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वे ख़ुशबू जिसे बादशाह ने सलाम किया:तख़्त से पहले कतरे ने दिल जीता,अस्मत बेगम का इत्र और नूरजहां का हुनर

दिल्ली, आगरा, इस्तांबुल..जहां भी गुलाब की खुशबू फैली, उसकी वजह एक औरत थी।

आपने ताजमहल देखा होगा लेकिन क्या जानते हैं कि उस संगमरमर की शान के पीछे एक खुशबू का राज़ दफन है? मुगल बादशाह जहांगीर की डायरी ‘तुज़ुक-ए-जहांगीरी‘  में एक कबूलनामा छुपा है। इस किताब में जंग के किस्से हैं, मौसम के हिसाब हैं और बीच में एक इकरार है:

‘इत्र-ए-जहांगीरी मेरे दौर की सबसे खूबसूरत चीज़ है।

और फिर वो लिखते हैं-ये मेरा कमाल नहीं, ये मेरी सास अस्मत बेगम का करिश्मा है।

image- pexels.com

जब एक मां ने हवा से खुशबू चुरा ली

अस्मत बेग़म का बचपन ईरान की सड़कों पर बीता। उनका खानदान गिर चुका था। वो और उनके शौहर मिर्ज़ा गयास बेग़, भूखे, बेघर, उम्मीद लिए हिंदुस्तान आए। रास्ते में एक बेटी पैदा हुई। नाम रखा मेहर-उन-निसा। यही लड़की बाद में बनी नूरजहां, रोशनी-ए-आलम। वो इकलौती मलिका जिसके नाम के सिक्के ढले, जिसके फरमान जारी हुए। लेकिन बेटी के ताज पहनने से पहले, मां ने एक जादू कर दिखाया।

अस्मत बेग़म (image- TheMadMughal)

वो सुबह जब गुलाब जल ने रोशनी बिखेर दी 

कहानी कुछ यूं है कि एक दिन अस्मत बेगम ने देखा कि गुलाब जल की सतह पर तेल की एक पतली परत तैर रही थी। गर्मी ने गुलाब के पत्तों का असली रूह बाहर निकाल दी थी। कोई और होता तो वो मैल समझकर हटा देता। लेकिन अस्मत बेगम ने उस कतरे को पहचाना। उसने वो तेल निकाला, संभाला, साफ़ किया। और जो बना, वो इतना गाढ़ा, इतना रूहानी था कि एक बूंद में पूरा बाग़ समा जाता था। जहांगीर उस कतरे का  दीवाना हो गया। उसने लिखा-’ये खुशबू मुर्दा दिलों को ज़िंदा कर देती है।’

नूरजहां ने खुशबू को दी शाही सनद

बेटी नूरजहां ने ये इत्र-ए-जहांगीरी लिया और उसे शाही अंदाज़ दिया। उसने गुलाबों को ठंडे बर्तनों में उतारा, शरबत में घोला, महफ़िलों में बिखेरा। वो जहां बैठती, खुशबू पहले जाती। मां की नोटिस करने की आदत और बेटी के फैलाने के हुनर ने मिलकर एक सौग़ात छोड़ी जो 400 साल बाद भी महक रही है।

नूरजहां (Image-wikipedia)

अस्मत बेगम की कब्र… और ताजमहल का किस्सा

आज अस्मत बेगम आगरा में इतिमाद-उद-दौला के मकबरे में दफ्न हैं। ये वही नगीना है जिसे नूरजहां ने अपने अब्बू के लिए बनवाया। बहुत लोग कहते हैं कि यही ताजमहल की रिहर्सल है। और हैरानी की बात? अस्मत बेगम की पोती थीं मुमताज महल। जिसके लिए शाहजहां ने ताज बनवाया। यानी वही खून जिसने इत्र बनाया, वही खून दुनिया के सबसे प्यारे मकबरे के पीछे है। 

अत्तर बनाने वाली भट्टी (Image-kannaujattar)

600 साल बाद भी… वही महक

तारीख़ के किताबों में बादशाहों के नाम हैं। लेकिन असली ज़िंदगी को महकाने वाली औरतों के नाम कम ही मिलते हैं। अस्मत बेगम एक पनाहगुज़ार थीं। ईरान से भागी हुई। कोई तख़्त नहीं था उनके पास। सिर्फ एक नज़र थी। और उसी नज़र ने तय कर दिया कि अगली चार सौ साल तक, जब भी कोई गुलाब का इत्र लगाएगा, वो दरअसल अस्मत बेगम की सूफियाना खोज को सलाम करेगा।

ये परंपरा खत्म नहीं हुई। आज भी उत्तर प्रदेश का शहर कन्नौज इसी “Hydro-distillation” (भाप से खुशबू निकालने) की तकनीक पर चल रहा है।

  • आज का कन्नौज: यहां 300 से ज़्यादा परफ्यूम यूनिट्स हैं। कहा जाता है कि यहां की गलियों और नालियों तक में गुलाब और मोगरे की महक होती है। 
  • कैसे बनता है इत्र: पारंपरिक तरीका ये है कि मिट्टी के बर्तनों और तांबे के देग (भट्टी) में फूलों को उबाला जाता है, फिर उस भाप को ठंडे भापका (कंडेंसर) में इकट्ठा किया जाता है। 400 किलो गुलाब से महज़ 180 ग्राम रूह गुलाब निकलती है। 
  • कन्नौज का कनेक्शन: कहते हैं कि, इत्र बनाने का ये बिज़नेस यहां नूरजहां की वजह से ही शुरू हुआ। 
image- pexels.com

अगली बार जब आपकी नाक तक गुलाब की खुशबू पहुंचे, तो रुकिए। ये सिर्फ खुशबू नहीं है। ये एक मां-बेटी का हौसला है, एक मुहाजिर का फ़न है, और हिंदुस्तान के सबसे ख़ूबसूरत शाही दौर का वो राज़ है जो किसी किताब में नहीं बल्कि हवा में लिखा गया।

ये भी पढ़ें:   ‘ऐब-ए-रवां’ से ‘बाफ़्त-हवा’ तक : वो भारतीय शान जिसने मुगलों को दीवाना बनाया, मलमल जिसे देख यूरोप हैरान रह गया

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