12 मई 1710 को सिख जांबाज़ों की एक छोटी-सी टोली सरहिंद के क़रीब छप्पर चिरी के मैदान में पहुंची। कुछ ही घंटों में इस टोली ने उत्तर भारत की सबसे ताक़तवर मुग़ल फ़ौजों में से एक को शिकस्त दे दी। इस जंग की कमान Banda Singh Bahadur (बंदा सिंह बहादुर) के हाथ में थी, जो सिर्फ़ दो साल पहले गुरु गोबिंद सिंह जी के हुक़्म और दुआओं के साथ पंजाब आए थे। उनके साथ पांच भरोसेमंद साथी, एक नगाड़ा, एक निशान और गुरु साहिब के दिए हुए पांच तीर थे। लेकिन ये सिर्फ एक जंग नहीं थी, बल्कि सरहिंद से तारीख़ का पुराना हिसाब चुकाने का वक़्त था।
सरहिंद ने क्या किया था?
सरहिंद की हार इतनी अहम क्यों मानी जाती है, इसे समझने के लिए दिसंबर 1704 की तरफ लौटना होगा। गुरु गोबिंद सिंह जी के दो छोटे साहिबज़ादे — बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह, जिनकी उम्र सिर्फ नौ और सात साल थी, अपनी दादी माता गुजरी जी के साथ गिरफ़्तार कर लिए गए थे। उन्हें सरहिंद के मुग़ल सूबेदार वज़ीर ख़ान के सामने पेश किया गया।
साहिबज़ादों से कहा गया कि वो अपना मज़हब छोड़ दें, लेकिन दोनों ने इंकार कर दिया। इसके बाद वज़ीर ख़ान ने उन्हें ज़िंदा दीवार में चिनवा दिया। उसी रात माता गुजरी जी ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया। जब ये ख़बर पंजाब की सिख बस्तियों तक पहुंची, तो लोगों के दिलों में मायूसी नहीं फैली। बल्कि एक ऐसा जज़्बा पैदा हुआ, जो लंबे वक़्त तक ज़िंदा रहा।
बंदा सिंह बहादुर कैसे बने?
क़रीब 1708 में गुरु गोबिंद सिंह जी दक्कन के नांदेड़ पहुंचे। वहीं उनकी मुलाकात एक हिंदू साधु माधो दास से हुई। कहा जाता है कि माधो दास में बहुत असरदार शख़्सियत थी, लेकिन साथ ही उन्हें अपने ऊपर काफी घमंड भी था। गुरु गोबिंद सिंह जी और माधो दास की ये मुलाक़ात उस दौर की सबसे दिलचस्प घटनाओं में मानी जाती है।
कहा जाता है कि गुरु साहिब से मिलने के बाद माधो दास पूरी तरह बदल गए। उन्होंने ख़ुद को गुरु का बंदा यानी सेवक बताया। इसके बाद खालसा पंथ की दीक्षा लेने पर गुरु गोबिंद सिंह जी ने उन्हें नया नाम दिया — बंदा सिंह बहादुर।
पंजाब रवाना करने से पहले गुरु साहिब ने उन्हें पांच तीर, एक नगाड़ा, निशान साहिब और पांच तजुर्बेकार सिख साथी दिए, ताकि वो हर मुश्किल में उनकी रहनुमाई कर सकें। इनमें भाई बिनोद सिंह, भाई काहन सिंह, भाई बाज सिंह, भाई रण सिंह और भाई दया सिंह शामिल थे। गुरु गोबिंद सिंह जी का पैग़ाम बिल्कुल साफ़ था। ये सिर्फ़ हमला या लूट नहीं थी, बल्कि पंजाब में ज़ुल्म ख़त्म कर इंसाफ़ पर आधारित हुकूमत कायम करने की मुहिम थी।
मुग़ल इलाक़ों से होकर बढ़ती बंदा सिंह बहादुर की फ़ौज
Banda Singh Bahadur (बंदा सिंह बहादुर) ने पंजाब में जिस तेज़ी और समझदारी से आगे बढ़ना शुरू किया, उसकी उम्मीद मुग़ल हुकूमत ने नहीं की थी। पहले सोनीपत पर कब्ज़ा हुआ, फिर समाना और उसके बाद सधौरा भी फ़तह कर लिया गया। हर जीत के साथ हज़ारों किसान, मज़लूम और बेघर लोग उनकी फ़ौज में शामिल होते चले गए।
इनमें से कई लोग ऐसे थे, जिन्होंने पूरी ज़िंदगी जमींदारों और जागीरदारों के ज़ुल्म के नीचे गुज़ारी थी। उनके लिए ज़मीन और उस पर मेहनत करने वाले लोग सिर्फ़ अमीरों की मिल्कियत माने जाते थे। लेकिन Banda Singh Bahadur (बंदा सिंह बहादुर) उनके लिए एक अलग तरह के सरदार बनकर सामने आए — ऐसे रहनुमा, जो आम लोगों के हक़ और इंसाफ़ के लिए लड़ रहे थे। 1710 की बहार आते-आते खालसा फ़ौज सीधे सरहिंद के सामने पहुंच चुकी थी।
छप्पर चिरी की जंग
वज़ीर ख़ान कोई मामूली अफ़सर नहीं था। उसके पास एक मज़बूत और तजुर्बेकार मुगल फ़ौज थी, जिसमें 48 से ज़्यादा तोपें, जंगी हाथी और हज़ारों घुड़सवार शामिल थे। उसके पीछे मुग़ल सल्तनत की सालों पुरानी फ़ौजी ताक़त और इंतज़ाम था। दूसरी तरफ Banda Singh Bahadur (बंदा सिंह बहादुर) की फ़ौज थी, जो तेज़ रफ़्तार, ज़मीन की समझ और मज़बूत हौसले के दम पर लड़ रही थी। 12 मई 1710 को दोनों फ़ौजें छप्पर चिरी के मैदान में आमने-सामने आ गई। जंग की शुरुआत मुग़ल तोपखाने ने की, लेकिन सिख घुड़सवार इतनी शिद्दत से आगे बढ़े कि मुगल फ़ौज की पूरी सफ़बंदी हिल गई।

भाई बाज सिंह और भाई फतेह सिंह सीधे वज़ीर ख़ान के मोर्चे तक जा पहुंचे। इसके बाद बेहद क़रीबी लड़ाई हुई, जिसमें वज़ीर ख़ान मारा गया। उसके मरते ही मुग़ल फ़ौज का बचा हुआ हौसला भी टूट गया। फ़ौज मैदान छोड़कर भागने लगी और पूरे मैदान में खालसा का जंगी नारा गूंज उठा।
खालसा राज की शुरुआत
जंग के सिर्फ़ दो दिन बाद, 14 मई 1710 को सरहिंद के किले पर केसरी निशान लहरा दिया गया। Banda Singh Bahadur (बंदा सिंह बहादुर) ने खालसा राज का ऐलान किया। भाई बाज सिंह को सरहिंद का पहला सूबेदार बनाया गया, जबकि सलौदी के भाई अली सिंह को उनका नायब यानी डिप्टी सूबेदार नियुक्त किया गया। 27 मई 1710 को Banda Singh Bahadur (बंदा सिंह बहादुर) ने पहला खुला दरबार, यानी दरबार-ए-आम लगाया। इसी दौरान खालसा राज के नाम से नए सिक्के और सरकारी मुहर भी जारी की गई।
इन सिक्कों पर फ़ारसी में लिखा था “गुरु नानक की कृपा, सत्य और शक्ति ने दोनों जहानों में फ़तह दिलाई, और गुरु गोबिंद सिंह की कामयाबी सच्चे मालिक की मेहर से हासिल हुई।” सरकारी मुहर पर लिखा गया “देग तेग फ़तेह ओ नुसरत बे-दिरंग” यानी इंसाफ़, हिफाज़त और फ़ौरन मदद के साथ फ़तह। ये जुमला आज भी सिख अरदास का अहम हिस्सा है। इसके साथ ही नया नानकशाही संवत भी शुरू किया गया। हैरत की बात ये थी कि जंग ख़त्म होने के कुछ ही दिनों में नई हुकूमत का पूरा इंतज़ाम काम करने लगा था।

ज़मीन उसी की, जो उसे जोते
Banda Singh Bahadur (बंदा सिंह बहादुर) की हुक़ूमत को सबसे अलग बनाने वाली बात उनकी ज़मीन से जुड़ी इस्लाह थी, जिसे उन्होंने बहुत जल्दी लागू कर दिया। उन्होंने जागीरदारी निज़ाम ख़त्म कर दिया। ये वही सिस्टम था, जिसमें जमींदारों और जागीरदारों की ज़मीन और उस पर काम करने वाले लोगों पर हमेशा के लिए कब्ज़ा माना जाता था। Banda Singh Bahadur (बंदा सिंह बहादुर) ने ऐलान किया कि ज़मीन उसी की होगी, जो उस पर खेती करेगा।
इस एक फैसले ने किसानों की ज़िंदगी बदल दी। जो लोग पीढ़ियों से दूसरों की ज़मीन पर मेहनत कर रहे थे और जिनके पास अपना कुछ नहीं था, वो पहली बार अपनी ज़मीन के मालिक बने। सदियों से चले आ रहे कर्ज़, मजबूरियां और बंधुआ मेहनत जैसे रिश्ते ख़त्म कर दिए गए। कई तारीख़दान मानते हैं कि दक्षिण एशिया की तारीख़ में ये सबसे शुरुआती और बड़े ज़मीनी इस्लाहों में से एक था। फर्क बस इतना था कि ये किताबों या बहसों में नहीं, बल्कि सीधे सरकारी हुक्म के ज़रिए लागू किया गया था।

इस फ़तह ने क्या बदला
सरहिंद की हार के बाद पंजाब में मुग़ल हुकूमत की पकड़ तेज़ी से कमज़ोर होने लगी। लेकिन इससे भी बड़ी बात ये थी कि इस जीत ने सिख क़ौम की सोच बदल दी। इससे पहले कई सालों तक सिखों ने लगातार ज़ुल्म और सताए जाने का दौर देखा था। मगर सरहिंद की फ़तह के बाद हालात बदल गए। अब वो सिर्फ़ लड़ नहीं रहे थे, बल्कि हुक़ूमत भी चला रहे थे।
वो अपने सिक्के जारी कर रहे थे, इलाक़ों का इंतज़ाम संभाल रहे थे और महसूल भी वसूल कर रहे थे। आने वाले सालों में जो खालसा मिसलें उभरीं और बाद में महाराजा रणजीत सिंह ने जो बड़ी सल्तनत क़ायम की, उसकी बुनियाद कहीं न कहीं 1710 की उस सुबह छप्पर चिरी में मिली इसी हिम्मत और यक़ीन पर टिकी थी।
आज भी उस जंग के मैदान में 328 फ़ुट ऊंचा “फ़तेह बुर्ज” खड़ा है। ये भारत का सबसे ऊंचा विजय स्तंभ माना जाता है। ये सिर्फ़ एक जंग की जीत की याद नहीं दिलाता, बल्कि उन दो मासूम साहिबज़ादों की कुर्बानी को भी याद करता है, जिन्हें दीवार में ज़िंदा चिनवा दिया गया था। साथ ही ये उस शख़्स की कहानी भी बयान करता है, जिसने सरहिंद से उसके ज़ुल्मों का हिसाब लिया। 12 मई 1710 साउथ एशिया की तारीख़ की उन चुनिंदा तारीख़ों में से एक मानी जाती है, जब जीत सिर्फ जंग के मैदान में नहीं, बल्कि हुकूमत के निज़ाम और लोगों की यादों में भी दर्ज हुई थी।
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