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आशिक हुसैन श्रीनगर में संरक्षित कर रहे ‘रंगाई आर्ट’

भारत अपनी सभ्यता और संस्कृति के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। हर एक सूबा अपनी एक अलग और खास छवि पेश करता है। देश के सभी हिस्सों में अलग-अलग तरह की आर्ट्स देखने को मिलती हैं, जिनकी खूबसूरती की मिसाल देना नामुमकिन होता है। इन्ही आर्ट में धागों और कपड़ों को रंगने की कला हमारी सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा है। इस पारंपरिक कला को सदियों से बुज़ुर्गों ने सजाया और संवारा है। 

आशिक हुसैन का 100 साल पुराना कारखाना

नाइद कदल श्रीनगर के रहने वाले आशिक हुसैन पिछले 38 सालों से कपड़ों पर रंगाई का काम कर रहे हैं। उनका कारखाना 100 साल से ज्यादा पुराना है। उनका मानना है कि “आने वाली पीढ़ी शायद ही इस काम को आगे बढ़ा पाए। कई बच्चे इस काम के बारे में जानते भी नहीं हैं और ये बहुत मेहनत का काम भी है।”

आशिक हुसैन ने अपने पिता से कपड़ों पर रंगाई का काम बचपन से सीखा है। इस काम को आज चौथी पीढ़ी के रूप में आशिक हसैन कर रहे हैं और वो इस अनमोल धरोहर को बचाने के लिए जद्दोजहद में लगे हैं। उन्होने DNN24 को बताया कि ये काम पीढ़ी दर पीढ़ी चलता आ रहा है। उनके बड़े भाई भी ये काम करते थे लेकिन सेहत ठीक नहीं होने की वजह से वो ये काम नहीं करते हैं। 

आशिक बताते हैं कि साउथ में इस काम के बड़े बड़े कारखाने है। “धीरे धीरे ये काम कश्मीर आया क्योंकि यहां शॉल पर धागों से कढ़ाई होती है। शॉल के अलावा कई अलग-अलग कपड़ों पर हाथों से कढ़ाई की जाती है जिसमे धागों का इस्तेमाल होता है।”वो अलग-अलग रंग से रंगाई करते है उसके बाद कारीगरों के पास भेजा जाता है। फिर आगे जाकर सूट, शॉल, गर्म कपड़े बनाएं जाते हैं। 

आशिक हुसैन के पास मुख़्तलिफ़ तरह के धागों के नमूने मौजूद हैं, धागों के रंग से रंग मिलाकर डाई तैयार करते हैं। इन धागों का इस्तेमाल कश्मीर की कई हैंडीक्राफ्ट्स चीज़ों को बनाने में किया जाता है। 

बढ़ते टेक्नोलॉजी के दौर में कैसे बदला डाई का प्रोसेस

वो बताते हैं कि इस इलाके में करीब 15 कारखाने थे। लेकिन समय के साथ साथ वह बंद हो गए और आज सिर्फ एक वाहिद कारख़ाना बचा है। देखा जाए तो पहले के मुकाबले इस काम में कई बदलाव आए है। “जैसे पहले नेचुरल डाई इस्तेमाल की जाती थी। उनकी प्रोसेस काफी लंबी हुआ करता था। टेक्नोलॉजी बढ़ने से इस काम में बदलाव आए है। अब डाई बाहर से आता है जो थोड़ा खतरनाक है। आज हम चाहे तो करीब 100 क्वंटल डाई निकाल सकते है। लेकिन पहले पांच से दस किलो डाई निकाल पाते थे।”

धागे की रंगाई का काम, एक लंबा प्रोसेस है। रासायनिक पदार्थों (chemical substances) कच्चे धागे को रंगीन धागे में बदल देता है। डाई करने के बाद धागों को पानी में धोया जाता है जिससे धागों का कच्चा रंग निकल जाता है फिर ड्रायर की मदद से धागों को सुखाया जाता है। आशिक हुसैन ने DNN24 से बात करते हुए कहा कि, अब सिर्फ़ ये काम धीरे धीरे कश्मीर से ख़त्म हो रहा है।

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