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वासिफ़ अली वासिफ़: इल्म, इश्क़ और रूहानियत की एक मुकम्मल दास्तान

उर्दू अदब और तसव्वुफ़ की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जो सिर्फ़ एक शख़्सियत नहीं बल्कि एक मुकम्मल रूहानी एहसास बन जाते हैं। वासिफ़ अली वासिफ़ भी ऐसी ही अज़ीम हस्ती थे, जिनकी ज़िंदगी इल्म, इश्क़ और रूहानियत का खूबसूरत संगम थी।

वासिफ़ अली वासिफ़ की पैदाइश 15 जनवरी 1929 को पंजाब (अब पाकिस्तान) के खुशाब इलाके में हुई। उनका ताल्लुक़ अवान क़बीले से था, जो अपनी बहादुरी और रूहानी विरासत के लिए जाना जाता है। उनके वालिद मलिक मुहम्मद आरिफ़ एक नेकदिल और दीनी मिज़ाज इंसान थे। घर का माहौल ही इल्म और इबादत से भरा हुआ था, जिसका असर वासिफ़ साहब की शख़्सियत पर बचपन से ही दिखने लगा था।

तालीम का सफ़र

उन्होंने अपनी शुरुआती तालीम खुशाब में हासिल की और फिर आगे की पढ़ाई के लिए झंग चले गए। पढ़ाई में वह बेहद होनहार थे और हर इम्तिहान में अव्वल दर्जे से कामयाब होते रहे। बाद में उन्होंने लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेज़ी अदब में एमए किया। उस दौर में बीए और एमए करना ही बड़ी बात मानी जाती थी, लेकिन वासिफ़ साहब ने इसे भी अपनी मेहनत और लगन से आसान बना दिया।

‘मिला है जो मुक़द्दर में रक़म था
ज़हे क़िस्मत मिरे हिस्से में ग़म था’

तालीम के साथ-साथ वह खेल-कूद और दूसरी सरगर्मियों में भी आगे रहते थे। हॉकी उनके पसंदीदा खेलों में से एक था और उन्होंने इसमें बेहतरीन प्रदर्शन के लिए अवार्ड भी हासिल किया। कॉलेज मैगज़ीन “रावी” में उनके लिखे मज़ामीन भी छपते थे, जो उनकी अदबी काबिलियत का सबूत थे।

‘अश्कों ने बयां कर ही दिया राज़-ए-तमन्ना
हम सोच रहे थे अभी इज़हार की सूरत’

1954 में उन्होंने सिविल सर्विस का इम्तिहान पास कर लिया था, जो उस वक़्त बहुत बड़ी कामयाबी मानी जाती थी। लेकिन उनकी तबीयत में दुनियावी ओहदों से ज़्यादा रूहानियत की तरफ झुकाव था। इसलिए उन्होंने अफ़सरी छोड़कर तालीम देने का रास्ता चुना। लाहौर में उन्होंने “लाहौर इंग्लिश कॉलेज” की बुनियाद रखी, जहां वह तलबा को सिर्फ़ किताबें ही नहीं, बल्कि ज़िंदगी जीने का सलीका भी सिखाते थे।

वासिफ़ अली वासिफ़ की शख़्सियत का सबसे ख़ास पहलू उनकी रूहानी गहराई थी। बचपन से ही उनके अंदर एक अजीब सी कैफ़ियत रहती थी अज़ान की आवाज़ सुनते ही उनका दिल कांप उठता था। वह रातों को उठकर तहज्जुद की नमाज़ पढ़ते और तन्हाई में अल्लाह से रिश्ता मज़बूत करते। उनकी शायरी और तहरीरों में भी यही रूहानियत साफ झलकती है।

‘जिस आंख ने देखा है उस आंख को देखूं
है उस के सिवा क्या तेरे दीदार की सूरत’

उनकी महफ़िलें लाहौर में बहुत मशहूर थीं, जहां लोग दूर-दूर से अपने सवाल लेकर आते थे और वासिफ़ साहब बड़े सादे लेकिन गहरे अंदाज़ में जवाब देते थे। उनकी बातें सीधे दिल में उतर जाती थीं। यही वजह है कि उन्हें “मुसलह-ए-पाकिस्तान” यानी समाज सुधारक भी कहा गया।

अदबी और इल्मी ख़िदमत

उनकी तहरीरों में मोहब्बत, इंसानियत और खुदा से रिश्ता सबसे अहम विषय रहे। उन्होंने करीब 40 किताबें लिखीं, जिनमें “शब चिराग”, “दिल दरिया समुंदर”, “कतरा कतरा कुलज़ुम” और “हरफ़ हरफ़ हक़ीक़त” जैसी किताबें बहुत मशहूर हुईं। उनकी लिखावट सादी लेकिन असरदार होती थी कम लफ़्ज़ों में बड़ी बात कहना उनका हुनर था।

वासिफ़ साहब की दोस्ती अपने दौर के बड़े अदबियों जैसे कुद्रतुल्लाह शाहब, अशफ़ाक़ अहमद और हनीफ़ रामे से थी। ये सभी लोग मिलकर अदब और फ़िक्र की दुनिया में नई सोच पैदा कर रहे थे।

‘जिसे तू राएगां समझा था ‘वासिफ़’
वो आंसू इफ़्तिख़ार-ए-जाम-ए-जम था’

उनकी ज़िंदगी बहुत सादा थी, लेकिन दिल बहुत बड़ा था। उनके कॉलेज में अक्सर लंगर का इंतज़ाम रहता था, जहां हर आने-जाने वाले को चाय और खाना मिलता था। वह खुद लोगों के साथ बैठकर बातें करते और उनकी मुश्किलें सुनते।

24 अक्टूबर 1970 को उन्होंने शादी की। उनके एक बेटे और तीन बेटियां हुईं। शादी के बाद भी उनकी रूहानी ज़िंदगी में कोई कमी नहीं आई, बल्कि वह और भी ज़्यादा लोगों के लिए रहनुमा बन गए।

‘अजब ए’जाज़ है तेरी नज़र का
कि हम भूले हैं रस्ता अपने घर का’

18 जनवरी 1993 को वासिफ़ अली वासिफ़ इस दुनिया से रुख़्सत हो गए, लेकिन उनकी तालीमात और उनकी सोच आज भी ज़िंदा है। उनकी बातें आज भी लोगों को सुकून देती हैं और सही रास्ता दिखाती हैं। वासिफ़ साहब की ज़िंदगी हमें यह सिखाती है कि असली कामयाबी सिर्फ़ दुनियावी ओहदों में नहीं, बल्कि अपने अंदर की दुनिया को रोशन करने में है। 

ये भी पढ़ें: इक़बाल अशहर: “उर्दू है मिरा नाम…” से पहचान बनाने वाले शायर की अदबी दास्तान

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