हिसाब लगाना मुश्किल है कि अपने ज़माने में चार्ली चैपलिन (Charlie Chaplin) किस कदर लोकप्रिय थे. दुनिया के सबसे बड़े कलाकार, चित्रकार, कवि, राजनेता और खूबसूरत स्त्रियाँ उनके नजदीकी दोस्तों के दायरे में आते थे। तुर्की के महाकवि नाजिम हिकमत अपनी कविता ‘आत्मकथा’ में कहते हैं –
मुझे ईर्ष्या हुई उन स्त्रियों से जिन्हें मैंने मोहब्बत की
मुझे ज़रा भी जलन नहीं हुई चार्ली चैपलिन से
मूक फिल्मों से लेकर आवाज वाली फिल्मों तक के अपने सिनेमाई सफ़र में चार्ली ने दशकों तक दुनिया तक अपना दीवाना बनाए रखा. एक अभिनेता, निर्माता, पटकथा-लेखक और निर्देशक के तौर पर उनका काम बहुत विषद है।
दिल को चीर रख देने वाली करुणा उपजाने वाले सिनेमा के महानतम मसखरे वाली चार्ली की छवि को बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक का अथाह प्रेम मिला। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर की अजेय छवि का मखौल बनाती 1940 की उनकी फिल्म द ग्रेट डिक्टेटर’ अपने समय के सबसे साहसी कामों में से है। तब तक उन्हें फ़िल्में बनाते हुए 25 साल हो चुके थे और सारी दुनिया उन्हें पहचानती थी।1940 के बाद सात साल तक वे विश्वयुद्ध के कारण कोई नई फिल्म नहीं बना सके. इस अंतराल में दुनिया की राजनीति बहुत बदल चुकी थी. सही को सही और गलत को गलत कहने वालों की शामत थी और भय का माहौल था।

ऐसे में चार्ली चैपलिन चाहते तो जोकर की अपनी स्थापित भूमिका को निभाए चले जाते और अपनी तिजोरी भरते रहते. उन्होंने ऐसा नहीं किया। 1947 में उन्होंने एक फिल्म बनाई ‘मौश्ये वेर्दू’. इस फिल्म में चार्ली ने सीरियल किलर की भूमिका निभाई।
1920 के दशक के एक फ्रेंच अपराधी के जीवन पर आधारित यह फिल्म युद्ध के कारण आई मंदी के बाद तीस साल काम कर चुकने के बावजूद नौकरी से निकाल दिए गए एक बैंक क्लर्क की दास्तान है। उसके परिवार में व्हीलचेयर पर रहने वाली विकलांग बीवी और एक बच्चा है। परिवार को पालने के उद्देश्य से वह मजबूरी में अपराध की दुनिया में घुसता है. रईस विधवाओं को अपने प्रेमपाश में फंसा कर उनकी हत्या करना और उनका पैसा हड़प लेना उसका मॉडस ऑपरेंडी है। अंततः वह पकड़ा जाता है और उसे मृत्युदंड मिलता है।
यह एक ब्लैक कॉमेडी है जिसमें चैपलिन प्राइवेट और पब्लिक मर्डर के बीच एक व्यंग्यात्मक तुलना पेश करते हैं। फिल्म का नायक वेर्दू अदालत में कहता है, “जहां तक मेरे मास मर्डरर होने का सवाल है क्या आपका संसार ऐसा करने को उत्साहित नहीं करता? युद्ध के लिए हथियार बनाना मास मर्डर नहीं है?” कालकोठरी में मिलने आये एक रिपोर्टर से वह कहता है, “एक हत्या आपको खलनायक बना देती है. लाखों हत्याएं करने के बाद आप हीरो बन जाते हैं. आपके पास संख्या हो तो हत्या भी एक पवित्र उद्यम बन जाती है, दोस्त!”

फिल्म के अंतिम सीन में चार्ली चैपलिन का जीनियस चमकता है। वेर्दू को गिलोटीन पर चढ़ाए जाने से पहले उससे मिलने एक पादरी आता है और उसे एक सिगरेट पेश करता है। वेर्दू मना कर देता है। अब उसे रम का एक गिलास प्रस्तुत होता है। वेर्दू फिर से मना करता है लेकिन अचानक उसका मन बदलता है और वह कहता है, “आज तक मैंने रम का स्वाद कभी नहीं चखा है”. वह एक झटके में उसे पी जाता है। पादरी प्रार्थना बुदबुदाना शुरू करता है और पहरेदार उसे गिलोटीन की तरफ ले जाते हैं। फिल्म समाप्त होती है।

‘मौश्ये वेर्दू’ उस वक्त रिलीज हुई जब राजनैतिक खौफ अपने चरम पर था। चूंकि इस फिल्म में चैपलिन ने उसके सामने आईना रखने की हिम्मत दिखाई थी, उसका शिकार भी उन्हें बनना था।
जनता ने फिल्म को नकार दिया। प्रेस कान्फ्रेंसों में पत्रकार फिल्म की बात करने के बजाय चार्ली से उनकी राजनीतिक विचारधारा, देशभक्ति और टैक्स चोरी जैसे विषयों पर आक्रामक सवाल पूछने लगे. वे जानना चाहते थे कि चार्ली अमेरिकी नागरिकता क्यों नहीं ले रहे।
नाजी विचारधारा से प्रेरित आक्रमणों के कारण फिल्म को सिनेमाघरों से उतार लेना पड़ा लेकिन फिल्म की तारीफ करते हुए उस समय दुनिया के सबसे बड़े फिल्म समीक्षक माने जाने वाले जेम्स एजी ने लिखा, “यह अब तक बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक है। मुझे यकीन है कि जो लोकतंत्र अपने सभी शत्रुओं को अपने भीतर न रख सके, चाहे वे शत्रु कैसे भी हों, वह एक लोकतंत्र के रूप में तबाह हो चुका है।”

चार्ली चैपलिन को याद करना एक ऐसे कलाकार को सलाम करना है जिसने अपनी कला से मुश्किल वक्त में लोगों को हंसाने और जगाने का दोहरा मुश्किल काम किया। यह एक ऐसी महान आत्मा को याद करना होता है जो सही बात कहने में किसी के आगे न डरा। न झुका। मसखरा तो वह हरगिज नहीं था।
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