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इक़बाल अशहर: “उर्दू है मिरा नाम…” से पहचान बनाने वाले शायर की अदबी दास्तान

 “उर्दू है मिरा नाम, मैं ख़ुसरो की पहेली
मैं मीर की हमराज़ हूं, ग़ालिब की सहेली”

यह मशहूर नज़्म जब भी पढ़ी या सुनी जाती है तो उर्दू शायरी के एक ऐसे शायर का नाम सामने आता है जिसने अपनी सादा और दिलकश शायरी से मुशायरों की महफ़िलों को रोशन किया इक़बाल अशहर। दौर-ए-हाज़िर में वे उन शायरों में शुमार किए जाते हैं जिन्होंने उर्दू ग़ज़ल को एक नई ताज़गी और शगुफ़्तगी बख़्शी है। उनकी ग़ज़लों में सादगी, नर्मी और एहसास की गहराई दिखाई देती है, जो सुनने वालों और पढ़ने वालों, दोनों को अपनी जानिब खींच लेती है।

इक़बाल अशहर का जन्म 26 अक्टूबर 1965 को दिल्ली के ऐतिहासिक इलाके शाहजहांनाबाद के कूचा चेलान में हुआ। उनके पिता का नाम अब्दुल लतीफ़ और माता का नाम सकीना ख़ातून था। उनका परिवार मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मशहूर शहर अमरोहा से ताल्लुक़ रखता था। 

पुरानी दिल्ली का माहौल हमेशा से तहज़ीब, अदब और ज़ुबान की रौनक़ के लिए जाना जाता रहा है। यही माहौल इक़बाल अशहर के बचपन का हिस्सा बना। उस दौर में उर्दू सिर्फ़ एक ज़ुबान नहीं थी, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का अहम हिस्सा थी। बाज़ारों के बोर्ड, अख़बारों की सुर्खियां, मस्जिदों की तकरीरें और घरों की बातचीत हर जगह उर्दू की मिठास सुनाई देती थी।

तालीम और अदबी माहौल

इक़बाल अशहर की शुरुआती पढ़ाई शांता नर्सरी स्कूल से हुई। उस समय इस स्कूल में उर्दू पढ़ना ज़रूरी था, क्योंकि यह माना जाता था कि उर्दू ज़ुबान इंसान के लहजे और अदब को निखारती है।

इसके बाद उन्होंने रामजस स्कूल नंबर 1, दरियागंज से अपनी स्कूली तालीम पूरी की। आगे चलकर उन्होंने ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज से उर्दू में बीए (ऑनर्स) की डिग्री हासिल की।

उनकी तालीम सिर्फ़ स्कूल और कॉलेज तक सीमित नहीं थी। घर और समाज का अदबी माहौल भी उनकी तालीम का अहम हिस्सा बना। उनकी मां अलीगढ़ के अदबी माहौल से जुड़ी हुई थीं और अक्सर घर में ग़ज़लें और लोकगीत सुनाया करती थीं। यही वजह थी कि बचपन से ही इक़बाल अशहर के दिल में शायरी के लिए एक ख़ास लगाव पैदा हो गया।

शायरी की शुरुआत

इक़बाल अशहर ने शायरी की शुरुआत 10वीं क्लास में की। उसी साल जब उनकी उम्र महज़ 17 साल थी, उन्होंने अपनी पहली नात-ए-पाक कही।

यह नात उन्होंने एक सीरत के जलसे में पढ़ी और लोगों ने उसे बहुत पसंद किया।

अल्लाह ये दुआ है मदीने को जाऊं मैं
है इल्तिजा बस इतनी कि वापस न आऊं मैं

इस पहली प्रस्तुति ने उन्हें यह एहसास दिलाया कि शायरी उनके दिल की आवाज़ है और यह रास्ता उन्हें आगे बहुत दूर तक ले जा सकता है।

नातिया मुशायरों से पहचान

इक़बाल अशहर ने अपना पहला बड़ा नातिया मुशायरा साल 1986 में दिल्ली की ऐतिहासिक जामा मस्जिद में पढ़ा। इसके बाद उन्होंने दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, रायपुर और देश के कई शहरों में आयोजित नातिया मुशायरों में हिस्सा लिया। उनके नातिया कलाम ने आशिक़ान-ए-रसूल के दिलों को छू लिया और उन्हें खूब दाद मिली।

उनकी आवाज़ में एक हल्का सा तरन्नुम और लहजे में सादगी है। यही वजह है कि जब वे मंच पर ग़ज़ल पढ़ते हैं तो लोग बड़ी तवज्जो के साथ उन्हें सुनते हैं।

अखिल भारतीय मुशायरों की यात्रा

साल 1998 में मशहूर शायर मौज रामपुरी की सरपरस्ती में इक़बाल अशहर ने अखिल भारतीय मुशायरों में हिस्सा लेना शुरू किया। इस दौरान कई बड़े शायरों ने उन्हें प्रोत्साहित किया। इनमें वसीम बरेलवी, राहत इंदौरी, मुनव्वर राणा, अनवर जलालपुरी और मेराज फैज़ाबादी जैसे नाम शामिल हैं।

इन वरिष्ठ शायरों की हौसला-अफ़ज़ाई ने इक़बाल अशहर को मुशायरों की दुनिया में एक मज़बूत पहचान बनाने में मदद की। धीरे-धीरे वे देश के बड़े मुशायरों में बुलाए जाने लगे और उनकी शायरी की पहचान दूर-दूर तक फैलने लगी।

विदेशों में शायरी की गूंज

इक़बाल अशहर की शायरी की पहचान सिर्फ़ भारत तक सीमित नहीं रही। उन्होंने दुनिया के कई देशों में मुशायरों में हिस्सा लिया। उनकी आवाज़ अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर, बहरीन, ओमान और पाकिस्तान जैसे देशों में भी गूंज चुकी है।

इन यात्राओं के दौरान उन्होंने महसूस किया कि विदेशों में रहने वाले लोग उर्दू से गहरा लगाव रखते हैं। वे उर्दू की किताबों को बड़े शौक़ से खरीदते और सहेज कर रखते हैं।

डिजिटल दौर और शायरी

आज सोशल मीडिया ने शायरी की दुनिया को काफी बदल दिया है। इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म ने नए शायरों को अपनी आवाज़ लोगों तक पहुंचाने का एक आसान ज़रिया दिया है।

हालांकि इक़बाल अशहर का मानना है कि शायरी की असली क़ीमत सिर्फ़ सोशल मीडिया के लाइक्स या फॉलोअर्स से तय नहीं हो सकती।

उनके मुताबिक़ शायरी का असली असर तब होता है जब वह दिल को छू जाए और इंसान को सोचने पर मजबूर कर दे।

उर्दू अदब में मुशायरों की रिवायत की अहमियत

इक़बाल अशहर मानते हैं कि उर्दू की रिवायत को ज़िंदा रखने में मुशायरों की बहुत बड़ी भूमिका है। वे ख़ास तौर पर शंकर-शाद मुशायरे को बहुत अहम मानते हैं और कहते हैं कि ऐसे मुशायरे उर्दू की सांस्कृतिक विरासत को ज़िंदा रखते हैं।

इन मंचों पर नए शायरों को भी मौक़ा मिलता है और उर्दू की रिवायत एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रहती है।

उर्दू से एक गहरा रिश्ता

इक़बाल अशहर की पूरी ज़िंदगी उर्दू से गहरे रिश्ते की कहानी है। उनके लिए उर्दू सिर्फ़ एक ज़ुबान नहीं, बल्कि एक एहसास है। वे खुद कहते हैं “उर्दू वह भाषा नहीं है जिसे मैंने सिर्फ़ सीखा है, बल्कि यह वह भाषा है जिसे मैंने जिया है।”

इक़बाल अशहर की शायरी में सादगी और गहराई का सुंदर मेल दिखाई देता है। उनके कुछ मशहूर अशआर इस तरह हैं 

सोचता हूं तिरी तस्वीर दिखा दूं उस को
रौशनी ने कभी साया नहीं देखा अपना

इन अशआर में उर्दू ज़ुबान की खूबसूरती और शायर की संवेदनशील सोच साफ़ दिखाई देती है।

क्यूं मुझ को बनाते हो तअस्सुब का निशाना
मैंने तो कभी ख़ुद को मुसलमां नहीं माना

देखा था कभी मैंने भी ख़ुशियों का ज़माना
अपने ही वतन में हूं मगर आज अकेली

इक़बाल अशहर आज उर्दू शायरी की दुनिया का एक अहम नाम हैं। उनकी ग़ज़लों में न सिर्फ़ ज़ुबान की मिठास है बल्कि इंसानी एहसासात की गहराई भी है।

पुरानी दिल्ली की गलियों से शुरू हुआ उनका सफ़र आज दुनिया के बड़े-बड़े मुशायरों तक पहुंच चुका है। उनकी शायरी यह साबित करती है कि सादगी और सच्चे एहसास ही असली अदब की पहचान होते हैं।

और शायद यही वजह है कि जब भी इक़बाल अशहर अपनी ग़ज़ल पढ़ते हैं, तो सिर्फ़ एक शायर की आवाज़ नहीं सुनाई देती,बल्कि उर्दू तहज़ीब की पूरी रूह बोल उठती है।

ये भी पढ़ें: कैफ़ भोपाली: ज़िंदगी शायद इसी का नाम है…’ और उनके अंदाज़-ए-बयां की ख़ूबियां

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