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काकोरी काण्ड: शहीदों की शहादत ने दिया था आज़ादी को नया मोड़

आज़ादी हमें तोहफे़ में नहीं मिली बल्कि लाखों देशवासियों की क़ुर्बानियों का नतीजा है। इसे हासिल करने के लिए स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपनी ज़िंदगी दांव पर लगा दी। ग़दर पार्टी और हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े क्रांतिकारियों का यकीन क्रांति था। वो जानते थे कि आज़ादी संघर्ष और लड़ाई से ही हासिल होगी। इसलिए साल 1942 में रामप्रसाद बिस्मिल ने अपने कुछ क्रांतिकारी साथियों के साथ हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की नींव रखी।

9 अगस्त, 1925 को सहारनपुर से लखनऊ जाने वाली ट्रेन को लखनऊ से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित काकोरी स्टेशन पर लूट लिया गया। इस वाक़ये को अंज़ाम देने वालों में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाकउल्ला ख़ां, राजेंद्र लाहिड़ी, चन्द्रशेखर आज़ाद, मन्मथनाथ गुप्त, शचीन्द्रनाथ बख्शी, ठाकुर रोशन सिंह और केशव चक्रवर्ती समेत दस क्रांतिकारी शामिल थे। काकोरी काण्ड ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव को हिलाकर रख दिया।

लेकिन इस घटना के बाद कुछ क्रांतिकारियों को काला पानी की सज़ा, तो कुछ को चार से चौदह साल तक की क़ैद की सज़ा सुनाई गई और कुछ को फांसी दी गई। जब फांसी देने से पहले रामप्रसाद बिस्मिल की आख़िरी इच्छा पूछी गई, तो उन्होंने बड़े ही बहादुरी से जवाब दिया, ‘‘मैं अपने मुल्क से ब्रिटिश हुकूमत का ख़ात्मा चाहता हूं। ब्रिटिश साम्राज्यवाद का नाश हो।”

मुल्क की आज़ादी को मिले एक लंबा अरसा हो गया, लेकिन पं. रामप्रसाद बिस्मिल और उनके क्रांतिकारी साथियों के बहादुरी भरे क़िस्से आज भी देशवासियों की ज़ु़बान पर हैं। इन क्रांतिकारियों की शहादत का नतीज़ा है कि हम आज खुली हवा में सांस ले रहे हैं।

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