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माह-ए-रमज़ान में तीन अशरे होते है, जानिए हर अशरे की क्या हैं अहमियत

इस वक़्त रमज़ान का मुक़द्दस महीना चल रहा है। 23 मार्च को चांद के दीदार के साथ हिंदुस्तान में 24 मार्च से रमज़ान के महीने की शुरुआत हो गई है। रमज़ान में 29 या 30 रोज़े रखे जाते है। इस्लाम के मुताबिक, इन तीस दिनों को तीन भागों में बांटा गया है, जिसे अशरा कहा जाता है। इस तरह रमज़ान का महीना तीन अशरों में बंटा हुआ है। हर अशरे की अलग फ़ज़ीलत है।

अशरा अरबी का शब्द है, जिसका मतलब 10 होता है। इस तरह रमज़ान के महीने के 30 दिनों को 10-10 दिनों में बांटा गया है। जिन्हें पहला अशरा, दूसरा अशरा और तीसरा अशरा कहा जाता है। शुरुआती 10 दिन पहला अशरा कहलाते हैं, 11वें दिन से 20वें दिन तक दूसरा अशरा और 21वें दिन से 29वें या 30वें दिन तक तीसरा अशरा होता है।

रमज़ान का पहला अशरा (First Stage of Ramzan- ‘Mercy’)

रमज़ान महीने के शुरूआती 10 दिन को पहला अशरा कहते है। ये अशरा रहमत का होता है। रमज़ान के पहले अशरे में मुसलमानों को ज़्यादा से ज़्यादा गरीबों की मदद करनी चाहिए। 

दूसरा अशरा (Second Stage of Ramzan ‘Forgiveness’)

रमज़ान के 11वें रोज़े से 20वें रोज़े तक दूसरा अशरा चलता है यह अशरा मग़फिरत यानी माफ़ी का होता है। इसमें अल्लाह की इबादत करते हुए अपने गुनाहों की माफ़ी मांगते है।

रमज़ान का तीसरा अशरा (Third Stage of Ramzan ‘Nijat)

रमज़ान का तीसरा और आख़िरी अशरा 21वें रोजे़ से शुरू होकर चांद के हिसाब से 29वें या 30वें रोजे़ तक चलता है। तीसरे अशरे को बेहद अहम माना गया है। ये जहन्नम यानी नर्क की आग से खुद को बचाने के लिए है।

रमज़ान के आखिरी अशरे में बहुत से मुस्लिम मर्द और औरतें ए’तिकाफ़ में बैठते हैं। ए’तिकाफ़ में बैठने वाले लोगों पर अल्लाह की मख़सूस रहमत होती है। ए’तिकाफ़ के दौरान 10 दिनों तक एक ही जगह पर सोते व खाते और नमाज़ अदा करते हैं। मुस्लिम पुरूष मस्जिद के कोने में 10 दिनों तक एक जगह बैठकर अल्लाह की इबादत करते हैं, जबकि मुस्लिम महिलाएं घर के किसी कमरे में पर्दा लगाकर ए’तिकाफ़ में बैठती हैं। इस दौरान वह जहन्नम से बचने के लिए अल्लाह से दुआ करते हैं।

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