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सतगुरु नानक परगटेआ, मिटी धुंध जग चानण होआ

सिख धर्म की भाई परम्परा से ताल्लुक रखने वाले भगत मल गुरदास उर्फ़ भाई गुरदास को गुरु ग्रन्थ साहब का पहला आधिकारिक संस्करण लिखने का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने ही पाँचवें गुरु अर्जन दास के कहने पर एक विशिष्ट शैली की चालीस कविताएं भी रचीं जिन्हें श्री गुरु ग्रन्थ साहिब की कुंजी के रूप में मान्यता और लोकप्रियता हासिल है। इन कविताओं को वार कहा जाता है और भाई गुरदास की इन कविताओं को ‘वारां भाई गुरदास’ के नाम से जाना जाता है।

अनेक भाषाओं के जानकार और कुशल इतिहासकार भाई गुरदास का जन्म 1551 में हुआ था। 1606 में वे अकाल तख़्त के जत्थेदार बने और 1636 में हुई अपनी मृत्यु तक इस ज़िम्मेदारी को निभाते रहे। भाई गुरदास की एक वार में गुरु नानक देव जी के धरती पर आगमन को इन शब्दों में ढाला गया है:

सतगुरु नानक परगटेआ, मिटी धुंध जग चानण होआ
जेउ कर सूरज निकलेआ, तारे छपे अंधेर पलोआ

यानी जब सतगुरु नानक देव प्रकट हुए, संसार पर छाई हुई अज्ञान और भ्रम की धुंध मिट गई और जगत ज्ञान के प्रकाश से आलोकित हो उठा। जिस तरह सूर्य के उगते ही तारे ओझल हो जाते हैं और अंधकार पल भर में दूर हो जाता है, उसी प्रकार गुरु नानक के प्रकट होने से अज्ञान, अंधविश्वास, भेदभाव और आध्यात्मिक अंधकार का नाश हो गया तथा सत्य का प्रकाश फैल गया।

यह सत्य है कि जिस कालखण्ड में गुरु नानक भारत की भूमि पर अवतरित हुए समाज बहुत गहरे संकट से गुज़र रहा था। उनका जीवनकाल 15 अप्रैल 1469 से 22 सितम्बर 1539 तक का माना जाता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध का भारत बाहर से जितना अस्थिर था, भीतर उससे कहीं अधिक छिन्न-भिन्न था। दिल्ली की लोदी सल्तनत धीरे-धीरे अपनी शक्ति खो रही थी और उत्तर-पश्चिम से विदेशी आक्रान्ताओं का भय था।

लेकिन उस दौर में राजनैतिक अस्थिरता से भी बड़ा संकट समाज की आत्मा पर घिरा हुआ था। पंजाब के विद्वान लेखक नारायण सिंह ने 1965 में छपी अपनी महत्वपूर्ण कृति‘गुरु नानक रीइंटरप्रेटेड’में लिखा है कि उस समय धर्म अपनी जीवित चेतना खोकर बाहरी प्रतीकों, कर्मकाण्डों और जातिगत विभाजनों का पर्याय बन गया था। मनुष्य का मूल्य उसके चरित्र से नहीं, उसके जन्म से आँका जाने लगा था।

धर्म ने करुणा खो दी थी, जाति ने मनुष्य को निगल लिया था और आस्था जैसी पवित्र भावना कर्मकाण्ड में बदल दी गई थी। सत्ता का नैतिक ह्रास अपने चरम पर था। इस वातावरण को गुरु नानक ने इन शब्दों में बयान किया: “राजे सिंघ मुकदम कुते, वार मलार महला” यानी राजे शेर बन बैठे हैं और उनके अधिकारी कुत्तों जैसे हैं। एक और जगह उन्होंने लिखा: “कलि होई कुते मुही, खाज होआ मुरदार” अर्थात कैसा कलियुग आ गया है कि लोगों के मुख कुत्तों जैसे हो गए हैं और वे मरे हुए शरीरों को खाने वाले बन गए हैं।

Pic Credit: Baleyo Charaag

श्री गुरु ग्रंथ साहिब के अंग 145 में गुरु नानक ने इस समय का एक और समग्र चित्र खींचा है जिसमें किसी इतिहासकार की नहीं, एक कवि की दृष्टि है:

कलि काती, राजे कसाई, धरम पंख कर उडरेया
कूड़ अमावस, सचु चन्द्रमा, दीसै नाही कह चड़ेआ

इसका अर्थ यह हुआ कि कलियुग एक तेज़ धार वाली छुरी बन गया है और राजा कसाइयों में बदल गए हैं; धर्म ने मानो पंख उगा लिए हैं और उड़कर कहीं दूर चला गया है। झूठ की अमावस्या छाई हुई है और सत्य का चन्द्रमा कहीं दिखाई नहीं देता।

यह एक अद्भुत प्रभावशाली रूपक है और इसी में उनके अद्वितीय जीवन दर्शन की यात्रा का आरम्भ निहित है। इतिहास में कुछ मनुष्य किसी धर्म के संस्थापक नहीं होते। वे एक सभ्यता के घायल विवेक की आवाज़ बनकर आते हैं। उनके आने के बाद केवल पूजा-पद्धति नहीं बदलती, मनुष्य को देखने का ढंग बदल जाता है। ऐसे महापुरुषों की सूची में गौतम बुद्ध, ईसा मसीह और कबीर के साथ गुरु नानक का नाम हमेशा बड़े सम्मान और आदर के साथ लिया जाता रहेगा। गुरु नानक का कार्य किसी नए सम्प्रदाय की स्थापना भर नहीं था। उन्होंने उस समय भारत को एक ऐसा नैतिक आईना दिया जिसमें इंसान को जन्म से नहीं, उसके कर्म से पहचान हासिल हुई।

गुरु नानक का जन्म राय भोई दी तलवंडी के एक खत्री बेदी परिवार में हुआ। पिता मेहता कालू गाँव के पटवारी थे और माता तृप्ता धार्मिक एवं संवेदनशील स्वभाव की घरेलू महिला थीं। सिख परम्परा के अनुसार उनके जन्म के साथ अनेक अलौकिक कथाएँ जुड़ी हैं। कहा जाता है कि मुस्लिम दाई दौलतन उनके जन्म के समय ही उनके असाधारण व्यक्तित्व से चकित रह गई थी और ज्योतिषियों ने उनके भविष्य में महानता का संकेत दिया था।

Pic Credit: Social Media

बचपन से ही नानक साधारण बच्चों से भिन्न थे। पाँच वर्ष की आयु में उन्होंने गाँव की पाठशाला में शिक्षा आरम्भ की, जहाँ वे अपने गुरु गोपाल की अपेक्षा कहीं अधिक जिज्ञासु और तीक्ष्ण बुद्धि सिद्ध हुए। बाद में उन्होंने गुरुबृजनाथ की देखरेख में वेदों और हिन्दू दर्शन का अध्ययन किया। साथ ही एक मुस्लिम मौलवी सैयद हसन से फ़ारसी और अरबी सीखी।

उनकी बड़ी बहन नानकी और स्थानीय मुस्लिम ज़मींदार राय बुलार सबसे पहले उनके आध्यात्मिक गुणों को पहचानने वालों में थे। पिता चाहते थे पुत्र व्यापार करे और हिसाब-किताब संभाले, नानक का मन साधुओं, सूफ़ियों और आध्यात्मिक चिन्तन में रमता था। नौ वर्ष की आयु में जब उनका जनेऊ संस्कार किया जाना था, उन्होंने यह पूछते हुए उसे पहनने से मना कर दिया, “यदि यह धागा मुझे धार्मिक बना देगा, तो जिनके पास यह धागा नहीं है, क्या वे ईश्वर से दूर रहेंगे?”श्री गुरु ग्रंथ साहिब के अंग 471उनकायह कथन आज भी भारतीय धार्मिक चिन्तन की सबसे ऊँची व्याख्याओं में गिना जाता है:

दया कपाह, संतोख सूत, जतु गांठी, सत वट
एहु जनेऊ जीअ का, हई त पांडे घट

यानी यदि दया कपास हो, संतोष उसका सूत हो, संयम उसकी गाँठ हो और सत्य उसका मोड़ हो, तो ऐसा जनेऊ मेरे गले में डालो। वही आत्मा का वास्तविक जनेऊ है। नारायण सिंह इस प्रसंग की व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि गुरु नानक किसी धार्मिक प्रतीक के विरोधी नहीं थे। उनका विरोध उस स्थिति से था जहाँ प्रतीक अपने नैतिक अर्थ से खाली होकर केवल सामाजिक विशेषाधिकार का चिह्न बन जाता है।

गुरु नानक के पूरे धर्म-दर्शन का मूल सूत्र ‘इक ओंकार’ है। यह केवल ईश्वर की एकता की घोषणा नहीं,मनुष्य की समानता का दार्शनिक आधार भी है। यदि ईश्वर एक है, तो उसकी सृष्टि भी एक है। यदि सृष्टि एक है, तो जाति कैसे हो सकती है?यदि प्रकाश एक है, तो ऊँच-नीच किस आधार पर हो?

Pic Credit: Chardikala Foundation

बाद में गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित कबीर की प्रसिद्ध वाणी इसी सत्य को अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है कि सबसे पहले परमात्मा ने अपनी ज्योति प्रकट की और उसी से समस्त प्राणी उत्पन्न हुए। जब सब एक ही प्रकाश से बने हैं, तो कौन ऊँचा है और कौन नीचा:

अव्वल अल्लाह नूर उपाइआ, कुदरत के सब बंदे
एक नूर ते सब जग उपजिआ, कउन भले को मंदे

इसी विचार से गुरु नानक का सम्पूर्ण सामाजिक दर्शन जन्म लेता है। ‘गुरु नानक रीइंटरप्रेटेड’में नारायण सिंह लिखते हैं कि गुरु नानक को स्वाभाविक आत्मीयता उन्हीं लोगों से थी जो अपने हाथों से काम करते थे जैसे किसान, बढ़ई, मजदूर औरकारीगर वगैरह. वे इन्हें समाज का आधार मानते थे। नानक गरीबों पर दया नहीं करते बल्कि वे उनके साथ बैठते हैं।

अपनी यात्राओं के सिलसिले में गुरु नानक एक दफा सैदपुर में थे, जो वर्तमान में पाकिस्तान के अमीनाबाद का हिस्सा है। नानक जी वहां भाई लालो नाम के एक निर्धन बढ़ई के घर कयाम किए हुए थे। उसी नगर नगर में एक भ्रष्ट अधिकारी था मलिक भागो। अपनी शान-शौकत दिखाने की नीयत से मलिक भागो ने एक बड़े भोज का आयोजन कर रखा था। जब उसे पता चला कि नगर में आए प्रसिद्ध संत उसके यहाँ न ठहरकर एक बढ़ई के घर रह रहे हैं, तो उसे आश्चर्य और अपमान दोनों महसूस हुए।

उसने उनके पास दूत भेजा। गुरुजी ने मना कर दिया। दूसरे दूत को भी इसी तरह विनम्रता के साथ मना कर दिया गया। आखिरकार मलिक भागो खुद पहुँचा तो उन्हें जाना पड़ा। नानक जी अपने साथ भाई लालो की सूखी रोटी भी ले गए।

वहां पहुंचकर गुरु नानक ने एक हाथ में भाई लालो की रोटी ली और दूसरे में मलिक भागो के पकवान। दोनों को दबाया। लोककथा कहती है कि लालो की रोटी से दूध निकला और भागो के भोजन से रक्त.. इस कथा में चमत्कार से ज़्यादाउस रूपक का महत्त्व है जिसमें उनके दर्शन का सत्व निहित है कि रोटी केवल गेहूँ से नहीं बनती, उसमें कमाई और श्रम भी पकता है।

श्री गुरु ग्रंथ साहिबके आसा राग, अंग 15 में और गुरु नानक देव की जाति-विरोधी तथा समतामूलक दृष्टि का सबसे प्रखर उद्घोष मिलता है। वे केवल समानता का उपदेश नहीं देते, खुद को समाज के सबसे वंचित लोगों के साथ खड़ा घोषित करते हैं। कहते हैं कि जो समाज में सबसे नीची मानी जाने वाली जातियों से भी अधिक उपेक्षित और तिरस्कृत हैं, मैं उन्हीं के साथ रहना चाहता हूँ। बड़े और प्रतिष्ठित लोगों से प्रतिस्पर्धा या ईर्ष्या करने का क्या अर्थ:

नीचा अंदरि नीच जाति, नीची हू अति नीचु
नानक तिन कै संगि साथि, वडिआ सिउ किआ रीस

भारतीय धार्मिक परम्परा में ऐसा पहली बार हो रहा था कि किसी संत ने श्रम को आध्यात्मिक प्रतिष्ठा दी। श्री गुरु ग्रंथ साहिब केअंग 1245 में उन्होंने बताया कि जो अपने श्रम से कमाता है और उसमें से दूसरों को भी देता है, वही जीवन का सच्चा मार्ग पहचानता है:

घालि खाइ किछु हथहु देइ
नानक राहु पछाणहि सेइ

Pic Credit: Sikhnet

गुरु नानक इस बात को भली तरह समझ गए थे कि देश के सामने जातिगत भेदभाव के अलावा लोगों के बीच परस्पर धार्मिक विद्वेष भी बहुत बड़ी समस्या है। 1499 से 1527 ईस्वी के बीच, गुरु नानक देव जी ने पाँच असाधारण यात्राएँ कीं, जिन्हें उदासियाँ कहा जाता है. इन यात्राओं के दौरान उन्होंने दक्षिण एशिया, मध्य एशिया तथा मध्य पूर्व में लगभग 28,000 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय की। वे पैदल चले, लोगों से संवाद किया और परिवर्तन का संदेश दिया। इस दौरान वे विद्वानों, संतों, शासकों और सामान्य जनों से समान रूप से बातचीत किया करते थे।

1962 में गुरु नानक अकादमी, पाकिस्तान से प्रकाशित हुई एक महत्वपूर्ण उर्दू पुस्तक है‘हमारा नानक’। अब्दुल्लाह ग़ियानी की लिखी इस किताब में गुरु नानक को केवल सिख धर्म के संस्थापक के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की साझा आध्यात्मिक विरासत के रूप में देखा गया है। ग़ियानी लिखते हैं कि गुरु नानक किसी एक समुदाय के नहीं थे। वे हिन्दू और मुसलमान दोनों समाजों के बीच संवाद का पुल थे। उन्होंने इस्लाम और हिन्दू धर्म दोनों की नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षाओं का सम्मान किया, लेकिन कर्मकाण्ड, पाखंड, जाति-अहंकार और धार्मिक कट्टरता का विरोध किया।

अब्दुल्लाह ग़ियानी के अनुसार नानक का मूल संदेश था कि ईश्वर एक है और मनुष्य भी मूलतः एक ही परिवार के सदस्य हैं। इसलिए जाति, धर्म, नस्ल या सम्प्रदाय के आधार पर श्रेष्ठता का दावा करना ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध है। उन्होंने हिन्दू और मुसलमान दोनों को आत्म-परीक्षण के लिए भी प्रेरित किया।

सुल्तानपुर लोधी गुरु नानक के जीवन का वह स्थल है जहाँ उनके आध्यात्मिक व्यक्तित्व ने निर्णायक रूप से आकार लिया। यदि ननकाना साहिब उनका जन्मस्थान है, तो सुल्तानपुर लोधी को उनकी आत्मिक जागृति और सार्वजनिक मिशन का प्रारम्भ-बिंदु कहा जा सकता है। लगभग 1485–1487 ई.के आसपास गुरु नानक की बड़ी बहन बीबी नानकी और उनके पतिजयराम के आग्रह पर वे सुल्तानपुर लोधी आए। जयराम उस समय लोधी शासन के स्थानीय प्रशासक दौलत ख़ाँ लोधी के अधीन कार्यरत थे। उनकी सहायता से नानक को दौलत ख़ाँ के अनाज-भंडार में नौकरी मिली। सुल्तानपुर में ही उनकी मित्रता भाई मरदाना के साथ और गहरी हुई। मरदाना रबाब बजाते थे और बाद में उनकी उदासियों के स्थायी साथी बने।

यहाँ गुरु नानक ने लगभग चौदह-पंद्रह वर्ष बिताए। इसी दौरान उनका विवाह माता सुलखनी से हुआ और उनके दोनों पुत्र, श्रीचंदतथालखमीदास, जन्मे। बाहर से वे एक सरकारी कर्मचारी और गृहस्थ थे, लेकिन भीतर उनका मन आध्यात्मिक चिन्तन में डूबता जा रहा था। लोकगाथा के अनुसार एक दिन नानक प्रातः स्नान के लिए स्थानीय काली बेईंनदी गए। उसके अगले तीन दिन तक वे किसी को भी दिखाई नहीं दिए।

लौटे तो उनके भीतर एक गहरा आध्यात्मिक परिवर्तन घट चुका था। इसी अनुभव के बाद उन्होंने घोषणा की: “न को हिन्दू, न मुसलमान।” सिख परम्परा इसे ईश्वरीय अनुभूति या प्रकाशका क्षण मानती है। यहीं से गुरु नानक का सार्वजनिक मिशन आरम्भ होता है। उनके धर्म-दर्शन का आशय न हिन्दू धर्म का निषेध था न इस्लाम का। वे दोनों समुदायों से एक ही सवाल पूछ रहे थे: “क्या तुम सचमुच अपने धर्म के अनुसार जीते भी हो? अगर नहींतो केवल हिन्दू या मुसलमान कहलाने से क्या होगा?”

श्री गुरु ग्रंथ साहिब केअंग 140 में वे मुसलमानों से इस तरह मुखातिब हैं:

मिहर मसीत, सिदक मुसल्ला, हक हलाल कुरान
सरम सुन्नति, सील रोज़ा, होहु मुसलमान

यानी दया तुम्हारी मस्जिद हो, श्रद्धा तुम्हारी नमाज़। ईमानदार कमाई तुम्हारा कुरान, लज्जा तुम्हारी सुन्नतऔर सदाचार तुम्हारा रोज़ा हो तब तुम सच्चे मुसलमान हो। एक प्रसंग हरिद्वार का है। लोग सूर्य की ओर जल अर्पित कर रहे थे। उन्होंने उल्टी दिशा में पानी फेंकना शुरू कर दिया। लोग हँस कर पूछने लगे,”क्या कर रहे हो?”उन्होंने कहा, “मैं पंजाब के अपने खेतों को पानी दे रहा हूँ।” सब हँसे और कहने लगे, “इतनी दूर पानी कैसे जाएगा?” नानक मुस्कुराए और बोले,”यदि तुम्हारा जल करोड़ों मील दूर सूर्य तक पहुँच सकता है, तो मेरा पानी पंजाब क्यों नहीं पहुँच सकता?”

Pic Credit: Social Media

गुरु नानक धर्म और जाति के ताने-बाने में उलझे आदमी को नैतिकता और सच्चाई के रास्ते ले जाना चाहते थे। उन्होंने यह भी पाया कि मध्यकालीन भारत में स्त्री के प्रति आम दृष्टिकोण विरोधाभासों से भरा था। देवी की पूजा होती थी, लेकिन उसे बराबरी हासिल नहीं थी। उसे गृहस्थी की धुरी माना जाता था, लेकिन घर के ज़रूरी फैसलों में उसकी आवाज़ कोई नहीं सुनता था।

कितनी ही धार्मिक परम्पराओं में उसे मोह, माया और पाप का कारण तक कहा गया। इस धारणा को गुरु नानक नेचुनौती देते हुए कहा किऔरत से ही जन्म होता है, औरत से ही पालन-पोषण होता है, औरत से ही विवाह होता है। औरत से ही मित्रता है, औरत से ही जीवन का मार्ग चलता है। औरत के बिना सम्बन्ध नहीं। फिर उस बुरा कैसे कहा जा सकता है, जिसकी कोख से राजा तक जन्म लेते हैं:

भंडि जम्मीऐ, भंडि निम्मीऐ, भंडि मंगणु वीआहु
भंडहु होवै दोस्ती, भंडहु चलै राहु
भंडु मुआ, भंडु भालीऐ, भंडि होवै बंधानु
सो किउ मंदा आखीऐ, जितु जम्महि राजान

यह उस पूरे मानसिक ढाँचे का खण्डन था जिसने औरत को मनुष्य से कम मान लिया था। इस लिहाज से भी गुरु नानक अपने समय से बहुत आगे की सोच रखते थे। उनकी विरासत उनके जाने के बाद और भी समृद्ध होती चली गई। गुरु अर्जन देव ने उनके मूलभूत दर्शन को शब्दों का जामा पहनाते हुए कहा, “एक पिता, एकस के हम बारिक.” यानी हम सब हम सब एक ही परमपिता की संतान हैं।

गुरु नानक ने जो विचार बोया था वह उनके साथ समाप्त नहीं हुआ। गुरु अंगद ने उसे भाषा दी, गुरु अमरदास ने उसे सामाजिक संगठन दिया, गुरु रामदास और गुरु अर्जन ने उसे संस्थागत रूप दिया और गुरु तेगबहादुर ने उसके लिए अपना शीश दे दिया। गुरु गोबिन्द सिंह ने नानक-वाणी को ऐसी सामूहिक शक्ति में बदल दिया जिसने जन्म पर आधारित असमानता को सीधी चुनौती दी।

यह अकस्मात् नहीं हुआ था कि 1699 की वैशाखी के दिन खालसा पंथ की नींव रखते हुए गुरु गोबिन्द सिंह ने जिन पंज प्यारों को एक ही अमृत पात्र से दीक्षा दी थी वे समाज के उस कामगार तबके का प्रतिनिधित्व करते थे जिसके अधिकार के लिए गुरु नानक ने पहली बड़ी लड़ाई लड़ी थी। इन पंज प्यारों में भाई दया सिंहखत्रीदुकानदार थे,भाई धर्म सिंहजाट किसान थे,भाई हिम्मत सिंहझीवर पानी ढोने का कम करते थे,भाई मोहकम सिंहछिम्बा दर्जी थे जबकि भाई साहिब सिंहनाई थे।

वास्तव में गुरु गोबिन्द सिंह ने एक कदम आगे जाकर वही काम किया जो गुरु नानक ने भाई लालो के घर बैठकर शुरू किया था। बाद में उन्होंने लिखा भी कि “मानस की जात सभैएकै पहचानबो।” और मनुष्य की जाति में भी उन्हें सबसे प्रिय वे लोग हैं जो दीन-हीन और संसाधनों से वंचित हैं. इसी क्रम में वीरता के लिए जानी जाने वाली सिख कौम के लिए वे एक ज़रूरी दिशानिर्देश भी देते चलते हैं:

सूरा सो पहचानिए जो लरै दीन के हेत
पुरजा पुरजा कट मरै, कबहू न छाडै खेत

भारत के बाकी हिस्सों की तुलना में देखें तो पंजाब में मोटे तौर पर जातिगत असमानताएं बहुत कम पाई जाती हैं। श्रम को बहुत सम्मान के साथ देखा जाता है और वहां की स्त्रियों की सामाजिक स्थिति कमोबेश कहीं बेहतर है। इसका स्पष्ट नतीजा इस इलाके की आर्थिक और सामाजिक समृद्धि में झलकता है।

साल 2013 में छपी अपनी किताब ‘सिखिज्म: अ गाइड फॉर द परप्लेक्स्ड’ में अरविंद-पाल सिंह मंडैर कहते हैं कि गुरु नानक का उद्देश्य केवल एक नए धार्मिक पंथ की स्थापना करना नहीं था, बल्कि मनुष्य को स्वयं से, समाज से और समस्त सृष्टि से उसके टूटे हुए संबंधों को पुनर्स्थापित करने का मार्ग दिखाना था। गुरु नानक को याद करना समाज की बुनियाद में लगे एक ऐसे पत्थर के सामने श्रद्धा से झुकना है जिसकी स्पष्ट निगाह जानती थी कब किसके साथ खड़ा होना है किसके साथ नहीं।

इस लेख को पंजाबी में पढ़ें

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Ashok Pande
Ashok Pandehttp://kabaadkhaana.blogspot.com
अशोक पांडे चर्चित कवि, चित्रकार और अनुवादक हैं। उनका प्रकाशित उपन्यास ‘लपूझन्ना’ काफ़ी सुर्ख़ियों में रहा है। पहला कविता संग्रह ‘देखता हूं सपने’ 1992 में प्रकाशित। जितनी मिट्टी उतना सोना, तारीख़ में औरत, बब्बन कार्बोनेट अन्य बहुचर्चित किताबें। कबाड़खाना नाम से ब्लॉग kabaadkhaana.blogspot.com। अभी हल्द्वानी, उत्तराखंड में निवास।

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