23 जुलाई भारतीय आज़ादी की लड़ाई के एक ऐसे वतनपरस्त की याद दिलाता है, जिसका नाम शायद इतिहास की किताबों में उतना मशहूर नहीं है, जितना होना चाहिए। ये नाम है Subramaniya Siva (सुब्रमणिया शिवा) का। एक ऐसे आज़ादी के दीवाने, जिन्होंने अंग्रेज़ों की जेल, बीमारी और तकलीफ़ों के सामने कभी घुटने नहीं टेके। आख़िरी सांस तक उनकी ज़िंदगी सिर्फ़ एक मक़सद के लिए थी “भारत की आज़ादी और अपनी मातृभाषा तमिल की हिफ़ाज़त।”
वो तनित्तमिल इयक्कम के समर्थक थे , जो एक भाषाई शुद्धता आंदोलन था, जो तमिल भाषा से उधार लिए गए शब्दों को हटाने की वकालत करता था। Subramaniya Siva (सुब्रमणिया शिवा) ख़ुद को एक संन्यासी मानते थे और गांव-गांव घूमते थे। उनके होंठों पर हमेशा “वंदे मातरम्” का नारा होता और दिल में आज़ाद भारत का सपना। उनके लिए मुल्क सिर्फ़ ज़मीन का टुकड़ा नहीं होता, बल्कि उसकी ज़ुबान, उसकी तहज़ीब और उसके लोग उसकी असली पहचान होते हैं।
जब अंग्रेज़ों ने उन्हें ख़ामोश करना चाहा
Subramaniya Siva (सुब्रमणिया शिवा) की पैदाइश 4 अक्टूबर 1884 को तमिलनाडु के दिंडीगुल ज़िले के वथालागुंडु में एक ब्राह्मण अय्यर परिवार में हुई थी। साल 1906 में तिरुवनंतपुरम में आर्य समाज के नेता ठाकुर ख़ान का एक भाषण सुनकर Subramaniya Siva (सुब्रमणिया शिवा) की ज़िंदगी बदल गई। उन्होंने तय कर लिया कि अब उनकी पूरी ज़िंदगी देश की आज़ादी के लिए होगी।
उन्होंने ‘धर्म परिबालना समाज’ नाम का संगठन बनाया और नौजवानों को अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए तैयार किया। उनकी तक़रीरों में ऐसा जोश होता था कि जहां भी जाते, लोग आज़ादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए तैयार हो जाते। उनकी बढ़ती लोकप्रियता से अंग्रेज़ सरकार घबरा गई। साल 1908 में उन्हें मशहूर स्वतंत्रता सेनानी वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै के साथ गिरफ़्तार कर लिया गया।
जेल ने जिस्म तो कमज़ोर किया, इरादे नहीं
जेल की सख़्त ज़िंदगी ने उनके जिस्म को ज़रूर तोड़ दिया। कैद के दौरान उन्हें कुष्ठ रोग (Leprosy) हो गया। उस दौर में इस बीमारी का इलाज भी आसान नहीं था और लोग इससे डरते थे। शिवा के जेल से रिहा होने के बावजूद, अंग्रेंज़ों ने उन्हें ट्रेन में सफ़र करने से मना कर दिया क्योंकि कुष्ठ रोग एक अछूत बीमारी मानी जाती थी। जिसकी वजह से उन्हें पैदल यात्रा करनी पड़ा। उन्होंने पैदल चलकर ही अपनी राजनीतिक और साहित्यिक गतिविधियां जारी रखीं। उनका कहना था कि अगर ज़िंदगी का कोई मक़सद हो, तो तकलीफ़ें रास्ता नहीं रोक सकतीं।
आज़ादी के साथ तमिल भाषा की भी लड़ाई
Subramaniya Siva (सुब्रमणिया शिवा) सिर्फ अंग्रेज़ों से ही नहीं लड़ रहे थे। वो तमिल भाषा की पहचान बचाने की भी जंग लड़ रहे थे। उनका यक़ीन था कि “भाषा किसी भी क़ौम की रूह होती है। अगर भाषा मिट जाएगी, तो उस क़ौम की पहचान भी मिट जाएगी।” इसी सोच के साथ वो ‘तनित्तमिल आंदोलन’ के बड़े समर्थक बने। इस आंदोलन का मक़सद तमिल भाषा को दूसरी भाषाओं के असर से बचाकर उसकी असली शक्ल में ज़िंदा रखना था।
जेल में रहने के बावजूद उन्होंने अपनी पत्रिका ज्ञानभानु का काम जारी रखा। उनके लेख सिर्फ़ तमिल भाषा की बात नहीं करते थे, बल्कि लोगों के दिलों में आज़ादी का जज़्बा भी पैदा करते थे। उन्होंने कोलकाता, मद्रास, तूतीकोरिन और तिरुनेलवेली जैसे शहरों में मज़दूर आंदोलनों का भी साथ दिया। उनका मानना था कि मुल्क तभी मज़बूत होगा, जब उसके लोग और उसकी भाषाएं दोनों मज़बूत हों।
23 जुलाई 1925 जब एक आवाज़ ख़ामोश हुई
23 जुलाई 1925 को कुष्ठ रोग से लड़ते हुए Subramaniya Siva (सुब्रमणिया शिवा) ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनकी उम्र सिर्फ़ 40 साल थी, लेकिन इतने कम वक़्त में उन्होंने जो विरासत छोड़ी, वो आज भी ज़िंदा है। वो सिर्फ़ एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे। वो अपनी भाषा, अपनी तहज़ीब और अपने मुल्क से बेपनाह मोहब्बत करने वाले इंसान थे।
आज, जब हम उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हैं, तो उनकी ज़िंदगी हमें एक अहम सबक़ देती है, मुल्क से मोहब्बत सिर्फ़ सरहदों की हिफ़ाज़त करना नहीं है, बल्कि अपनी ज़ुबान, अपनी संस्कृति और अपनी पहचान को ज़िंदा रखना भी उतना ही ज़रूरी है।
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