Saturday, March 7, 2026
29.1 C
Delhi

असम की हथकरघा परंपरा : जहां हर बुनावट में छिपी है संस्कृति, आजीविका और आत्मनिर्भरता

असम की समृद्ध संस्कृति और परंपरा का प्रतिबिंब उसकी हथकरघा बुनाई में देखा जा सकता है। ये न केवल राज्य के सबसे बड़े और प्राचीन कुटीर उद्योग का प्रतीक है, बल्कि ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा भी है। असम के गांवों में शायद ही कोई घर ऐसा होगा, जहां हथकरघा न हो। गुवाहाटी से लगभग 50 किलोमीटर दूर कामरूप ज़िले के सोरु हेरमदो गांव में हर घर से हथकरघे की आवाज़ सुनाई देती है। यहां की बुनाई न सिर्फ़ व्यवसायिक ज़रिया है, बल्कि ये असमिया लोगों के प्रेम और स्नेह का प्रतीक भी है।

भोगाली बिहू और बुनाई का पारंपरिक संबंध

असम के लोग हर साल जनवरी के दूसरे सप्ताह में भोगाली बिहू का त्योहार धूमधाम से मनाते हैं। इस पर्व के नजदीक आते ही ग्रामीण महिलाएं अपने करघों पर पारंपरिक परिधान, जैसे मेखला चादर और गमछे बनाने में जुट जाती हैं। यह त्योहार असम की संस्कृति और परंपरा का जीवंत उदाहरण है। सोरु हेरमदो गांव की गोकुली दास इस परंपरा को सहेजते हुए मेखला चादर और गमछा बुनती हैं। गोकुली के अनुसार, एक मेखला चादर की कीमत लगभग 1500 रुपये तक होती है। उनके जैसे कारीगर इन कपड़ों को ग्रामीणों को सस्ती कीमत पर बेचते हैं, जिससे न केवल यह परंपरा जीवित रहती है, बल्कि उनकी आय का भी स्रोत बनती है।

ग्रामीण महिलाओं की आत्मनिर्भरता

गांव की ज्योत्सना दास गमछा बुनने में माहिर हैं। वे रोज़ाना एक गमछा तैयार करती हैं और हर महीने दुकानदार को 20-30 गमछे बेच देती हैं। इससे उन्हें प्रति गमछा 250-280 रुपए मिलते हैं, जो उनकी आय का मुख्य साधन है। वहीं, बंदिता दास, जो खुद टीचर हैं, अपनी मां के बुने कपड़ों को बेचने में मदद करती हैं। उनकी मां न केवल परिवार के लिए, बल्कि गांव के अन्य लोगों के लिए भी मेखला चादर बुनती हैं।

हथकरघा का आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व

असम के हर घर में हथकरघा बुनाई को विशेष स्थान प्राप्त है। यह न केवल रोजगार का स्रोत है, बल्कि महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने का ज़रिया भी है। बंदिता की दोस्त मिंटू मोनी दास बताती हैं कि मेखला चादर बनाने की लागत 1000 रुपए तक आती है, लेकिन इसे खरीदने पर 1500-2000 रुपए तक खर्च करना पड़ता है। इसलिए, वे परिवार के कपड़े खुद ही बुनना पसंद करती हैं।

महिलाओं को रोज़गार का साधन, संस्कृति और आत्मनिर्भरता का संगम

असम की बुनाई परंपरा राज्य की संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और यह लाखों लोगों को, विशेष रूप से 60% महिलाओं को, रोजगार प्रदान करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में बुनाई को अतिरिक्त घरेलू काम के रूप में देखा जाता है, जो परिवार की आय बढ़ाने और जीवन स्तर सुधारने में मददगार है। असम में हथकरघा बुनाई न केवल रोजगार का जरिया है, बल्कि यह राज्य की संस्कृति और परंपरा को जीवित रखने का माध्यम भी है।

यह ग्रामीण महिलाओं के लिए आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतीक है और असम की पहचान का एक अहम हिस्सा है। हथकरघा की यह परंपरा आधुनिकता के दौर में भी अपनी चमक बनाए हुए है और असम के हर कोने में इस सांस्कृतिक धरोहर को सहेजा जा रहा है।

ये भी पढ़ें: गृहणी से बिजनेस वुमन बनने का सफर: असम की तनया बोरकाकोटी की प्रेरक कहानी

आप हमें FacebookInstagramTwitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

पिता चलाते हैं ट्रक, बेटी Fairuz Fatima ने UPSC में दर्ज की कामयाबी

कभी सड़कों पर दिन-रात ट्रक चलाकर घर चलाने वाले...

कालीन कारोबारी की बेटी इरफ़ा शम्स अंसारी ने UPSC में AIR 24 हासिल कर रचा इतिहास

कभी-कभी छोटे कस्बों और गांवों से ऐसी कहानियां निकलती...

क़ुर्रतुलऐन हैदर: उर्दू अदब में ऐनी आपा का मुक़ाम और उर्दू फिक्शन की बेमिसाल आवाज़

कभी-कभी अदब की दुनिया में ऐसी शख़्सियतें जन्म लेती...

Topics

पिता चलाते हैं ट्रक, बेटी Fairuz Fatima ने UPSC में दर्ज की कामयाबी

कभी सड़कों पर दिन-रात ट्रक चलाकर घर चलाने वाले...

कैफ़ अहमद सिद्दीकी: मास्टर साहब बच्चों के दिल के शायर और समाज का आईना

कभी-कभी बड़े शहरों की चकाचौंध से दूर, छोटे कस्बों...

ज़ायके का सफ़रनामा: दम पुख़्त से दिल की बात, पुरानी रसोई का नया ज़माना

दम पुख़्त: इंडियन फूड लवर्स अब सिर्फ विदेशी व्यंजनों (Exotic recipes) का स्वाद नहीं लेना चाहते, बल्कि अपनी पुरानी रसोई की ओर लौटने लगे हैं। 'रूट्स की तरफ वापसी' (Return to the roots) का ये ट्रेंड न सिर्फ खाने के स्वाद को बदल रहा है, बल्कि हमारी सेहत को भी नया आयाम दे रहा है।

Related Articles

Popular Categories