उर्दू शायरी की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जो सिर्फ़ अपने कलाम की वजह से नहीं, बल्कि अपनी ख़ास अदबी विरासत की वजह से भी याद किए जाते हैं। ऐसा ही एक नाम है तअशशुक़ लखनवी का। उनका असली नाम सय्यद मीरज़ा था, लेकिन अदबी दुनिया में वो तअशशुक़ लखनवी के नाम से मशहूर हुए।
तअशशुक़ लखनवी, उर्दू के महान मर्सिया निगार Mir Anees के पोते थे। जिस घर में शायरी सांस लेती हो, जहां अल्फ़ाज़ों की परवरिश होती हो, वहां पैदा होने वाला शख़्स शायरी से दूर कैसे रह सकता था। यही वजह है कि तअशशुक़ ने बचपन से ही अदब और शायरी की दुनिया को बेहद क़रीब से देखा।
हालांकि उनके दादा मीर अनीस मर्सिये के बेमिसाल शायर थे, लेकिन तअशशुक़ ने केवल मर्सिये तक ख़ुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने ग़ज़ल में भी अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी शायरी में लखनऊ की तहज़ीब, नफ़ासत, ज़बान की मिठास और एहसास की गहराई साफ़ दिखाई देती है।
उनकी शायरी का सबसे ख़ास पहलू यह है कि वह मुश्किल अल्फ़ाज़ों का सहारा नहीं लेते। उनके अशआर सीधे दिल तक पहुंचते हैं।
“मैं बाग़ में हूं तालिब-ए-दीदार किसी का
गुल पर है नज़र, ध्यान में रुख़्सार किसी का”
इस शेर में एक आशिक़ की बेचैनी और इंतज़ार की कैफ़ियत बेहद ख़ूबसूरती से सामने आती है। इश्क़ और जुदाई के एहसास उनकी ग़ज़लों में बार-बार दिखाई देते हैं। उनका यह मशहूर शेर आज भी लोगों की ज़ुबान पर रहता है।
“हम किस को दिखाते शब-ए-फ़ुर्क़त की उदासी
सब ख़्वाब में थे, रात को बेदार हमीं थे”
यह शेर उस तन्हाई का बयान है, जिसे हर वह इंसान महसूस कर सकता है जिसने कभी किसी की जुदाई झेली हो। तअशशुक़ की शायरी में दर्द है, लेकिन वह शोर नहीं मचाता। वह धीरे-धीरे दिल में उतरता है। उनका यह शेर इसकी बेहतरीन मिसाल है।
“जिस तरफ़ बैठते थे वस्ल में आप
उसी पहलू में दर्द रहता है”
महज़ दो मिसरों में मोहब्बत, याद और जुदाई का पूरा मंज़र खींच देना हर शायर के बस की बात नहीं होती। उनकी शायरी में कभी-कभी हल्की सी शोख़ी और नज़ाकत भी दिखाई देती है।
“वो खड़े कहते हैं मेरी लाश पर
हम तो सुनते थे कि नींद आती नहीं”
यह शेर अपने अंदाज़-ए-बयान की वजह से आज भी मुशायरों में पसंद किया जाता है।
तअशशुक़ लखनवी की एक और ख़ासियत उनकी ज़बान की सफ़ाई थी। उनके अशआर में न बनावट है और न ही बेवजह की पेचीदगी। शायद यही वजह है कि डेढ़ सौ साल बाद भी उनके शेर पढ़ने वाले के दिल में जगह बना लेते हैं।
उनका यह शेर ज़िंदगी की नापायदारी और मौसमों के बदलते मिज़ाज का बड़ा ख़ूबसूरत बयान है।
“आमद आमद है ख़िज़ां की, जाने वाली है बहार
रोते हैं गुलज़ार के दर, बाग़बां खोले हुए”
इस शेर में सिर्फ़ मौसम का ज़िक्र नहीं, बल्कि ज़िंदगी की बदलती सूरतों और बिछड़ते लम्हों का एहसास भी छुपा है।
साल 1892 में तअशशुक़ लखनवी इस दुनिया से रुख़्सत हो गए, लेकिन उनका कलाम आज भी उर्दू अदब की महफ़िलों में ज़िंदा है। उन्होंने यह साबित किया कि अच्छी शायरी सिर्फ़ बड़े-बड़े ख़यालात का नाम नहीं, बल्कि सच्चे जज़्बात को सादगी और ख़ूबसूरती से बयान करने का फ़न भी है।
तअशशुक़ लखनवी उन शायरों में शुमार होते हैं जिनकी ग़ज़लों में मोहब्बत है, दर्द है, नफ़ासत है और लखनऊ की तहज़ीब की ख़ुशबू भी। यही वजह है कि उनका नाम उर्दू शायरी के इतिहास में हमेशा अदब और एहतराम के साथ लिया जाएगा।
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