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मिट्टी, ब्रॉन्ज़ और कला: Biju Kumar Das की मूर्तियों से बयां होती है पूर्वोत्तर की शान

कला की दुनिया में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जिनकी रचनाएँ न सिर्फ़ ख़ूबसूरत होती हैं बल्कि उनमें आत्मा का भी वास होता है। पूर्वोत्तर भारत के प्रसिद्ध मूर्तिकार Biju Kumar Das ऐसे ही कलाकार हैं। बीजू के हाथों में वो जादू है, जो साधारण सी मिट्टी, ब्रॉन्ज़ और धातु को जीवंत कृतियों में बदल देता है।

कला का केंद्र: Biju Kumar Das का स्टूडियो

गुवाहाटी से लगभग 40 किलोमीटर दूर मिर्ज़ा के बरिहाट गांव में स्थित Biju Kumar Das का स्टूडियो किसी कला तीर्थ से कम नहीं है। चारों ओर मूर्तियों से घिरा स्टूडियो Biju के क्रिएटिविटी और कला की साधना का गवाह है। यहाँ मिट्टी से बनी बिहू नर्तकों की मूर्तियाँ बिना किसी तस्वीर के बनाई जाती हैं। बीजू अपनी ‘मन की आँखों’ से इन मूर्तियों को आकार देते हैं।

जब DNN24 की टीम उनके स्टूडियो पहुंची तो Biju Kumar Das मूर्तियां बना रहे थे, जो कुछ अलग थी। तब उन्होंने बताया कि ‘असम की परंपरा में जब किसी कार्यक्रम या मेहमान का स्वागत होता है तो दो कलाकार होते हैं, गायन जो शंकर देव के गीत गाते हैं और बायन जो ढोल बजाकर समा बांधते हैं।’ इसी परंपरा को उन्होंने उन मूर्तियों में उकेरा था।

ब्रॉन्ज़ की कला में बेजोड़

Biju Kumar Das हर तरह की मूर्तियां बनाने में माहिर हैं, लेकिन पूरे पूर्व उत्तर में ब्रॉन्ज़ की मूर्तियां बनाने में उनका कोई सारी नहीं। वो अब तक सैकड़ों मूर्तियां बना चुके हैं। पूर्वोत्तर के राज्यों में ब्रॉन्ज़ की मूर्तियाँ बनाने में उनका कोई सानी नहीं है। असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर और पश्चिम बंगाल में उनकी मूर्तियाँ शोभा बढ़ा रही हैं। उनकी कला का जादू केवल ब्रॉन्ज़ तक ही सीमित नहीं है, बल्कि बांस, टेराकोटा, हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग, कढ़ाई और मुखौटे बनाने में भी वो निपुण हैं।

असम आंदोलन: शहीदों को मूर्तियों में अमर करने का प्रयास

जब DNN24 उनके स्टूडियो पंहुचा तो स्टूडियो में एक और मूर्ति ने हमारा ध्यान खींचा ये थी- डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की 12 फीट ऊंची मूर्ति, जो बनकर पूरी तरह तैयार नहीं हुई थी। उन्होंने कहा, “ये तो हमारे संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराम अंबेडकर। Biju का सबसे चुनौतीपूर्ण और भावनात्मक प्रोजेक्ट असम आंदोलन के 855 शहीदों की मूर्तियाँ बनाना हैं। इन शहीदों में से केवल 152 की तस्वीरें ही मौजूद हैं। बाकी मूर्तियाँ परिवार के सदस्यों से बात कर, कल्पना के आधार वो बना रहे हैं। बीजू का कहना हैं, “असम को कुछ देकर जाना है, यह मेरा कर्तव्य है।”

संघर्ष से सफलता तक

Biju की कला का सफ़र आसान नहीं था। 1993 में गुवाहाटी के गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स से बैचलर ऑफ फाइन आर्ट्स और 2003 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से मास्टर इन फाइन आर्ट्स की डिग्री लेने के बावजूद उन्हें शुरुआत में काम नहीं मिला। एक स्कूल में बच्चों को आर्ट सिखाते हुए उन्होंने अपनी कला का अभ्यास जारी रखा। 2011 में एक ब्रांज़ की मूर्ति का ऑर्डर मिला, जिसने उनकी कला के सफ़र को नया मोड़ दिया। Biju वेस्ट मटेरियल से भी कई तरह के चीज़े बनाते हैं। Biju का एक अनोखा प्रोजेक्ट मेक इन इंडिया स्कीम के तहत बना ‘गैंडा और मोर’ है, जिसे कबाड़ से बनाया गया है।

कला की नई पीढ़ी

Biju का स्टूडियो अब एक बड़ा कला केंद्र बन चुका है। उनकी टीम में उनके शागिर्द भी शामिल हैं, जो कला के इस अद्भुत सफ़र में उनका साथ दे रहे हैं। Biju का मानना है कि कला केवल मूर्तियाँ बनाना नहीं है, बल्कि समाज और संस्कृति को एक नई दिशा देना भी है। उनके शागिर्द कमल कालिता कहते हैं कि “पहले हम ड्राइंग कर लेते हैं फिर जैसे हमारे दिमाग में जो आता है, उसी तरह से ड्राइंग कर लेते हैं। उसके बाद बनाते हैं और आख़िर में फिनिशिंग देते हैं।”

Biju Kumar Das एक ऐसा नाम जो अब सिर्फ़ असम तक सीमित नहीं है। वो कला के ज़रिए ना सिर्फ़ इतिहास रच रहे हैं बल्कि दूसरों को भी एक दिशा दे रहे हैं। उनका स्टूडियो सिर्फ़ एक वर्कशॉप नहीं बल्कि एक सपना है, जो मिट्टी धातु और कल्पना से गढ़ा गया है।

ये भी पढ़ें: असम का अनमोल खज़ाना: अगरवुड (Agarwood) और ज़हीरुल इस्लाम की मेहनत

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