सैयद वारिस अली शाह (1817–1905) हिंदुस्तान के अज़ीम सूफ़ी बुज़ुर्गों में शुमार किए जाते हैं। आपकी पैदाइश उत्तर प्रदेश के देवा शरीफ़ (बाराबंकी) में एक सैयद ख़ानदान में हुयी। आप वारसी सिलसिले के बानी (संस्थापक) थे। आपकी पूरी ज़िंदगी अल्लाह की इबादत, इंसानियत की ख़िदमत, मोहब्बत और अमन का पैग़ाम फैलाने में गुज़री।
बहुत छोटी उम्र में ही आपके वालिद और वालिदा का इंतिक़ाल हो गया। इसके बाद आपकी परवरिश आपकी दादी ने की। बचपन से ही आपकी तबीयत दुनिया की चकाचौंध से दूर और रूहानियत की तरफ़ मायल थी। लोग आपके किरदार, सादगी और ख़ामोशी को देखकर हैरत में पड़ जाते थे।
हज़रत वारिस अली शाह ने कम उम्र में ही क़ुरआन-ए-पाक हिफ़्ज़ कर लिया और दीनी उलूम हासिल किए। अल्लाह तआला ने आपको ऐसी ज़ेहनियत अता फ़रमाई थी कि जो इल्म एक बार पढ़ लेते, उसे कभी नहीं भूलते थे। अरबी और फ़ारसी ज़बान पर भी आपकी अच्छी पकड़ थी।
आपने अपनी ज़िंदगी में कई बार हज की सआदत हासिल की। रिवायतों के मुताबिक़ आपने 7 से 11 बार तक हज किया। सफ़र के दौरान आप मिस्र, तुर्की, फ़िलिस्तीन और यूरोप के कई मुल्कों तक पहुंचे। आपकी मुलाक़ात उस दौर की कई मशहूर शख़्सियतों से भी हुई। लेकिन इतनी शोहरत और मक़ाम मिलने के बावजूद आपकी ज़िंदगी हमेशा सादगी और फ़क़्र से भरी रही।
हज़रत वारिस अली शाह का सबसे बड़ा पैग़ाम था मोहब्बत, इंसानियत और ख़ुलूस। आप फ़रमाते थे कि इंसान की पहचान उसके मज़हब, ज़ात या दौलत से नहीं, बल्कि उसके अच्छे अख़लाक़ और किरदार से होती है। यही वजह थी कि आपके मुरीद सिर्फ़ मुसलमान ही नहीं, बल्कि हिंदू, सिख और दूसरे मज़ाहिब के लोग भी थे। कहा जाता है कि आपने कभी किसी को अपना मज़हब बदलने के लिए मजबूर नहीं किया, बल्कि हर इंसान को अपने दीन में रहते हुए अल्लाह की मोहब्बत और इंसानियत की राह पर चलने की तालीम दी।
आपकी ख़ानक़ाह में अमीर-ग़रीब, छोटे-बड़े और हर तबक़े के लोग बराबरी के साथ बैठते थे। आपने हमेशा नफ़रत की जगह मोहब्बत, तकब्बुर की जगह तवाज़ो और दुनियावी लालच की जगह क़नाअत (संतोष) की तालीम दी।
आपके कई मशहूर ख़ुलफ़ा और मुरीद हुए। उर्दू के मशहूर शायर बेदम शाह वारसी, सूफ़ी संत अवघट शाह वारसी और कई रूहानी हस्तियां आपके फ़ैज़ से मालामाल हुईं। कुछ रिवायतों में शिरडी के साईं बाबा का नाम भी आपके मुरीदों में लिया जाता है।
7 अप्रैल 1905 को हज़रत वारिस अली शाह का विसाल हुआ। आपका रौज़ा मुबारक देवा शरीफ़, बाराबंकी में है, जहां हर साल लाखों अकीदतमंद उर्स और देवा मेले में शिरकत करते हैं। यह मेला गंगा-जमुनी तहज़ीब, भाईचारे और सूफ़ियाना रिवायत की ख़ूबसूरत मिसाल माना जाता है।
हज़रत वारिस अली शाह फ़रमाते थे:
“इश्क़, ईमान से मिलती-जुलती चीज़ है।”
“जिस तरह रोज़ी पहुंचाना अल्लाह की सिफ़त है, उसी तरह उसका ज़िक्र करना बंदे की सबसे बड़ी इबादत है।”
आज भी हज़रत वारिस अली शाह की तालीमात हमें यही पैग़ाम देती हैं कि अगर दिल में मोहब्बत, ज़ुबान पर ज़िक्र-ए-इलाही और इंसानों के लिए रहम हो, तो वही असली सूफ़ियाना ज़िंदगी है। उनकी रूहानी विरासत सदियों बाद भी लाखों दिलों को मोहब्बत, अमन और इंसानियत की राह दिखा रही है।
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