उर्दू अदब की दुनिया में कई ऐसे नाम हैं, जो वक़्त के साथ धुंधले ज़रूर हो जाते हैं, लेकिन उनकी इल्मी और अदबी विरासत हमेशा ज़िंदा रहती है। ऐसा ही एक नाम है हाफ़िज़ अब्दुल रहमान ख़ान एहसान देहलवी।
एक इल्मी ख़ानदान से ताल्लुक
एहसान देहलवी का रिश्ता एक ऐसे ख़ानदान से था, जिसकी जड़ें मध्य एशिया के इलाकों बुख़ारा और हेरात से जुड़ी थीं। उनके बुज़ुर्ग सुल्तान तुग़लक़ के दौर में हिंदुस्तान आए और दिल्ली में बस गए। यह वह दौर था जब इल्म, अदब और दीन की तालीम को बहुत अहमियत दी जाती थी।
“नमाज़ अपनी अगरचे कभी क़ज़ा न हुई
अदा किसी की जो देखी तो फिर अदा न हुई”
उनके वालिद, हाफ़िज़ ग़ुलाम रसूल मोहम्मद शाह और अहमद शाह, शाही ख़ानदान के बच्चों को क़ुरआन और दीनियात की तालीम देते थे। यानी एहसान को बचपन से ही एक ऐसा माहौल मिला, जहां इल्म और तहज़ीब दोनों की परवरिश होती थी।
ज़िंदगी की शुरुआत और तालीम
एहसान देहलवी का असल नाम हाफ़िज़ अब्दुल रहमान ख़ान था। उनकी पैदाइश 1182 हिजरी में दिल्ली में हुई। बचपन से ही उन्होंने अरबी और फ़ारसी पर मज़बूत पकड़ बना ली थी। यह वही ज़बानें थीं, जिनमें उस दौर का इल्म और अदब लिखा जाता था।
उन्होंने शायरी को सिर्फ़ एक शौक़ नहीं, बल्कि एक फ़न और इल्म के तौर पर सीखा। यही वजह है कि उनकी शायरी में सिर्फ़ जज़्बात नहीं, बल्कि एक गहरी सोच और तजुर्बा भी झलकता है।
एहसान साहब को रुबाइयां कहने का ख़ास शौक़ था और उनके अंदाज़-ए-बयां में हल्की सी तंज़ और गहरी नज़ाकत झलकती थी। वे आम बात को भी इस तरह पेश करते कि उसमें नफ़ासत के साथ-साथ एक चुभता हुआ मतलब छुपा होता।
उनकी एक रुबाई में एक हकीम का ज़िक्र है, जिसकी शक्ल ही बीमारी जैसी है इल्म की बातें करता है, मगर खुद अमल में कमज़ोर। एहसान बड़े सादे लेकिन असरदार अंदाज़ में ऐसे किरदारों पर तंज़ करते हैं, जहां ज़ुबान और अमल में फर्क साफ़ नज़र आता है।
हैं एक हकीम जी ब-शक्ल-ए-ताऊन
है रक़्स तक़्सीम मुख़िल उन का क़ानून
पढ़ते हैं नफ़ीस और ख़ुद हैं वो कसीफ़
नुस्ख़े हैं अजीब और तुर्फ़ा माजून
मुग़ल दौर के गवाह
एहसान देहलवी ने मुग़ल सल्तनत के तीन अहम बादशाहों शाह आलम द्वितीय, अकबर शाह द्वितीय और बहादुर शाह ज़फ़र का दौर देखा। कहा जाता है कि शाह आलम द्वितीय भी उनके शागिर्दों में शामिल थे।
हालांकि वे दरबारी शायर थे, लेकिन उनकी शायरी में दरबारी चापलूसी नहीं मिलती। उन्होंने कभी कसीदे नहीं लिखे, बल्कि सच्चाई के साथ बादशाहों पर तंज़ भी किया। यही उनकी शख़्सियत की सबसे बड़ी खूबी थी सच कहना, चाहे सामने कोई भी हो।
शख़्सियत और इल्मी मक़ाम
एहसान देहलवी सिर्फ़ शायर ही नहीं, बल्कि एक बड़े आलिम भी थे। उनकी शख़्सियत में सादगी, नफ़ासत और अदब साफ़ झलकता था। लोग उन्हें उनके इल्म के साथ-साथ उनके अख़लाक़ के लिए भी याद करते थे।
उन्हें सफ़र का भी बेहद शौक़ था। वे अक्सर लखनऊ जाते और वहां भी इल्मी महफ़िलों का हिस्सा बनते। उनका उठना-बैठना उस दौर के बड़े-बड़े आलिमों और अदब के लोगों के साथ था।
शायरी का अंदाज़-ए-बयां
एहसान देहलवी की शायरी की सबसे बड़ी खूबी उसकी सादगी और पाकीज़गी है। उन्होंने मुश्किल अल्फ़ाज़ के बजाय आसान और साफ़ ज़ुबान में अपनी बात कही, जो सीधे दिल पर असर करती है।
उनकी शायरी में एक तरह की “बग़ावती रूह” भी नज़र आती है। वे समाज की सच्चाइयों को खुलकर बयान करते थे और रियाकारों पर तंज़ कसते थे।
“ख़फ़ा मत हो मुझ को ठिकाने बहुत हैं
मिरा सर रहे आस्ताने बहुत हैं.”
“न अदा मुझ से हुआ उस सितम-ईजाद का हक़
मेरी गर्दन पे रहा ख़ंजर-ए-बेदाद का हक़”
यहां शायर ने एक हल्के-फुल्के अंदाज़ में बहुत बड़ी बात कह दी। सिर्फ़ ज़ुबान से कह देना काफी नहीं, असल इम्तिहान मुश्किल वक़्त में होता है।
अदबी विरासत
एहसान देहलवी की तमाम रचनाएं “कुल्लियात-ए-एहसान” में शामिल हैं। उनकी शायरी आज भी उर्दू अदब के चाहने वालों के लिए एक ख़ास जगह रखती है।
उनकी शख़्सियत हमें यह सिखाती है कि इल्म के साथ ईमानदारी और सच्चाई भी उतनी ही ज़रूरी है। उन्होंने अपनी शायरी को कभी दरबार की खुशामद का ज़रिया नहीं बनाया, बल्कि उसे सच बोलने का ज़रिया बनाया।
एहसान देहलवी सिर्फ़ एक शायर नहीं थे, बल्कि एक दौर की आवाज़ थे। उनकी शायरी में मोहब्बत भी है, दर्द भी, और सच की बेबाकी भी।
आज के दौर में, जब अक्सर सच्चाई से समझौता कर लिया जाता है, एहसान देहलवी की ज़िंदगी और शायरी हमें यह याद दिलाती है कि असली कामयाबी वही है, जो सच और इमानदारी के रास्ते पर हासिल हो।
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