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इस्मत चुग़ताई: उर्दू अदब की बुलंद आवाज़ और बेबाक कलम की शख़्सियत 

उर्दू अदब की फ़िज़ा में जब बेबाकी की खुशबू तलाश की जाती है, तो सबसे पहले जिस नाम की लौ जलती है, वो है इस्मत चुग़ताई

एक ऐसी शख़्सियत जिन्होंने सिर्फ़ कलम नहीं चलाई, बल्कि उस कलम से समाज की जमी-जमाई दीवारों पर तंज़ और तहरीक के निशान छोड़ दिए। पतरस बुख़ारी ने ठीक ही कहा था कि इस्मत उर्दू अदब के लिए फ़ख्र हैं। वो अपने दौर की नहीं, बल्कि आने वाले कल की आवाज़ थीं।

अलीगढ़ की गलियों से उठती आवाज़

1915 में बदायूं के एक ज़मींदार परिवार में जन्मी इस्मत का अलीगढ़ से ताल्लुक़ सिर्फ़ तालीम तक नहीं रहा, बल्कि उनकी सोच, उनके तेवर, और उनका बग़ावती मिज़ाज अलीगढ़ की उसी तालीमी और तहज़ीबी सरज़मीन की देन थी। नौ भाई-बहनों में सबसे छोटी इस्मत ने जब होश संभाला, तब तक घर के बड़े फैसले ‘मर्द’ ही किया करते थे। मगर इस्मत वो लड़की थीं जो गुल्ली-डंडा खेलती थीं, पेड़ों पर चढ़ती थीं और ‘लड़कियों को ये शोभा नहीं देता’ जैसे जुमलों पर सिर्फ़ मुस्कराती थीं।

उनकी ज़िद और जुनून का आलम ये था कि जब आगे पढ़ने से रोका गया, तो उन्होंने एलान कर दिया कि अगर तालीम ना मिली, तो वो मिशन स्कूल में दाख़िला लेकर ईसाई बन जाएंगी। उनका ये अंदाज़-ए-बयान ही था जिसने वालिद को झुका दिया और इस्मत सीधे 10वीं क्लास में एडमिशन हो गया। अलीगढ़ से एफ.ए. और फिर लखनऊ के आई.टी. कॉलेज से तालीम हासिल की, जहां उन्होंने पहली बार खुली फ़िज़ा में सांस ली।

रशीद जहां से मुलाक़ात और सोच का इंक़लाब

अलीगढ़ में ही उनकी मुलाक़ात डॉक्टर रशीद जहां से हुई। वही ‘अंगारे’ वाली बाग़ी लेखिका, जिन्होंने इस्मत के अंदर की चिंगारी को शोला बना दिया। कम्युनिज़्म, औरत की आज़ादी, बराबरी। इन सब फ़लसफ़ों से इस्मत का तार्रुफ़ यहीं से हुआ। उन्होंने रशीद आपा को अपना रुहानी उस्ताद मान लिया।

अफ़साने जो समाज का आईना बने

इस्मत ने लिखा  और कैसे लिखा! उनके अफ़सानों में समाज की घुटन, रिश्तों की पेचीदगी और औरत के दबे-कुचले एहसासात की ख़ामोश चीख़ें थीं।

“लिहाफ़” — वो अफ़साना जिसने तहलका मचा दिया। दो औरतों के रिश्ते पर लिखा गया ये अफ़साना आज भी अदबी हल्क़ों में बहस का मौज़ू बना हुआ है। इस पर अश्लीलता का मुक़दमा चला, लेकिन इस्मत अपने बयान पर डटी रहीं: “जो देखा, वही लिखा। झूठ क्यों बोलूं?”

उनके अफ़सानों में ‘चौथी का जोड़ा’,’गेंदा’‘भूल-भुलैय्या’, और ‘बिच्छू फूफी’ जैसी कहानियां थीं जो आम औरत की ज़िंदगी के ख़ास पहलुओं को बेबाक अंदाज़ में बयान करती थीं। उनके किरदार ज़िंदा थे, हंसते थे, रोते थे और सवाल करते थे।

मर्दों की दुनिया में औरत की आवाज़

इस्मत ने औरत को देवी नहीं, इंसान बनाया। उन्होंने कहा: “औरत सिर्फ़ मुहब्बत के लिए नहीं बनी, उसके अपने जज़्बात, ख्वाहिशें और हक़ होते हैं।”

उन्होंने मर्द और औरत के रिश्तों को नज़दीक से देखा, परखा और लिखा। वो नारीवाद का झंडा लिए नहीं निकलीं, मगर उनके अफ़सानों में हर औरत की अपनी आज़ादी की तहरीर छिपी हुई थी।

शाहिद लतीफ़ और बराबरी का रिश्ता

मुंबई में इस्मत की मुलाक़ात शाहिद लतीफ़ से हुई, जो बंबई टॉकीज़ में स्क्रिप्ट लिखते थे। दोनों में मोहब्बत हुई, और फिर शादी। मगर इस्मत ने पहले ही कह दिया था: ‘मैं वो लड़की नहीं जो किसी सांचे में ढल जाए, मुझे ज़ंजीरें काटनी आती हैं, पहननी नहीं।’

शाहिद ने उन्हें बराबरी का दर्जा दिया, और इस रिश्ते ने इस्मत को और मज़बूती दी। दोनों ने मिलकर कई फ़िल्मों पर काम किया जैसे  ‘ज़िद्दी’‘आरज़ू’‘सोने की चिड़िया’ जैसी फ़िल्में हिट रहीं। ‘गर्म हवा’ जैसी क्लासिक फ़िल्म उनकी ही कहानी पर आधारित थी।

‘टेढ़ी लकीर’ और उपन्यासों की दुनिया

इस्मत की कलम ने अफ़सानों से आगे बढ़कर उपन्यासों की दुनिया में भी अपनी छाप छोड़ी। ‘टेढ़ी लकीर’ उनका आत्मकथात्मक उपन्यास है जो उर्दू साहित्य में उतना ही अहम है जितना ‘गोदान’ प्रेमचंद के लिए। उनके अन्य उपन्यासों में ‘दिल की दुनिया’‘ज़िद्दी’‘मासूमा’‘जंगली कबूतर’ और ‘एक क़तरा ख़ून’ शामिल हैं।

इस्मत आपा के पति फ़िल्मों से थे इसलिए उन्होंने भी फ़िल्मों में हाथ आज़माया. ‘गरम हवा’ उन्हीं कहानी थी। इस फ़िल्म की कहानी के लिए उन्हें कैफ़ी आज़मी के साथ बेस्ट स्टोरी के फ़िल्मफेयर पुरस्कार से नवाज़ा गया। उन्होंने श्याम बेनेगल की ‘जुनून (1979)’ में एक छोटा-सा रोल भी किया था।

इस्मत की भाषा: बेबाक, खनकदार, दिलकश

इस्मत की सबसे बड़ी ताक़त उनकी ज़बान थी  न कोई लाग लपेट, न बनावटी नज़ाकत। उनका हर जुमला जैसे दिल की किसी तह से निकला हो। चूड़ियों की खनक, दुपट्टे की सरसराहट, चौक की गपशप।  सब कुछ उनकी भाषा में सांस लेता था।

क़ुर्रतुल ऐन हैदर ने उनकी मौत पर कहा था: ‘उर्दू की असली तरो-ताज़गी इस्मत के साथ चली गई।’

24 अक्टूबर 1991 को इस्मत ने इस फानी दुनिया को अलविदा कहा।  इस्मत चुग़ताई सिर्फ़ एक लेखिका नहीं थीं, वो एक तहरीक थीं। उन्होंने अपने वजूद से साबित किया कि औरत की आवाज़ दबाई जा सकती है, मिटाई नहीं जा सकती। उनका लेखन आज भी हर उस शख़्स के लिए मशाल है जो सच्चाई से डरता नहीं।

ये भी पढ़ें: मशहूर इतिहासकार प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब के साथ एक यादगार मुलाक़ात

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