Wednesday, April 8, 2026
25.1 C
Delhi

मयकश अकबराबादी: फ़लसफ़ा, मौसीक़ी और शायरी का दिलनशीं सफ़र

उर्दू अदब और सूफ़ियाना रिवायत में ‘मयकश’ अकबराबादी एक ऐसा नाम है, जो अपनी सादगी, इल्म और गहराई के लिए जाना जाता है। आपका असली नाम सय्यद मोहम्मद अली शाह था और “मयकश” आपका तख़ल्लुस। आपकी पैदाइश 1902 में अकबराबाद (आगरा) के मेवा कटरा इलाके में हुई।

आपका ख़ानदान इल्मी और रूहानी विरासत से जुड़ा हुआ था। आपके पूर्वज सय्यद इब्राहीम क़ुतुब मदनी मुग़ल बादशाह जहांगीर के दौर में मदीना मुनव्वरा से हिन्दुस्तान आए और यहीं बस गए। यही रूहानी सिलसिला आगे चलकर ‘मयकश’ की शख़्सियत में भी झलकता है।

तालीम और परवरिश

‘मयकश’ की ज़िंदगी में बचपन ही से मुश्किलात आईं। उनके वालिद सय्यद असग़र अली शाह का इंतिक़ाल उनकी कमसिनी में ही हो गया था। इसके बाद उनकी वालिदा ने ही उनकी परवरिश और तालीम की पूरी ज़िम्मेदारी उठाई।

उनकी मां एक समझदार और इल्म-परस्त ख़ातून थीं। उन्होंने अपने बेटे की तालीम के लिए बेहतरीन उस्तादों का इंतज़ाम किया, जिनमें मौलवी अब्दुल मजीद जैसे आलिम शामिल थे। ‘मयकश’ ने अपनी शुरुआती और मिडिल तालीम बड़ी मेहनत और लगन से पूरी की।

बाद में उन्हें मदरसा आलिया, आगरा में दाख़िला मिला, जहां उन्होंने दीन और दुनिया दोनों तरह की तालीम हासिल की। उन्होंने क़ुरआन, हदीस के साथ-साथ दर्शन और आधुनिक शिक्षा में भी महारत हासिल की। अपनी ख़ानदानी रिवायत के मुताबिक वे सज्जादा-नशीन भी बने।

शादी और ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव

‘मयकश’ की पहली शादी महज़ 17 साल की उम्र में सिद्दीकी बेग़म से हुई। यह रिश्ता लंबे समय तक चला, लेकिन 1937 में सिद्दीकी बेग़म का इंतिक़ाल हो गया। इसके बाद उन्होंने दूसरी शादी आसिफ़ जहां से की, लेकिन यह रिश्ता ज़्यादा दिन नहीं चल सका। दोनों के बीच तालमेल न बन पाने की वजह से अलगाव हो गया और आसिफ़ जहां पाकिस्तान चली गईं, जहां उनका इंतिक़ाल हुआ।

इन तमाम हालात के बावजूद ‘मयकश’ ने अपनी ज़िंदगी को इल्म, इबादत और शायरी में लगाए रखा।

सूफ़ियाना मिज़ाज और इल्मी मक़ाम

‘मयकश’ अकबराबादी क़ादरी-नियाज़ी सिलसिले से ताल्लुक रखते थे और सुन्नी-उल-हनफ़ी सूफ़ी अक़ीदे के मानने वाले थे। वे अपने दौर के बड़े इल्मी और रूहानी बुज़ुर्गों में शुमार होते हैं। लेकिन उनकी सोच पारंपरिक पीरों से कुछ अलग थी। वे रिवायतों में बंधे रहने के बजाय अपने तजुर्बे और इल्म की बुनियाद पर बात करते थे। यही वजह है कि उनकी शख़्सियत में एक आज़ाद ख़्याली और गहराई नज़र आती है।

मौसीक़ी से लगाव

‘मयकश’ को बचपन से ही मौसीक़ी का शौक था। ख़ासतौर पर सितार बजाना उन्हें बेहद पसंद था। कहा जाता है कि जब भी उन्हें कोई ग़ज़ल लिखनी होती, वे सितार उठाकर बैठ जाते और उसकी धुन पर शेर खुद-ब-खुद ढल जाते।

इसके अलावा उन्हें दर्शनशास्त्र में भी गहरी दिलचस्पी थी। बहस और मुबाहिसा उनका पसंदीदा शौक था, जिससे उनकी सोच और तर्क शक्ति और भी मज़बूत हुई।

शायरी का अंदाज़ और फ़िक्र

‘मयकश’ का दौर उर्दू ग़ज़ल के लिए बहुत अहम था। उस वक़्त हसरत मोहानी, असगर गोंडवी, फ़ानी बदायूनी और जिगर मुरादाबादी जैसे बड़े शायर अपने-अपने अंदाज़ में शायरी कर रहे थे।

इसी दौर में ‘मयकश’ ने ख़ामोशी से अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी शायरी में तसव्वुफ़ का गहरा रंग मिलता है। उन्होंने वहदत-उल-वुजूद, फ़ना-बक़ा, हस्ती-नेस्ती जैसे पेचीदा सूफ़ियाना ख़यालात को भी बेहद आसान और दिलकश अंदाज़ में पेश किया। उनकी सबसे बड़ी खूबी यही है कि उन्होंने सूफ़ियाना मज़ामीन को भी ग़ज़ल की नज़ाकत और ख़ूबसूरती के साथ बयान किया।

‘मयकश’ अकबराबादी ने सिर्फ़ शायरी ही नहीं, बल्कि कई अहम किताबें भी लिखीं, जिनमें उनके इल्मी और रूहानी ख़्यालात साफ़ झलकते हैं। उनकी कुछ मशहूर किताबें हैं:

नक़द-ए-इक़बाल
नग़्मा और इस्लाम
मसाइल-ए-तसव्वुफ़
तौहीद और शिर्क
मयकदा
हज़रत ग़ौस-उल-आज़म
हरफ़-ए-तमन्ना
दास्तान-ए-शब

ये किताबें उनके गहरे इल्म और सूफ़ियाना सोच का बेहतरीन नमूना हैं।

चुनिंदा अशआर

‘मयकश’ की शायरी में सादगी और असर दोनों मिलते हैं। उनके कुछ अशआर देखें:

जबीं पे उन की ये बिंदी का दाग़ क्या कहिए
है आफ़्ताब की ज़ीनत चराग़ क्या कहिए

ये माना ज़िंदगी में ग़म बहुत हैं
हंसे भी ज़िंदगी में हम बहुत हैं

तिरी ज़ुल्फ़ों को क्या सुलझाऊं ऐ दोस्त
मिरी राहों में पेच-ओ-ख़म बहुत हैं

इन अशआर में इश्क़, ज़िंदगी और फ़लसफ़े की ख़ूबसूरत झलक मिलती है।इंतिक़ाल और विरासत

इंतिक़ाल और विरासत

‘मयकश’ अकबराबादी का इंतिक़ाल 1991 में आगरा में हुआ। लेकिन उनकी शायरी, उनकी किताबें और उनकी सूफ़ियाना सोच आज भी ज़िंदा है।

‘मयकश’ अकबराबादी सिर्फ़ एक शायर नहीं थे, बल्कि एक रूहानी फ़िक्र के हामी, एक आलिम और एक सच्चे सूफ़ी थे। उन्होंने अपनी शायरी के ज़रिए न सिर्फ़ दिलों को छुआ, बल्कि तसव्वुफ़ जैसे गहरे विषय को भी आम लोगों तक पहुंचाया।

उनकी ज़िंदगी हमें यह सिखाती है कि अगर इंसान में लगन, सब्र और इल्म की तलाश हो, तो वह हर मुश्किल को पार कर सकता है और अपनी एक अलग पहचान बना सकता है।

ये भी पढ़ें: इक़बाल अशहर: “उर्दू है मिरा नाम…” से पहचान बनाने वाले शायर की अदबी दास्तान

आप हमें FacebookInstagramTwitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

इमदाद अली उलवी: रूहानियत और इश्क़-ए-हक़ीक़ी की दास्तान

उर्दू अदब और सूफ़ियाना रिवायत की दुनिया में हज़रत...

बलविंदर सिंह की पगड़ी (Turban): पंजाब से फ़िल्म ‘धुरंधर’ तक का सफ़र

भारत के बॉक्स ऑफिस पर इन दिनों फ़िल्म ‘धुरंधर:...

Punjab (पंजाब) में हौसले का स्वागत: नेपाल की महिला की साइकिल यात्रा

पंजाब जहां मेहमाननवाज़ी सिर्फ़ एक रिवाज़ नहीं, बल्कि दिल...

Topics

इमदाद अली उलवी: रूहानियत और इश्क़-ए-हक़ीक़ी की दास्तान

उर्दू अदब और सूफ़ियाना रिवायत की दुनिया में हज़रत...

बलविंदर सिंह की पगड़ी (Turban): पंजाब से फ़िल्म ‘धुरंधर’ तक का सफ़र

भारत के बॉक्स ऑफिस पर इन दिनों फ़िल्म ‘धुरंधर:...

Punjab (पंजाब) में हौसले का स्वागत: नेपाल की महिला की साइकिल यात्रा

पंजाब जहां मेहमाननवाज़ी सिर्फ़ एक रिवाज़ नहीं, बल्कि दिल...

Wildlife Rescue: एक ज़ख्मी चील ने कैसे बदल दी नदीम और सऊद की ज़िंदगी?

हर साल पतंगबाज़ी के दौरान जब आसमान रंग-बिरंगी पतंगों...

Related Articles

Popular Categories