अल-मुहासिबी (781–857 ई.) इस्लामी दुनिया के महान सूफ़ी, आलिम और फ़िलॉसफ़र माने जाते हैं। उनका पूरा नाम अबू अब्दुल्लाह हारिस बिन असद अल-मुहासिबी था। “मुहासिबी” का मतलब है अपने नफ़्स (आत्मा) का हिसाब लेने वाला। यही वजह है कि उनकी पूरी ज़िंदगी इंसान को अपने दिल और अमल का जायज़ा लेने की तालीम देती है।
उनकी पैदाइश बसरा (इराक़) में हुयी, लेकिन बचपन में ही उनका परिवार बग़दाद चला गया। उनके वालिद के पास अच्छी-ख़ासी दौलत थी, मगर अक़ीदे के इख़्तिलाफ़ की वजह से अल-मुहासिबी ने उस माल को क़ुबूल नहीं किया। उन्होंने सादा और रूहानी ज़िंदगी को अपनी राह बनाया।
ज़ाहिरी इबादत नहीं, दिल की इस्लाह ज़रूरी
अल-मुहासिबी का मानना था कि सिर्फ़ ज़ाहिरी इबादत या सूफ़ियाना लिबास इंसान को अल्लाह के क़रीब नहीं ले जाता। अगर इबादत के पीछे रिया (दिखावा), तकब्बुर (घमंड) या शोहरत की चाह हो, तो उसका असल मक़सद ख़त्म हो जाता है।
वे कहते थे कि इंसान को हर वक़्त अपने दिल का मुहासबा करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उसके हर अमल के पीछे नीयत क्या है। उनके नज़दीक असली तसव्वुफ़ दिल की सफ़ाई और अख़लाक़ की इस्लाह का नाम है।
अल-मुहासिबी ने “मुहासबा” यानी आत्म-परीक्षण की तालीम दी। उनका कहना था कि इंसान रोज़ अपने आप से सवाल करे।
- मैंने आज क्या अच्छा किया?
- कहा ग़लती हुई?
- मेरी नीयत कितनी ख़ालिस थी?
- क्या मैं अल्लाह की रज़ा के लिए जी रहा हूं?
उनके मुताबिक़, यही आदत इंसान को क़यामत के दिन के हिसाब के लिए तैयार करती है।
दुनिया से मोहब्बत नहीं, अल्लाह से रिश्ता
उन्होंने दुनियावी लालच और बेहिसाब ख़्वाहिशों से बचने की नसीहत दी। मगर वे यह भी कहते थे कि दुनिया छोड़ देना ही तसव्वुफ़ नहीं, बल्कि दुनिया में रहते हुए अल्लाह की याद और इंसानों के हक़ अदा करना असली रूहानियत है।
उनकी मशहूर किताब “अर-रिआया लि-हुकूक़िल्लाह” में यही पैग़ाम मिलता है कि इबादत के साथ-साथ इंसान को अपने फ़र्ज़ और दूसरों के हक़ भी अदा करने चाहिए।
इल्म और अक़्ल की अहमियत
जहां कई सूफ़ी सिर्फ़ जज़्बात और कैफ़ियत पर ज़ोर देते थे, वहीं अल-मुहासिबी ने अक़्ल और ग़ौर-ओ-फ़िक्र को भी बहुत अहम माना। उनका कहना था कि सही रूहानी सफ़र वही है जिसमें दिल भी जागता हो और अक़्ल भी।
जुनैद बग़दादी के उस्ताद
अल-मुहासिबी के सबसे मशहूर शागिर्द हज़रत जुनैद बग़दादी थे, जिन्हें बाद में तसव्वुफ़ का बड़ा इमाम माना गया। अल-मुहासिबी की तालीमात ने आगे चलकर इमाम ग़ज़ाली जैसे बड़े इस्लामी मुफक्किरों को भी गहराई से मुत्तासिर किया।
अपने ज़माने में उन्होंने कुछ अहम इल्मी बहसों में हिस्सा लिया। इसी वजह से उन्हें विरोध और मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा। आख़िरकार उन्हें सार्वजनिक तौर पर पढ़ाना छोड़ना पड़ा। सन 857 ई. में बग़दाद में उनका इंतिक़ाल हुआ। कहा जाता है कि उस वक़्त उनके जनाज़े में बहुत कम लोग शामिल हुए, लेकिन उनकी तालीमात सदियों तक ज़िंदा रहीं।
अल-मुहासिबी के मशहूर अक़वाल
“एक दरवेश की अपने महबूब की जुदाई में निकली हुई सर्द आह, सौ बरस की इबादत से अफ़ज़ल है।”
“दुनियावी बातों में ज़्यादा उलझना, रूहानी मंज़िल तक पहुंचने में रुकावट बन जाता है।”
अल-मुहासिबी ने यह सिखाया कि इंसान की सबसे बड़ी जंग बाहर की दुनिया से नहीं, बल्कि अपने नफ़्स से है। उनकी तालीम आज भी यही पैग़ाम देती है कि इबादत की असली रूह, नीयत की पाकीज़गी, आत्म-मंथन और अल्लाह से सच्चा रिश्ता है। यही वजह है कि उन्हें तसव्वुफ़ की तारीख़ के सबसे असरअंदाज़ बुज़ुर्गों में शुमार किया जाता है।
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