Saturday, September 5, 2026
27 C
Delhi

Teachers’ Day Special: 100 साल के Ghasiram Verma की आधी पेंशन बेटियों की शिक्षा के नाम, अब तक 12 करोड़ दिए

किसी ने अपनी पूरी ज़िंदगी गणित के सवालों को समझने में लगाई, तो किसी ने उसी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा बेटियों की तालीम के लिए लगा दिया। राजस्थान के ज़िले झुंझुनूं के Dr Ghasiram Verma (डॉ. घासीराम वर्मा) की कहानी कुछ ऐसी ही है। उम्र 100 साल हो चुकी है, लेकिन बेटियों को पढ़ाने का उनका जज़्बा आज भी बरकरार है। लड़कियों के एजुकेशन के लिए वो अब तक 12 करोड़ रुपये से ज़्यादा दान कर चुके हैं और आज भी अपनी आधी पेंशन शिक्षा के काम में लगा रहे हैं।

Dr Ghasiram Verma (डॉ. घासीराम वर्मा) कहते हैं कि लड़कियों को पढ़ाना उतना ही ज़रूरी है, जितना लड़कों को। उनका मानना है कि हर बच्चे को पढ़ने का हक़ मिलना चाहिए। लेकिन उनकी नज़र में तालीम का मतलब सिर्फ़ डिग्री हासिल करना नहीं है। बेटियों को ऐसा हुनर मिलना चाहिए, जिससे वो अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। यही सोच उनके लंबे सफ़र की बुनियाद रही है।

Source: PB SHABD

चार दशक पहले शुरू हुआ सफ़र

बेटियों की तालीम को लेकर Dr Ghasiram Verma (डॉ. घासीराम वर्मा) की कोशिश करीब 40 साल पहले शुरू हुई। उस वक़्त एक बालिका संस्था की शुरुआत की गई थी। आज ये संस्था काफी फैल चुकी है। इस सफ़र में Dr Ghasiram Verma (डॉ. घासीराम वर्मा) ने अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा लड़कियों की पढ़ाई के लिए खर्च किया। स्कूल-कॉलेज से लेकर हॉस्टल, चैरिटेबल ट्रस्ट और होनहार लड़कियों की स्कॉलशिप तक, शिक्षा से जुड़े अलग-अलग कामों में उन्होंने आर्थिक मदद की। बालिका शिक्षा के लिए 12 करोड़ रुपये से ज़्यादा देने के बाद भी उनकी खिदमत का सिलसिला थमा नहीं। उन्होंने अपनी संपत्ति का भी एक हिस्सा शिक्षा के नाम कर दिया।

दान किया अपना मकान

नगर परिषद के सामने बना अपना मकान उन्होंने शिक्षा सेवा समिति को दान कर दिया। उनके इस कदम को करीब से देखने वाले लोग आज भी उनके योगदान को याद करते हैं। डॉ. रामस्वरूप जाखड़ कहते हैं कि डॉ. घासीराम वर्मा का योगदान ज़िंदगीभर नहीं भुलाया जा सकता। उन्होंने पूरे राजस्थान के लिए काम किया और अपनी संपत्ति भी दान कर दी। डॉ. वर्मा के लिए शायद यही उनकी ज़िंदगी का सबसे अहम फलसफा है, जो मिला, उसे समाज को वापस करना।

आज जब पढ़ाई और रोज़गार की दुनिया तेज़ी से बदल रही है, डॉ. वर्मा बेटियों की तालीम को भी नए दौर के हुनर से जोड़कर देखते हैं। उनका कहना है कि बेटियों को सिर्फ़ किताबी ज्ञान नहीं मिलना चाहिए। उन्हें स्किल डेवलपमेंट और तकनीकी ट्रेनिंग भी दी जानी चाहिए। कोडिंग, तकनीक, कारोबार और दूसरे आधुनिक हुनर उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने में मदद कर सकते हैं। उनका संदेश साफ है बेटियों को सिर्फ़ डिग्री न दें, बल्कि ऐसा हुनर दें कि वे नौकरी मांगने वाली नहीं, नौकरी देने वाली बनें।

Source: PB SHABD

बेटियां पढ़ीं तो बदली सोच

Dr Ghasiram Verma (डॉ. घासीराम वर्मा) के मुताबिक पिछले 100 सालों में समाज में आया सबसे अच्छा बदलाव बेटियों की तालीम के क्षेत्र में हुआ है। जब बेटियां पढ़ीं तो सिर्फ़ उनकी ज़िंदगी नहीं बदली, बल्कि परिवारों की सोच भी बदली। उनकी आर्थिक हालत बेहतर हुए और बेटियों ने समाज के अलग-अलग मैदानों में अपनी जगह बनाई। आज बेटियां प्रशासन, शिक्षा, चिकित्सा, राजनीति और कारोबार समेत हर फील्ड में आगे बढ़ रही हैं। डॉ. वर्मा चाहते हैं कि अब इस सफ़र को आगे बढ़ाया जाए और बेटियों को पढ़ाई के साथ तकनीक और हुनर भी दिया जाए।

Dr Ghasiram Verma (डॉ. घासीराम वर्मा) को उनके काम के लिए राज्य और जिला स्तर पर सम्मान भी मिल चुका है। लेकिन उनकी असल पहचान उन कामों से है, जिन्हें उन्होंने बेटियों की तालीम के लिए किया। 12 करोड़ रुपये से ज़्यादा का सहयोग, अपनी संपत्ति दान करना और आज भी आधी पेंशन एजुकेशन के लिए देना। ये सब उनकी सोच को बयां करता है। उनकी ज़िंदगी का फलसफा भी सीधा है ‘जितना लो, उतना समाज को लौटा दो।’ और शायद इसी एक सोच में डॉ. घासीराम वर्मा की पूरी ज़िंदगी का सार छिपा है।

ये भी पढ़ें: गरीब बच्चों को प्लास्टिक के बदले मुफ़्त शिक्षा दे रहा नीरजा फुटपाथ स्कूल

आप हमें FacebookInstagramTwitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सब्सक्राइब कर सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

हसरत मोहानी: जब इंक़लाब के शायर को भा गई कान्हा की बांसुरी

कृष्ण को देखने और समझने के अंदाज़ अलग-अलग हो...

त्रिपुरा की रिसा: जो बुनती है इतिहास, संजोती है पहचान और बिखेरती है चमक

नॉर्थ ईस्ट भारत के हरे-भरे पहाड़ों में बसा त्रिपुरा,जहां...

कृष्ण एक नाम, कई नज़रिए… जब उर्दू शायरों ने कान्हा को अपने अल्फ़ाज़ में उतारा

कृष्ण सिर्फ़ एक धार्मिक आस्था का नाम नहीं हैं।...

Topics

हसरत मोहानी: जब इंक़लाब के शायर को भा गई कान्हा की बांसुरी

कृष्ण को देखने और समझने के अंदाज़ अलग-अलग हो...

त्रिपुरा की रिसा: जो बुनती है इतिहास, संजोती है पहचान और बिखेरती है चमक

नॉर्थ ईस्ट भारत के हरे-भरे पहाड़ों में बसा त्रिपुरा,जहां...

संगरूर का Banasar Bagh Museum! जींद रियासत की शानदार विरासत

पंजाब की ज़मीन अपने समृद्ध इतिहास, बहादुरी की दास्तानों,...

Related Articles

Popular Categories