक्टर थे और वाजिद अली शाह ने उनके पूर्वजों को तोहफे के तौर पर एक महल दिया था। उन्होंने बताया कि इस महल में अमिताभ बच्चन की फिल्म गुलाबो सिताबो की शूटिंग भी हुई थी।

मंज़िलत कहती हैं कि वो अपने खानदानी खाने को आगे बढ़ा रही हैं लेकिन उनके बच्चों की रुचि खाना बनाने की तरफ नहीं हैं इसलिए वो चाहती हैं कि वो अवध के खाने के ऊपर एक किताब लिखें। हो सकता है कि वो इस पर एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाएं जो खाने के साथ साथ अवध के नवाबों से जुड़ी हुई हों।

ये भी पढ़ें: एक हादसे के बाद मां-बाप ने छोड़ा साथ, पैरों से पेटिंग बनाकर जीता नेशनल अवॉर्ड 

आप हमें FacebookInstagramTwitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

रेड कॉरिडोर से वापसी का रास्ता

सालों तक, दक्षिण बस्तर के जंगलों में रहने वाले...

मोहसिन ज़ैदी: सादगी, एहसास और उर्दू अदब की पहचान

उर्दू अदब की दुनिया में मोहसिन ज़ैदी ने ग़ज़ल...

मख़मूर सईदी: उर्दू अदब का संजीदा और फ़िक्रमंद शायर

उर्दू शायरी की दुनिया में मख़मूर सईदी का नाम...

हबीब जालिब: अवाम की आवाज़ और इंक़िलाब का शायर

उर्दू अदब में जब भी ऐसे शायरों का ज़िक्र...

रईस अमरोहवी: अल्फ़ाज़ से फ़िक्र की दुनिया रौशन करने वाले शायर 

उर्दू अदब की दुनिया में रईस अमरोहवी का नाम...

Topics

रेड कॉरिडोर से वापसी का रास्ता

सालों तक, दक्षिण बस्तर के जंगलों में रहने वाले...

मोहसिन ज़ैदी: सादगी, एहसास और उर्दू अदब की पहचान

उर्दू अदब की दुनिया में मोहसिन ज़ैदी ने ग़ज़ल...

मख़मूर सईदी: उर्दू अदब का संजीदा और फ़िक्रमंद शायर

उर्दू शायरी की दुनिया में मख़मूर सईदी का नाम...

हबीब जालिब: अवाम की आवाज़ और इंक़िलाब का शायर

उर्दू अदब में जब भी ऐसे शायरों का ज़िक्र...

रईस अमरोहवी: अल्फ़ाज़ से फ़िक्र की दुनिया रौशन करने वाले शायर 

उर्दू अदब की दुनिया में रईस अमरोहवी का नाम...

सैय्यद अहमदउल्लाह क़ादरी: उर्दू अदब, सहाफ़त और क़ौमी यकजहती के अलमबरदार     

उर्दू अदब और सहाफ़त की दुनिया में लिसान-उल-मुल्क सैय्यद...

Related Articles

Popular Categories