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‘बीबी-का-अलम’ की चार सौ साल की दास्तान: इबादत, सियासत और हैदराबाद की तहज़ीब का संगम

हैदराबाद (Hyderabad) की गलियों में जब मुहर्रम का महीना (The month of Muharram) आता है, तो एक अलग ही रौनक बिखर जाती है। सबसे बड़ी रौनक होती है बीबी-का-अलम (Bibi-ka-Alam) की, जो आज भी उसी शान के साथ निकलती है, जैसे सैकड़ों साल पहले निकलती थी।

कुतुब शाही से शुरू हुआ था सफ़र

बीबी-का-अलम (Bibi-ka-Alam) का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि हैदराबाद का। शिया कुतुब शाही सुल्तानों (Shia Qutb Shahi Sultans) ने इसकी नींव रखी थी। कहा जाता है कि ये पाक अलम (झंडा) अब्दुल्ला कुतुब शाह (Abdullah Qutb Shah) के ज़माने में गोलकुंडा (Golconda) आया था। उस दौर में आज़ादारी (मुहर्रम की मातमी रस्में) को State patronage मिला और ये आलम मातम की एक बड़ी निशानी बन गया।

Image-Wikipedia

लेकिन सवाल ये है कि इस अलम ने कैसे हैदराबाद का सबसे बड़ा और सबसे पहचाना जाने वाला प्रतीक बनने की हैसियत हासिल की?

असफ़जाही शासकों का करिश्मा

इसका सीधा-सा जवाब है निज़ामों की दरियादिली और सरपरस्ती। जब आसिफ़जाही शासकों ने हैदराबाद की बागडोर संभाली, तो उन्होंने बीबी-का-अलम को एक नई ज़िंदगी दी। ये आलम गोलकुंडा के किले से निकलकर दबीरपुरा में बीबी-का-आलावा में पहुंचा, जहां आज भी ये मौजूद है।

वहां एक शिलालेख है जो बताता है कि ये इमारत 1784 में बनी थी। यानी निज़ामों ने इसे एक बड़ा रिचुअल सेंटर बना दिया। मज़े की बात यह कि अलग-अलग निज़ामों ने इस अलम को हीरे-जवाहरात, सोने-चांदी के गहने, और बेशकीमती तोहफे दिए। सबसे बड़ा नाम है मीर उस्मान अली ख़ान, सातवें निज़ाम का, जिन्होंने अपने हाथों से आलम पर बहुमूल्य नगीने चढ़ाए।

Image-telanganatoday

जब राजसी रस्में बनीं आम पहचान

सबसे बड़ी बात ये थी कि निज़ाम ख़ुद इन जुलूसों में शरीक होते थे। वो मुहर्रम के 10वें दिन ‘धत्ती’ (नज़राना) और तोहफे पेश करते थे। ये एक राजकीय रस्म बन गई, जिससे ये पैगाम गया कि हैदराबाद की सरकार और आज़ादारी आपस में जुड़ी हुई है। ये सियासी और मज़हबी एकता की सबसे खूबसूरत मिसाल है।

निज़ाम का आख़िरी तोहफा: बीबी-का-अलम ट्रस्ट

29 मार्च 1951 को मीर उस्मान अली खान ने एक ऐतिहासिक ट्रस्ट बनाया। बीबी-का-आलम और कोह-ए-मौला ट्रस्ट। उन्होंने इसके लिए 300,000 रुपये की सरकारी सिक्योरिटीज़ अलग रखीं। हर साल 3,000 रुपये रखरखाव के लिए और 1,000 रुपये नज़राने के लिए तय किए गए।

ख़ास बात ये थी कि निज़ाम ने अपनी मौत के बाद इस ट्रस्ट के फंड को तीन हिस्सों में बांटने का हुक्म दिया, और एक हिस्सा सीधे तौर पर बीबी-का-अलम ट्रस्ट को दिया जाए। इस ट्रस्ट में एक मशविरती कमेटी भी बनाई गई, जिसमें नवाब शहीद यार जंग, मौलवी मोहम्मद अब्दुस सत्तार और हुमायूं अली बेग जैसे नामचीन लोग शामिल थे। इस दस्तावेज़ पर हैदराबाद के तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. के. वेल्लोदी और मुंबई के सॉलिसिटर एन. के. सुंटूक भी गवाह बने।

Image-wikipedia

बीबी-का-अलम आज और कानूनी हैसियत

बीबी-का-अलम आज भी उतना ही अहम है जितना पहले कभी था। वैसे तो ये निज़ाम ट्रस्ट के तहत चलता है, लेकिन आजकल तेलंगाना स्टेट वक्फ बोर्ड भी इसकी निगरानी करता है। यानी ये अलम आज भी एक कानूनी और धार्मिक प्रतीक है, जो सरकार और समाज दोनों की नज़रों में अपनी जगह रखता है।

सिर्फ बीबी-का-अलम ही सबसे बड़ा क्यों?

कुतुब शाही दौर में बहुत सारे आशुरखाने बने, लेकिन उनमें से ज़्यादातर आज सिर्फ नाम की हस्तियां हैं। बीबी-का-अलम अलग है। इसकी वजह सिर्फ धार्मिक आस्था नहीं है, बल्कि राजसी सरपरस्ती है। निज़ामों ने इसके जुलूसों को पैसे दिए, जवाहरात चढ़ाए, रस्में जोड़ीं, और इसे शहर के सरकारी कैलेंडर का हिस्सा बना दिया।

Image-Wikipedia

यही वजह है कि बीबी-का-अलम आज भी हैदराबाद की सबसे बड़ी पहचान है। ये सिर्फ एक धार्मिक जुलूस नहीं है, ये इतिहास का वो पन्ना है जो एक शहर की गंगा-जमुनी तहज़ीब को अपने आग़ोश में समेटे हुए है। एक तरफ कुतुब शाही का धार्मिक जुनून है, तो दूसरी तरफ निज़ामों की दरियादिली और सियासी दानिशमंदी।

आशूरा के दिन जब हाथी पर सजा अलम शहर की सड़कों पर निकलता है, तो लगता है जैसे पूरा शहर एक सांस रुक जाता है और हज़ारों सालों की परंपरा उसी जोश और हुस्न के साथ जिंदा हो उठती है।

बीबी-का-अलम सिर्फ एक अलम नहीं,ये हैदराबाद की रूह है। ये वो आईना है जिसमें इस शहर की वफादारी, इबादत, तारीख़ और तहज़ीब एक साथ नज़र आती है। और यही इसकी ख़ासियत है,यही इसकी जान है, और यही इसकी मिसाल है।

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