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भागलपुर: भारत की रेशम नगरी, जहां बुनती है परंपरा और धागों में बसी है सदियों की कहानी

भारत अपनी संस्कृति और हुनर के लिए दुनियाभर में मशहूर है। चाहे खाना हो, कपड़ा हो या हथकरघा,हर राज्य की अपनी पहचान है। ऐसे ही एक शहर का नाम है भागलपुर (बिहार), जिसे हम “Silk City of India” के नाम से जानते हैं। ये शहर न केवल भारत, बल्कि विदेशों में अपने रेशम (Silk के लिए फेमस है। आइए जानते हैं, आखिर क्यों भागलपुर रेशम का Synonym बन गया।


सदियों पुराना इतिहास

भागलपुर का रेशम उद्योग (Silk Industry) लगभग 200 साल से भी अधिक पुराना है। यहां बनने वाला टसर सिल्क (Tussar Silk) दुनिया में अनोखा माना जाता है। इसकी ख़ासियत है कि इसकी प्राकृतिक बनावट, मज़बूती और नैचुरल चमक। कहा जाता है कि महाभारत काल में भी इस क्षेत्र में रेशम का काम होता था।

भागलपुर को “सिल्क सिटी” क्यों कहा जाता है?

तीन बड़ी वजह 

  1. पारंपरिक कारीगर: यहां के बुनकर पीढ़ियों से रेशम बुनने की कला सीखते आ रहे हैं। हाथ से बनी भागलपुरी साड़ियां और कपड़े अपनी डिजाइन के लिए मशहूर हैं।
  2. यहां का वातावरण: जलवायु और कच्चे माल (रेशम के कीड़े) की उपलब्धता इसे रेशम प्रोडक्शन के लिए सबसे बेहतर बनाती है।
  3. अंतरराष्ट्रीय पहचान: भागलपुरी सिल्क की साड़ियां दिल्ली, मुंबई से लेकर लंदन और पेरिस तक पहुंच चुकी हैं।

मॉर्डन टाइम में रेशम बिज़नेस

आज ये बिजनेस सिर्फ धागे बुनने का काम नहीं करता, बल्कि हजारों परिवारों की रोज़ी-रोटी भी चलाता है।

  • लगभग 30,000 से अधिक बुनकर और मजदूर इस उद्योग से जुड़े हैं।
  • भागलपुर से रेशमी उत्पाद अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे देशों में एक्सपोर्ट होते हैं।
  • सरकारी सहायता और नई तकनीक (जैसे पावरलूम) से यह उद्योग और फल-फूल रहा है।

शिक्षा के क्षेत्र में योगदान:
सबसे दिलचस्प बात यह है कि रेशम उद्योग ने यहाँ की शिक्षा को भी नई दिशा दी है।

  • भागलपुर में सेंट्रल टसर रिसर्च इंस्टीट्यूट (Central Tasar Research Institute) और कई प्रशिक्षण केंद्र खुले हैं।
  • यहां छात्रों को टेक्सटाइल डिजाइनिंग, हथकरघा और हैंडीक्राफ्ट की पढ़ाई कराई जाती है।
  • युवाओं को फैशन और डिजाइन के क्षेत्र में करियर बनाने के अवसर मिलते हैं।

क्या कहते हैं आंकड़े?

हाल की स्टडी के अनुसार, भागलपुर का रेशम उद्योग सालाना लगभग 500 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार करता है। यहाँ का टसर सिल्क भारत के कुल टसर उत्पादन का 70% हिस्सा बनाता है। लेकिन चुनौतियाँ भी हैं – चीनी रेशम का सस्ता आयात और मशीनों का बढ़ता चलन। इसके बावजूद, भागलपुर के बुनकर आज भी हाथ से बुनी साड़ियों को संजोए हुए हैं।

भागलपुर सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध विरासत और मेहनत की कहानी है। यहाँ का रेशम केवल कपड़ा नहीं, बल्कि करीब 2 लाख लोगों की आशा और गर्व है। जब तक टसर सिल्क की चमक बनी रहेगी, तब तक भागलपुर “सिल्क सिटी” के तख्त पर जगमगाता रहेगा।

क्या आप जानते हैं?

भागलपुरी सिल्क को जीआई (GI) टैग मिल चुका है, यानी यह विशेष रूप से भागलपुर की ही पहचान है। अगली बार जब आप रेशमी साड़ी खरीदें, तो भागलपुर के इस हुनर को सलाम करना न भूलें।

ये भी पढ़ें: खर्चा-ए-पानदान: लखनऊ की नवाबी तहज़ीब में बेगमात की निजी सल्तनत

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