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अटारी से ननकाना साहिब तक: सोने-जैसी पालकी, रुमाला साहिब और सिख कौम की बेमिसाल एकता

अटारी-वाघा सरहद (हिंदुस्तान): सरहदें भले ही इंसानों को बांटती हों, लेकिन ईमान और मोहब्बत की राह पर ये दीवारें भी मजबूर हो जाती हैं। ऐसा ही एक मंज़र बीते दिन अटारी-वाघा बॉर्डर पर दिखा, जब एक सुनहरी ‘पालकी’ (जिसे उर्दू में ‘तख्त-ए-रवां’ या ‘डोली’ भी कहते हैं) को सिख क़ौम के रूहानी जोश और अकीदत के साथ लेहंदा पंजाब (पाकिस्तान) रवाना किया गया।

ये पालकी कोई आम तोहफ़ा नहीं, बल्कि चढ़दा पंजाब (भारत) और लेहंदा पंजाब के सिखों के बीच रूहानी रिश्ते की मजबूत कड़ी है। अमृतसर के संत बाबा दरशन सिंह कुल्लीवाले और उनके शागिर्द बाबा गुरदेव सिंह ने ये ‘सेवा’ अंजाम दी। इसे फाइबर से बनाया गया है, लेकिन इस पर सुनहरा रंग ऐसा चमकता है मानो कोई ‘नूरानी ख़ज़ाना’ सरहद पार कर रहा हो।

Image- x.com/

मंसूबा है ननकाना साहिब में नसब करना

ये पाक पालकी गुरुद्वारा जनम अस्थान, श्री ननकाना साहिब (पाकिस्तान) की शान बढ़ाएगी। जहां से बाबा गुरु नानक ने इस दुनिया में आंखें खोलीं। पालकी के कुछ हिस्सों को भूरे रंग के पैकेट्स में बंद करके ‘सतनाम वाहेगुरु’ के जाप के बीच जीरो लाइन तक पहुंचाया गया। बाद में इसे असेंबल करके जन्म स्थान पर रखा जाएगा। इसके अलावा, गुरुद्वारा श्री करतारपुर साहिब (नारोवाल) के लिए चार पैक ‘रुमाला साहिब’ भी भेजे गए। ये वही पवित्र चादरें हैं जो गुरु ग्रंथ साहिब को चढ़ाई जाती हैं।

सरहद पर नज़ारा: कस्टम, बीएसएफ और सिख रहत मर्यादा

बॉर्डर पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के अधिकारी दरबार साहिब के मैनेजर राजिंदर सिंह की अगुवाई में मौजूद थे।भारतीय कस्टम कमिश्नर एपी चौधरी और बीएसएफ के अफसरों ने सारी कानूनी औपचारिकताएं पूरी कीं, और फिर ये तोहफ़े पाकिस्तान कस्टम विंग को सौंप दिए।

दूसरी तरफ़, पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (PSGPC) के प्रधान रमेश सिंह अरोड़ा, भाई महेश सिंध, अमीर सिंह और लाहौर के गुरुद्वारा डेरा साहिब के ग्रंथी मनींदर सिंह ने सरहद पार इस पालकी को अपने सर आंखों पर लिया।  

तारीख़ से सबक़: ये पहली मोहब्बत नहीं

सरहद पार सेवा का ये कोई पहला क़ाफ़िला नहीं है:

  • नवंबर 2024: मुक्तसर की ‘निरोल सेवा सोसाइटी’ ने गुरु नानक के 555वें प्रकाश पर्व पर एक स्टील की पालकी और गुरु ग्रंथ साहिब के सरूप भेजे थे।
  • अक्टूबर 2019: करतारपुर कॉरिडोर के उद्घाटन से पहले 400 किलोग्राम की पालकी (जिसमें 2.1 किलो सोना, 195 किलो तांबा और 210 किलो लकड़ी थी) DSGMC ने भेजी थी।
  • दिसंबर 2005: तब के पंजाब CM कैप्टन अमरिंदर सिंह और DSGMC चीफ परमजीत सिंह सरना ने 45 लाख रुपये की सोने-प्लेटेड पालकी के साथ राह निकाली थी। हालांकि, जगह की तंगी के कारण उसे तोड़कर सिर्फ खंभे ही ननकाना साहिब में लग पाए थे।

ये महज़ एक पालकी नहीं

ये सुनहरी पालकी, रुमाला साहिब और इस पूरे काफिले का सफ़र दिखाता है कि पंजाबियत का दिल सरहदों के भूत से नहीं धड़कता। जब बॉर्डर पर ‘वाहेगुरु’ का जाप होता है, तो हर दीवार पिघल जाती है। ये सिख कौम का पैग़ाम है कि ‘मन जीते जग जीत’। प्यार और सिक्के से ही दुनिया को जीता जा सकता है।

आज जब यह ‘तख्त-ए-रवां’ वाघा पार कर ननकाना साहिब की तरफ बढ़ा, तो हर आंख नम थी, हर दिल में दुआ थी कि ये रिश्ता क़यामत तक कायम रहे। चढ़दा और लेहंदा पंजाब,सरहद से नहीं, सांसों से जुड़े हैं।

Image-wikipedia

 ननकाना साहिब: जहां से शुरू हुई नूरानी सुबह

अगर सिख क़ौम के संस्थापक गुरु नानक देव जी की ज़िंदगी को एक किताब मान लें, तो श्री ननकाना साहिब उस किताब का पहला अक्षर है। ये वही पाक ज़मीन है जहां 1469 ईस्वी में वैशाख के महीने की एक चांदनी रात को बेबे नानकी और मेहता कालू जी के घर उस ज्योति ने जन्म लिया जिसने अंधेरे में रोशनी और बंटे हुए दिलों में मोहब्बत की राह दिखाई।

क्यूं है इतना ख़ास?

ये सिर्फ़ एक गुरुद्वारा नहीं, बल्कि पूरी संगत के लिए ‘जनम स्थान’ है। यानी वो पवित्र स्थान जहां सिख धर्म के पहले गुरु ने इस दुनिया में आंखें खोलीं। यहां का माहौल इतना रूहानी है कि जैसे ही आप दरबार में क़दम रखते हैं, आपको लगता है कि गुरु नानक की वह आवाज़ आज भी सुनाई देती है-‘न कोई हिंदू, न कोई मुसलमान’ यानी इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है।

कहां है ये पाक जगह?

ननकाना साहिब मौजूद है पाकिस्तान के पंजाब सूबे के शेखुपुरा ज़िले में, लाहौर से लगभग 80 किलोमीटर North-west direction में। ये शहर पहले ‘राय भोई की तलवंडी’ कहलाता था। गुरु नानक के नाना (नानक के नानक) राय भोई के नाम पर। बाद में ये ‘ननकाना साहिब’ (जिसका मतलब ‘नानक का घर’) कहलाने लगा। महाराजा रणजीत सिंह ने गुरु नानकदेव के जन्म स्थान पर गुरुद्वारा का निर्माण कराया था। 

तारीख़ के दर्द भरे पन्ने

यहां की मिट्टी में सिर्फ़ रोशनी नहीं, दर्द भी गहराई तक बसा है। 20 फरवरी 1921 को हुआ ‘साका ननकाना साहिब’ (ननकाना साहिब का वो क़र्द) सिख इतिहास का बहुत दर्दनाक हिस्सा है। उस दिन महंत नारायण दास के हुक्म पर निहत्थे सिखों पर गोलियां बरसाई गईं। जिसमें सैकड़ों सिख शहीद हो गए। बाद में सिख संगत ने ये गुरुद्वारा अपने क़ब्ज़े में ले लिया। आज भी हर साल फरवरी में यहां शहीदी जोड़ मेला लगता है, जहां उन जांबाज़ों को सलाम किया जाता है।

रोज़ाना का नज़ारा

आज गुरुद्वारा जन्म स्थान, ननकाना साहिब एक शानदार सफ़ेद संगमरमर की इमारत है, जिसके केंद्र में वो कमरा है, जहां मान्यता है कि गुरु नानक ने जन्म लिया। यहां गुरु का लंगर (मुफ़्त रसोई) चौबीसों घंटे चलता है। हर धर्म, हर मज़हब का इंसान यहां एक साथ बैठकर रोटी खाता है। रात को यहां गुरु ग्रंथ साहिब का सुखासन (विश्राम) हर रोज़ एक समारोह के तौर पर होता है, जिसमें पाकिस्तान के सिख, हिंदू और यहां तक कि कई मुसलमान भी शामिल होते हैं।

भारत से कनेक्शन

  • करतारपुर कॉरिडोर खुलने के बाद, ननकाना साहिब अब अमृतसर से लगभग 120 कि.मी. (दरियां और सरहद पार करके) की दूरी पर है।
  • हर साल गुरु नानक जयंती (प्रकाश पर्व) पर विशेष रेल सेवा (सिख यात्रा ट्रेन) भारत से पाकिस्तान के लिए चलती है। जिसे ‘नानक सरकार एक्सप्रेस’ या ‘सरहद-ए-पंजाब सवारी’ कहते हैं।
  • पुराने समय में (1947 से पहले) ननकाना साहिब भारत के पंजाब में ही हुआ करता था। ये सरहद का वो ज़ख्म है जो आज भी हर पुराने पंजाबी की यादों में ताज़ा है।

ये भी पढ़ें:   ‘ऐब-ए-रवां’ से ‘बाफ़्त-हवा’ तक : वो भारतीय शान जिसने मुगलों को दीवाना बनाया, मलमल जिसे देख यूरोप हैरान रह गया

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