सिख इतिहास में मालवा इलाक़े का एक ख़ास और गौरवशाली मुकाम है। यही वो पावन धरती है, जहां दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपनी ज़िंदगी के कई अहम पड़ाव गुज़ारे और इस इलाक़े के लोगों को सिखी का रास्ता दिखाया। फ़िरोज़पुर ज़िले में मौजूद गुरुद्वारा श्री गुरुसर जामनी साहिब, बाज़ीदपुर ऐसा ही एक पवित्र और तारीखी गुरुद्वारा है, जिसे गुरु गोबिंद सिंह जी के चरणों का स्पर्श मिला। सदियों से ये गुरुद्वारा संगत की अकीदत, श्रद्धा और यक़ीन का बड़ा मरकज़ बना हुआ है।
इस पावन गुरुद्वारे का इतिहास श्री मुक्तसर साहिब (खिदराने की ढाब) की मशहूर जंग से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि मुक्तसर की ऐतिहासिक जंग में फ़तह हासिल करने के बाद, गुरु गोबिंद सिंह जी मालवा की तरफ़ रवाना हुए। इस दौरान वो लोगों को नाम-बाणी का संदेश देते हुए और सिखी का प्रचार करते हुए फ़िरोज़पुर के क़रीब बसे गांव बाज़ीदपुर पहुंचे। गुरु साहिब के पहुंचते ही ये शांत इलाक़ा रौनक़ से भर गया। दूर-दूर से बड़ी तादाद में संगत गुरु जी के दर्शन करने, उनका आशीर्वाद लेने और उनकी हज़ूरी में हाज़िरी लगाने के लिए आने लगी।

कर्मों का हिसाब और कर्ज़ से मुक्ति की अनोखी कहानी
इस गुरुद्वारा साहिब के नाम और इतिहास से एक बेहद दिलचस्प और रूहानी कहानी जुड़ी हुई है। सिख रिवायतों के मुताबिक, ये घटना कर्मों के हिसाब और कर्ज़ से मुक्ति से जुड़ी मानी जाती है। कहा जाता है कि पुराने ज़माने में एक जाट किसान ने एक ब्राह्मण से कुछ रुपये उधार लिए थे। लेकिन वो किसान कर्ज़ लौटाने से पहले ही इस दुनिया से चला गया। मान्यता के अनुसार, कर्मों के नियम की वजह से अगले जन्म में वो किसान तितर के तौर पर पैदा हुआ, जबकि वो ब्राह्मण अपना कर्ज़ वसूलने के लिए बाज़ के तौर पर जन्मा।
जब अंतर्यामी श्री गुरु गोबिंद सिंह जी इस जगह पर विराजमान थे, तो उन्होंने अपनी रूहानी नज़र से दोनों जीवों के पिछले जन्म का रिश्ता और अधूरा कर्ज़ देख लिया। गुरु साहिब ने दोनों को जन्म-मरण के चक्कर और कर्ज़ के बंधन से आज़ाद करने का फ़ैसला किया।

मान्यता है कि गुरु साहिब ने बाज़ से तितर का शिकार करवाया। इसी के साथ पिछले जन्म का कर्ज़ पूरा हो गया और दोनों आत्माओं को मुक्ति मिल गई। कहा जाता है कि गुरु साहिब ने इस तरह कर्मों का हिसाब पूरा कर दोनों जीवों को हमेशा के लिए बंधनों से आज़ाद कर दिया। इसी अलौकिक वाकये की याद में इस पावन जगह का नाम गुरुद्वारा श्री गुरुसर जामनी साहिब, बाज़ीदपुर पड़ा, जो आज भी संगत की अकीदत और रूहानी यक़ीन का बड़ा मरकज़ माना जाता है।
ऐतिहासिक गुरुद्वारे की सेवा और निर्माण
वक़्त-वक़्त पर इस तारीखी गुरुद्वारा साहिब की सेवा और निर्माण का काम कई महान शख्सियतों ने करवाया। सबसे पहले इस पावन गुरुद्वारे की सेवा सरदार बिशन सिंह आहलूवालिया ने करवाई थी। वो सिख सल्तनत के बानी शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह के दरबार के एक नामवर और अहम अफ़सर थे।
इसके बाद फ़रीदकोट रियासत के महाराजा बरजिंदर सिंह जी की पूजनीय माता नरेंद्र कौर ने भी इस पवित्र स्थान की अहमियत को देखते हुए यहां एक बेहद ख़ूबसूरत और आकर्षक इमारत का निर्माण करवाया। उनकी इस सेवा की बदौलत ये गुरुद्वारा और भी भव्य तौर में संगत की अकीदत का मरकज़ बन गया।

भव्य पांच मंज़िला इमारत और रूहानी सुकून का मरकज़
संगत की बढ़ती तादाद और समय की ज़रूरत को देखते हुए बाद में गुरुद्वारा साहिब की एक शानदार पांच मंज़िला नई इमारत का निर्माण शुरू किया गया। सिख वास्तुकला का ये बेहतरीन नमूना साल 1985 में बनकर तैयार हुआ। इसकी ख़ूबसूरती और बनावट हर आने वाले श्रद्धालु का दिल जीत लेती है।
दरअसल, गुरुद्वारा श्री गुरुसर जामनी साहिब, बाज़ीदपुर सिर्फ़ एक इमारत नहीं, बल्कि गुरु गोबिंद सिंह जी की ज़िंदगी, उनकी रूहानियत और इंसानियत के लिए दिए गए संदेश का एक ज़िंदा इतिहास है। यहां का शांत माहौल और गुरबाणी की मधुर आवाज़ इंसान को दुनियावी फ़िक्रों से दूर ले जाकर वाहेगुरु से जोड़ने का एहसास कराती है।
हर साल गुरुपर्व, शहीदी जोड़ मेले, मस्स्या और संगरांद जैसे ख़ास मौकों पर यहां बड़े धार्मिक समागम आयोजित होते हैं। इन अवसरों पर मुल्क और विदेशों से लाखों की तादाद में संगत माथा टेकने, अरदास करने और गुरु घर का आशीर्वाद लेने पहुंचती है।
अगर आप फ़िरोज़पुर की सैर पर जाएं, तो इस पावन और तारीखी गुरुद्वारे के दर्शन ज़रूर करें। ये जगह सिर्फ़ अकीदत का मरकज़ ही नहीं, बल्कि रूहानी सुकून और सिख इतिहास को करीब से महसूस करने का एक अनमोल मुकाम भी है।
स्टोरी– गुरप्रीत सिंह
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