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‘कला का कोई धर्म नहीं’: सय्यद निसार का Wood Inlay Art से सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश

कर्नाटक के मैसूर के हुनरमंद कलाकार सय्यद निसार लकड़ी पर कला उकेरने की एक पुरानी परंपरा, wood inlay art को ज़िदा रखने में जुटे हैं। इस कला में लकड़ी के अलग-अलग टुकड़ों को जोड़कर सुंदर डिज़ाइन बनाए जाते हैं। निसार के साथ लगभग 15 से ज़यादा कारीगर इस अनोखी कला को संजोए रखने के लिए मेहनत कर रहे हैं।

सय्यद निसार के लिए wood inlay art सिर्फ़ एक पेशा नहीं, बल्कि एक जुनून है। उनके बनाए चित्रों में राम, कृष्ण, गणेश, इस्लामी संस्कृति और ईसाई धर्म का संगम देखने को मिलता है। इस कला में धार्मिक एकता और भारत की विविधता की झलक मिलती है। निसार का मानना है कि कला सीमाओं से परे होती है और यही संदेश वो अपनी कलाकृतियों के ज़रिए देते हैं।

अगरबत्ती से कला तक का सफ़र

सय्यद निसार पहले अगरबत्ती बनाने का काम करते थे। जब इस काम में मंदी आई, तो एक दोस्त ने उन्हें लकड़ी की इनले कला सीखने की सलाह दी। निसार ने लगभग एक साल तक इस कला को सीखा और तब से वो इसे अपनी आजीविका बना चुके हैं। उनका कहना है कि कर्नाटक के मैसूरु में गणेश और कृष्ण बहुत माना जाता है, इसलिए यहां इनकी कलाकृतियों की मांग है।

wood inlay art की ख़ासियत ये है कि इसमें अलग-अलग तरह की लकड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है। एक छोटी पेंटिंग को तैयार करने में लगभग दो दिन लगते हैं, जबकि बड़ी पेंटिंग में एक महीने से ज़यादा समय लग सकता है। इस कला में लगभग 15 से 20 तरह की लकड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है, जो इसके डिज़ाइन में जान डाल देती हैं।

धार्मिक एकता और साम्प्रदायिक सौहार्द

निसार बताते हैं कि इस कला में न सिर्फ़ हिंदू देवी-देवताओं की छवियां बनाई जाती हैं, बल्कि मुस्लिम और ईसाई समुदाय के प्रतीक भी उकेरे जाते हैं। वो कहते हैं कि उनके काम को लेकर कभी किसी ने सवाल नहीं उठाया। चाहे वे मुंबई, हरियाणा, पुणे या उत्तर प्रदेश में एग्ज़ीबिशन लगाई हों, किसी ने ये नहीं पूछा कि एक मुस्लिम होकर वो हिंदू देवी-देवताओं की पेंटिंग क्यों बना रहे हैं। उनका मानना है कि कला का कोई धर्म नहीं होता।

wood inlay art प्रति नई पीढ़ी की घटती रूचि

निसार के दो बेटे हैं, लेकिन वो इस कला को नहीं सीखना चाहते। निसार मानते हैं कि नई पीढ़ी को wood inlay art में रुचि नहीं है। उनका कहना है कि आजकल लोग इस कला का महत्व नहीं समझ पाते, इसलिए इसकी मार्केटिंग भी कम हो गई है। यही कारण है कि वो अलग-अलग राज्यों में जाकर इस कला को बेचते हैं, ताकि लोग इसकी गहराई और मेहनत को समझ सकें। सय्यद निसार के अनुसार, wood inlay art केवल एक कला नहीं बल्कि समाज में भाईचारे और एकता का प्रतीक है। वो कहते हैं कि कला से समाज में सौहार्द्र बढ़ता है। चाहे कोई भी धर्म या समुदाय हो, कला एक सेतु का काम करती है।

सरकारी सहयोग और समाज का योगदान निसार बताते हैं कि सरकार ने उन्हें और उनके जैसे अन्य कारीगरों को रहने के लिए घर भी दिए हैं। उनका मानना है कि wood inlay art के प्रति जागरूकता बढ़ाने की ज़रूरत है। उनके मुताबिक, जो लोग इस कला को समझते हैं, वही इसकी कद्र करते हैं। सय्यद निसार के लिए wood inlay art एक कला ही नहीं, बल्कि एक संदेश है—भाईचारे का, एकता का और कला के प्रति समर्पण का। वे चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी भी इस कला को अपनाए और इसके महत्व को समझे। निसार का सपना है कि उनकी कला आने वाली पीढ़ी तक पहुंचे और यह पारंपरिक कला ज़िंदा रहे।

ये भी पढ़ें: असम का अनमोल खज़ाना: अगरवुड (Agarwood) और ज़हीरुल इस्लाम की मेहनत

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