हर साल Kashmir (कश्मीर) में सेब के लाखों पेड़ों की छंटाई होती है। इसके बाद निकलने वाली लकड़ी का बड़ा हिस्सा या तो जला दिया जाता है, कोयला बनाने में इस्तेमाल होता है या फिर बेकार समझकर फेंक दिया जाता है। लेकिन Kashmir (कश्मीर) की दो स्टूडेंट्स ने इसी बेकार लकड़ी में एक नया अवसर देखा। उन्होंने इसे सिर्फ़ बेकार लकड़ी नहीं, बल्कि रोज़गार और कारोबार का ज़रिया बना दिया।
मुंतज़िर नसीर वानी और मुनाज़ा नसीर वानी ने सेब के पेड़ों की कटाई के बाद बचने वाली लकड़ी से ऐसा सब्सट्रेट तैयार किया, जिस पर एक्जॉटिक (विदेशी) Mushroom (मशरूम) उगाए जा सकते हैं। आज उनका स्टार्टअप Noorza Innovations Private Limited न सिर्फ़ पर्यावरण की हिफाज़त कर रहा है, बल्कि किसानों की आमदनी बढ़ाने का भी नया रास्ता खोल रहा है।
कॉलेज में मिला आइडिया, जिसने बदल दी सोच
मुंतज़िर नसीर वानी फिलहाल मास्टर्स की पढ़ाई कर रही हैं। वो बताती हैं कि Cluster University में पढ़ाई के दौरान स्टूडेंट्स को सिर्फ़ किताबों तक सीमित नहीं रखा जाता। यहां उन्हें रिसर्च करने, नए आइडिया पर काम करने और अपना कारोबार शुरू करने के लिए लगातार मोटिवेट किया जाता है। उनके मुताबिक, कॉलेज की सबसे बड़ी सीख यही थी कि सिर्फ़ नौकरी तलाश करने वाला नहीं, बल्कि नौकरी देने वाला बनने की सोच रखनी चाहिए। यही सोच आगे चलकर उनके स्टार्टअप की बुनियाद बनी।

100 बोतलों से शुरू हुआ सफ़र
मुनाज़ा नसीर वानी बताती हैं कि साल 2024 में उन्होंने अपने स्टार्टअप की शुरुआत की। कॉलेज में Mushroom (मशरूम) की खेती से जुड़ा एक मॉड्यूल पढ़ाया जाता था। वहीं उन्होंने पहली बार Mushroom (मशरूम) उत्पादन की बारीकियां सीखी। पढ़ाई पूरी होने का इंतज़ार करने के बजाय उन्होंने उसी दौरान अपने आइडिया पर काम शुरू कर दिया। शुरुआत सिर्फ़ 100 बोतलों से हुई। संसाधन सीमित थे, लेकिन हौसला और भरोसा दोनों मज़बूत थे।
शुरुआत में वो बटन Mushroom (मशरूम) की खेती कर रही थी, लेकिन जल्द ही उन्हें एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। Kashmir (कश्मीर) में Mushroom (मशरूम) उगाने के लिए ज़रूरी सब्सट्रेट स्थानीय स्तर पर मौजूद नहीं थे। इसे पंजाब से मंगाना पड़ता था, जिससे खेती की लागत काफी बढ़ जाती थी।
इस वजह से किसानों को अच्छा मुनाफा नहीं मिल पाता था। तब दोनों ने सोचा कि जब Kashmir (कश्मीर) में हर साल सेब के पेड़ों की छंटाई से इतनी बड़ी मात्रा में लकड़ी निकलती है, तो क्या उसी का इस्तेमाल Mushroom (मशरूम) की खेती में नहीं किया जा सकता? इसी सवाल से उनकी रिसर्च की शुरुआत हुई।

बेकार लकड़ी से तैयार हुआ नया सब्सट्रेट
कई प्रयोगों के बाद दोनों ने सेब की लकड़ी को बारीक पीसकर अपनी एक ख़ास और पेटेंटेड तकनीक की मदद से Mushroom (मशरूम) उगाने लायक सब्सट्रेट तैयार किया। यही उनके स्टार्टअप की सबसे बड़ी पहचान बन गया। जिस लकड़ी को पहले बेकार समझकर जला दिया जाता था, आज वही विदेशी Mushroom (मशरूम) की खेती का आधार बन चुकी है।
आज Noorza Innovations किंग ऑयस्टर, इनोकी और स्टारकी जैसे एक्जॉटिक मशरूम उगा रही है। इसके अलावा टीम दूसरी विदेशी किस्मों पर भी काम कर रही है। उनका मानना है कि अगर इन मशरूमों का उत्पादन कश्मीर में ही बढ़ेगा, तो बाहर से होने वाला आयात कम होगा। इससे स्थानीय किसानों को बेहतर कमाई मिलेगी और कश्मीर Mushroom (मशरूम) उत्पादन का नया केंद्र बन सकता है।
Kashmir (कश्मीर) में करीब 1.72 लाख हेक्टेयर ज़मीन पर सेब की खेती होती है। हर साल पेड़ों की छंटाई के दौरान बड़ी मात्रा में लकड़ी निकलती है, जिसका पहले कोई ख़ास इस्तेमाल नहीं होता था। अब यही लकड़ी किसानों के लिए कमाई का नया ज़रिया बन रही है। इससे खेती की लागत भी घटेगी और पर्यावरण को भी फ़ायदा होगा, क्योंकि लकड़ी जलाने की ज़रूरत कम पड़ेगी।
Mushroom (मशरूम) उगाने की पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक तरीके से होती है। सबसे पहले लकड़ी से तैयार सब्सट्रेट को स्टरलाइज़ किया जाता है। इसके बाद उसमें Mushroom (मशरूम) का स्पॉन डाला जाता है। फिर इसे अलग-अलग कमरों में तय तापमान और नमी के बीच रखा जाता है। करीब दो महीने बाद मशरूम की फसल तैयार होकर बाज़ार में बेचने लायक हो जाती है।

अब सिर्फ़ मशरूम नहीं, कई नए प्रोडक्ट्स भी होंगे तैयार
मुंतज़िर और मुनाज़ा सिर्फ़ कच्चे मशरूम बेचने तक सीमित नहीं रहना चाहती। वो मशरूम से बने कई वैल्यू एडेड प्रोडक्ट्स पर काम कर रही हैं। इनमें रेडी-टू-कुक, रेडी-टू-सर्व फूड, मशरूम पाउडर और दूसरे हेल्दी प्रोडक्ट्स शामिल हैं। इनमें से कई प्रोडक्ट्स अभी प्रोटोटाइप स्टेज में हैं। दोनों स्टूडेंट्स का सपना है कि उनका स्टार्टअप सिर्फ़ कश्मीर या भारत तक सीमित न रहे, बल्कि इंटरनेशनल मार्केट में भी अपनी पहचान बनाए।
मुंतज़िर नसीर वानी और मुनाज़ा नसीर वानी की कहानी बताती है कि बड़े बदलाव हमेशा बड़े संसाधनों से नहीं आते। कई बार एक नया नज़रिया ही सबसे बड़ी ताक़त बन जाता है। जिस लकड़ी को लोग बेकार समझकर जला देते थे, आज वही रोज़गार, कारोबार और पर्यावरण संरक्षण तीनों की बुनियाद बन रही हैं। उनकी ये पहल इस बात की मिसाल है कि अगर इल्म, मेहनत और सही सोच साथ हो, तो बेकार समझी जाने वाली चीज़ भी दौलत में बदली जा सकती है।
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