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वज़ीर अली सबा: वाजिद अली शाह के दरबार का वो शायर, जिसे आज भी याद करती है उर्दू दुनिया 

उर्दू अदब की तारीख़ में लखनऊ का नाम आते ही एक ऐसी तहज़ीब, नफ़ासत और शायरी का ख़याल ज़ेहन में आता है, जिसने सदियों तक हिंदुस्तानी सकाफ़त को प्रभावित किया। इसी लखनवी रंग में कुछ ऐसे शायर भी पैदा हुए, जिन्होंने अपनी शायरी से महफ़िलों को रौनक़ बख़्शी और अपने दौर की अदबी दुनिया में ख़ास मुक़ाम हासिल किया। ऐसे ही शायरों में एक अहम नाम है मीर वज़ीर अली सबा का। 

सबा उन शायरों में थे जिनकी ग़ज़लों में इश्क़ की नरमी भी है, जुदाई का दर्द भी और लखनऊ की तहज़ीब की ख़ुशबू भी। उनकी शायरी में बनावट नहीं, बल्कि दिल की सच्ची कैफ़ियत नज़र आती है। यही वजह है कि 150 साल से ज़्यादा समय गुज़र जाने के बाद भी उनके अशआर पढ़ने वालों के दिलों को छू लेते हैं।

बचपन और तालीम

मीर वज़ीर अली की पैदाइश 1795 के आसपास लखनऊ में हुयी। उनके वालिद का नाम मीर बंदा अली था। बचपन में ही उनके चाचा मीर अशरफ़ अली ने उन्हें गोद ले लिया और उनकी तालीम-ओ-तरबियत की ज़िम्मेदारी संभाली। चाचा ने उनकी तालीम पर ख़ास तवज्जो दी, जिसकी वजह से सबा को अरबी, फ़ारसी और उर्दू अदब का अच्छा ज्ञान हासिल हुआ।

बचपन से ही उन्हें शायरी का शौक़ था। लखनऊ उस समय शायरी का बड़ा मरकज़ था। मुशायरे सजते थे, शायरों की महफ़िलें जमती थीं और अदब की चर्चा हर तरफ़ होती थी। ऐसे माहौल में सबा का शायर बनना कोई हैरत की बात नहीं थी।

सबा की सबसे बड़ी अदबी पहचान यह है कि वे मशहूर शायर ख़्वाजा हैदर अली ‘आतिश’ के शागिर्द थे। आतिश उस दौर के सबसे बड़े उस्तादों में गिने जाते थे। उनके यहां शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का खेल नहीं, बल्कि एहसास की सच्चाई मानी जाती थी।

सबा ने अपने उस्ताद से शायरी की बारीकियां सीखीं और जल्द ही लखनऊ के अच्छे ग़ज़लगो शायरों में शुमार होने लगे। उनकी शायरी में आतिश की सादगी और असर दोनों दिखाई देते हैं, लेकिन उन्होंने अपनी अलग पहचान भी बनाई।

बाद में सबा ख़ुद भी उस्ताद बने और उनके कई शागिर्दों ने अदबी दुनिया में नाम कमाया।

वाजिद अली शाह के दरबार से रिश्ता

सबा का रिश्ता अवध के आख़िरी नवाब वाजिद अली शाह के दरबार से भी रहा। नवाब कला, संगीत और शायरी के बड़े सरपरस्त थे। उन्होंने सबा की क़द्र करते हुए उनके लिए 200 रुपये महीने पर वज़ीफ़ा मुक़र्रर कर रखा था।

उस ज़माने में दो सौ रुपये बहुत बड़ी रकम मानी जाती थी। इस वजह से सबा की ज़िंदगी आराम और ऐशो-आराम में गुज़रती थी। वे अदबी महफ़िलों के केंद्र बने रहते और शेर-ओ-शायरी में मशग़ूल रहते थे।

अफ़ीम का शौक़ और दिलचस्प मिज़ाज

सबा की ज़िंदगी का एक दिलचस्प पहलू उनका अफ़ीम का शौक़ भी था। कहा जाता है कि वे ख़ुद भी अफ़ीम खाते थे और अपने मेहमानों की ख़ातिरदारी भी इसी से किया करते थे।

हालांकि यह आदत उनके दौर में कुछ लोगों के लिए अजीब नहीं थी, लेकिन सबा के बारे में यह बात अक्सर अदबी हलकों में सुनाई देती है। उनके दोस्तों के बीच उनका मिज़ाज ख़ुशगवार और महफ़िल पसंद माना जाता था।

सबा की शायरी में इश्क़ सबसे बड़ा विषय है। लेकिन उनका इश्क़ सिर्फ़ हुस्न की तारीफ़ तक सीमित नहीं रहता। उसमें दर्द, इंतज़ार, शिकायत, वफ़ा और बेवफ़ाई के तमाम रंग मौजूद हैं।

तुम हर इक रंग में ऐ यार नज़र आते हो
कहीं गुल और कहीं ख़ार नज़र आते हो

इस शेर में महबूब की हर जगह मौजूदगी का एहसास है। कभी वह फूल की तरह दिखाई देता है तो कभी कांटे की तरह।

तिरछी नज़रों से न देखो आशिक़-ए-दिलगीर को
कैसे तीरंदाज़ हो सीधा तो कर लो तीर को

यह शेर लखनवी अंदाज़-ए-बयां की ख़ूबसूरत मिसाल है।

दर्द और यादों के शायर

सबा के कई अशआर इंसानी जज़्बात की गहराई को बयान करते हैं। उनका यह शेर आज भी लोगों की ज़ुबान पर रहता है:

दिल में इक दर्द उठा आंखों में आंसू भर आए
बैठे-बैठे हमें क्या जानिए क्या याद आया

यह शेर उन लम्हों की तस्वीर है जब कोई पुरानी याद अचानक दिल पर दस्तक देती है और आंखें नम हो जाती हैं।

आप ही अपने ज़रा जौर-ओ-सितम को देखें
हम अगर अर्ज़ करेंगे तो शिकायत होगी

यहां आशिक़ अपने महबूब से शिकायत भी कर रहा है, लेकिन ऐसे अंदाज़ में कि शिकायत भी अदब बन गई है।

सबा सिर्फ़ ग़ज़ल के शायर नहीं थे। उन्होंने एक बड़ा दीवान “गुंचा-ए-आरज़ू” भी छोड़ा, जिसमें उनकी ग़ज़लों का बड़ा संग्रह मौजूद है।

सबा की ज़िंदगी का अंत भी एक दुखद घटना के साथ हुआ। कहा जाता है कि घोड़े से गिरने की वजह से मौत हुई। इस तरह 1885 में उर्दू शायरी का एक अहम सितारा हमेशा के लिए ख़ामोश हो गया।

लेकिन शायर कभी पूरी तरह मरते नहीं। वे अपने अशआर में ज़िंदा रहते हैं। सबा भी आज अपनी ग़ज़लों और नाज़ुक एहसासों के ज़रिए उर्दू अदब के आसमान पर चमक रहे हैं।

ये भी पढ़ें: मियां दाद ख़ां सैयाह: उर्दू शायरी का मुसाफ़िर जिसने ज़िंदगी को सफ़र बना दिया    

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