हिमालय की दुर्गम चोटियों में छिपा एक पवित्र हेमकुंड साहिब सिखों के लिए न केवल एक तीर्थ है, बल्कि गुरु गोबिंद सिंह जी की दिव्य तपस्या का प्रतीक भी है। समुद्र तल से लगभग 15,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह स्थान हिमनद से उपजी एक झील के किनारे बसा है, जिसके चारों ओर सात बर्फीली चोटियां खड़ी हैं।
गुरु जी ने अपने दशम ग्रन्थ के ‘बचित्तर नाटक’ अर्थात विचित्र नाटिका के छठे अध्याय में अपने पिछले जन्म की तपस्या का वर्णन यहां किया है। सदियों तक यह स्थान सिख समुदाय की पहुंच से दूर रहा। इसकी खोज 19वीं-20वीं शताब्दी में हुई, जो आस्था की जिज्ञासा, विद्वानों की मेहनत और साधकों के साहस का अद्भुत मिश्रण है।
गुरु गोबिंद सिंह जी ने लिखा –
हेमकुंड परबत है जहां,सपतसृंग सोभित है तहां॥
सपतसृंग तिह नाम कहावा, पांडराज जह जोग कमावा॥
तह हम अधिक तपसया साधी, महाकाल कालका अराधी॥
इह बिध करत तपसिआ भयो, द्वै ते एक रूप ह्वै गयो॥
यानी हेमकुंट नाम का पर्वत उस जगह पर है, जिसके शिखर सप्तशृंग के रूप में सुशोभित हैं, और जहाँ पाण्डु-नरेश ने पूर्वकाल में योग-साधना की थी, वहाँ मैंने अत्यंत कठोर तपस्या की। महाकाल और कालिका की आराधना में लीन होकर, तप के तेज से मैं द्वैतभाव से मुक्त हो गया और मैंने अद्वैत ब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया।

1843 में छपी कवि संतोख सिंह की पुस्तक ‘सूरज प्रकाश’ में भी इस तप आस्थान का विस्तार से उल्लेख है। 18वीं-19वीं शताब्दी में स्थानीय गढ़वाली लोग इसे लोकपाल यानी दुनिया का रक्षक कहकर पूजते थे, लेकिन सिख परंपरा में इसका सटीक भौगोलिक स्थान अज्ञात था।
19वीं शताब्दी के अंत में इस स्थान की खोज की नींव पड़ी। विद्वान पंडित तारा सिंह नरोत्तम ने सबसे पहले दशम ग्रंथ, महाभारत, पांडु राजा की तपस्या और स्थानीय संकेतों के आधार पर स्थान का अनुमान लगाया। उन्होंने विभिन्न तीर्थों का सर्वेक्षण किया और सप्तशृंग, झील तथा ऊंचाई के विवरण को नोट किया। उनका कार्य प्रारंभिक था, लेकिन उसका आधार बहुत मजबूत था।
इस सिलसिले में एक दिलचस्प वाकया सुनने में आता है। बताते हैं कि अपनी यात्राओं के दौरान पंडित तारा सिंह नरोत्तम की बद्रीनाथ से आगे एक गाँव माणा पहुंचे जहाँ रहने वाले लोग स्वयं को रोंग्पा कहते हैं। माणा में महिलाओं का एक समूह जन्माष्टमी के मौके पर लोकपाल की यात्रा पर जा रहा था। वे वहां स्नान के उद्देश्य से जा रही थीं पंडित तारा सिंह नरोत्तम के अधिक पूछने पर उन्होंने बताया कि लोकपाल का महात्म्य उनके लिए बद्रीनाथ से भी ज़्यादा है।
नरोत्तम जी ने महिलाओं के साथ चलने की अनुमति ले ली और लोकपाल झील के निकट उन्होंने जो दृश्य देखा वह विचित्र नाटिका में बताये गए स्थान जैसा ही था।
इतिहास के पन्ने देखें तो प्रतीत होता है कि नरोत्तम की इस खोज पर सिख समुदाय का अधिक ध्यान नहीं गया। बीसवीं शताब्दी तक हेमकुंड (हेमकुंट) साहिब को फिर से खोजा गया—एक साथ और अलग-अलग (जितना विरोधाभासी लगे) दो पूर्व सैनिकों द्वारा। एक थे सोहन सिंह, जो सेवानिवृत्त ग्रंथी थे, तथा दूसरे थे मोदान सिंह, जो बंगाल सैपर्स से सेवानिवृत्त हवलदार थे।
20वीं शताब्दी की शुरुआत में प्रसिद्ध सिख विद्वान, कवि और इतिहासकार भाई वीर सिंह (1872-1957) ने इस खोज को नई दिशा दी. सिंह सभा आंदोलन के प्रमुख स्तंभ भाई वीर सिंह ने पंडित तारा सिंह के निष्कर्षों को 1929 में प्रकाशित हुई अपनी पुस्तक ‘श्री कलगीधर चमत्कार’ में संकलित किया। ध्यान रहे गुरु गोबिंद सिंह जी को कलगीधर के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि वे अपनी पगड़ी में एक कलगी भी लगाया करते थे। इस किताब में भाई वीर सिंह ने ‘विचित्र नाटिका’ के श्लोकों, सूरज प्रकाश और वैज्ञानिक-भौगोलिक विवरणों जैसे हिमालयी वनस्पति और जीव-जंतुओं इत्यादि को एक साथ जोड़ा। यह पुस्तक सिखों में हेमकुंड की खोज की प्रेरणा बन गई। भाई वीर सिंह ने न केवल इस खोज के लिए एक साहित्यिक आधार तैयार किया, बल्कि बड़ा आर्थिक सहयोग भी दिया।
1930 के दशक में खोज अपने चरम पर पहुंची. टिहरी गढ़वाल के एक गुरुद्वारे में स्वैच्छिक सेवा कर रहे सेवानिवृत्त आर्मी ग्रंथी संत सोहन सिंह भाई वीर सिंह की पुस्तक पढ़कर प्रेरित हुए। 1933 में उन्होंने पहला प्रयास किया, लेकिन असफल रहे. 1934 में लोकपाल पूजक स्थानीय लोगों की मदद से वे उस स्थान तक पहुंचे। विवरण पूर्णतः मेल खाता था: झील, सात चोटियां, पांडुकेश्वर की निकटता और उस स्थान की दिव्य अनुभूति. संत सोहन सिंह को वहां एक आध्यात्मिक दर्शन हुआ, जिसने उन्हें विश्वास दिलाया कि यही गुरु जी का तप आस्थान है।
प्रारंभ में संदेह हुआ. कई लोग इसे मात्र कल्पना मानते थे। संत सोहन सिंह अमृतसर पहुंचे और भाई वीर सिंह से मिले। दोनों ने स्थान का दौरा किया और पुष्टि की। भाई वीर सिंह ने 2,100 रुपये देकर छोटे गुरुद्वारे के निर्माण का कार्य सौंपा।
इस कार्य में हवलदार मोदन सिंह और स्थानीय व्यापारी हयात सिंह भंडारी के सहयोग से 1935-36 में 10×10 फीट का पहला मंदिर बनाया गया। यहां हस्तलिखित गुरु ग्रंथ साहिब स्थापित किया गया। इस कार्य में स्थानीय भ्यूंडार घाटी के पुलना गाँव के रहने वाले नन्दा सिंह चौहान का भी बड़ा योगदान रहा।
1939 में सोहन सिंह के असमय देहावसान के बाद हेमकुंड साहिब को विश्व मानचित्र पर स्थापित करने का पूरा जिम्मा मोदन सिंह पर आ गया। बंगाल सैपर्स से सेवानिवृत्त हुए इस जांबाज़ हवलदार को आज भी समूचे इलाके में बाबा मोदन सिंह के नाम से जाना जाता है।
1960 के दशक में भारतीय सेना के मेजर जनरल हरकीरत सिंह के प्रयासों से वर्तमान गुरुद्वारे का निर्माण शुरू हुआ। आर्किटेक्ट मनमोहन सिंह सियाली ने सालाना यात्राएं कर निरीक्षण किया। कठिन परिस्थितियों में भी इंजीनियरिंग का चमत्कार हुआ. इस महत्वपूर्ण गुरुद्वारे की संरचना आज तक मौसम, भूकंप और समय की हर कसौटी पर खरी उतरी है।
हेमकुंड साहिब गोविंदघाट से पहले घांघरिया और उसके बाद 6 किमी चढ़ाई के बाद पहुंचा जा सकता है। जून से अक्टूबर तक यात्रा खुली रहती है. हजारों श्रद्धालु हर साल आते हैं। यह सिख-हिंदू संवाद का प्रतीक भी है, क्योंकि लोकपाल हिंदू परंपरा में भी पवित्र है. नज़दीक ही अवस्थित फूलों की घाटी इस दिव्य क्षेत्र की सुन्दरता को और भी अलौकिक बनाती है।
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अशोक पांडे चर्चित कवि, चित्रकार और अनुवादक हैं। पिछले साल प्रकाशित उनका उपन्यास ‘लपूझन्ना’ काफ़ी सुर्ख़ियों में है। पहला कविता संग्रह ‘देखता हूं सपने’ 1992 में प्रकाशित। जितनी मिट्टी उतना सोना, तारीख़ में औरत, बब्बन कार्बोनेट अन्य बहुचर्चित किताबें। कबाड़खाना नाम से ब्लॉग kabaadkhaana.blogspot.com। अभी हल्द्वानी, उत्तराखंड में निवास।


